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सुधा मूर्ति
इंफोसिस फाउंडेशन की ट्रस्टी होने के नाते मुझे ढेरों-ढेर खत मिलते रहते हैं। हम विभिन्न कारणों से लोगों की आर्थिक मदद करते हैं। स्वाभाविक रूप से जरूरतमंद और अपेक्षाकृत कम जरूरतमंद लोग हमें लिखते हैं। सबसे कठिन काम दोनों के फर्क को पहचान पाना होता है।
एक सोमवार की सुबह सारे खत अंदर आ चुके थे। मैं पत्रों को देखने लगी। मेरी सचिव ने मुझसे कहा- 'मैम, यह एक शादी का निमंत्रण है, जिसके साथ एक व्यक्तिगत नोट भी है। क्या आप इसे देखेंगी?'
कॉलेज में प्राध्यापक होने के नाते मुझे छात्रों की ओर से बहुत से शादी के निमंत्रण मिलते रहते हैं। मैंने सोचा कि यह भी मेरे किसी छात्र की ओर से होगा। जब मैंने कार्ड पढ़ा तो शादी करने जा रहे दो लोगों में से किसी का भी नाम मुझे याद नहीं आया। मैं हैरान थी, यह कौन हो सकता है, जो निमंत्रण भेज रहा है और वो भी हाथ से लिखे नोट के साथ- 'मैडम, अगर आप हमारी शादी में शामिल नही हुईं तो हम इसे अपना दुर्भाग्य मानेंगे।'
मैं अब भी लड़की या लड़के का नाम याद नहीं कर पा रही थी, लेकिन उत्सुकता के चलते शादी में जाना मैंने तय किया। बारिश का मौसम था और जगह शहर के दूसरे छोर पर थी। मुझे डर था कि कहीं मैं अनजान व्यक्ति की शादी में शामिल होकर कोई मुसीबत तो मोल नहीं ले रही। वह परंपरागत मध्यमवर्गीय विवाह था। बहुत से फूलों से स्टेज सजाया गया था। फिल्मी संगीत, जिसे कोई सुन नहीं रहा था। तेज आवाज में लाउडस्पीकर बज रहा था। बारिश की वजह से शादी में आए ढेर सारे बच्चे बाहर जाकर खेल नहीं सकते थे और हॉल में ही लुकाछिपी खेल रहेथे। औरतों ने बंगलोर सिल्क और मैसूर क्रेप की साड़ियाँ पहनी हुई थीं।
मैंने मंच पर खड़े जोड़े की ओर देखा। अब भी मैं उनमें किसी को भी याद नहीं कर पा रही थी। मैंने सोचा कि शायद दोनों में से एक या दोनों ही मेरे विद्यार्थी रहे होंगे। भीड़ के बीच खड़ी बिना किसी जान-पहचान के मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या करूँ। तभी एक बुजुर्ग व्यक्ति ने मेरे निकट आकर विनम्रता से पूछा, 'क्या आप दंपति से मिलकर उन्हें शुभकामना देना चाहेंगी?'
मैं उनके पीछे मंच तक पहुँची। मैंने अपना परिचय दिया और उन्हें सुखमय वैवाहिक जीवन के लिए शुभकामनाएँ दीं। वे बहुत खुश लग रहे थे। दूल्हे ने बुजुर्ग व्यक्ति से मेरा ख्याल रखने के लिए कहा। मुझे अब भी यह प्रश्न परेशान कर रहा था कि ये लोग कौन हैं और क्यों उन्होंने मुझे नोट भेजा?
वह व्यक्ति मुझे भोजन स्थल पर ले गया और मेरे लिए कुछ लेकर आया। बहुत हो चुका, मैंने मन में सोचा। ये लोग कौन हैं, यह जाने बगैर मैं कुछ नहीं खा सकती।
मेरी दुविधा को समझते हुए बुजुर्ग सज्जन मुस्कुराए और बोले, 'मैडम, मैं वर का पिता हूँ। मेरे बेटे को मालती (दुल्हन) से प्यार हो गया। हमने उनकी शादी तय कर दी। सगाई के बाद मालती को ल्यूकोडर्मा (सफेद दाग) हो गया। मेरे बेटे ने शादी करने से इंकार कर दिया। हमें बहुत दुःख हुआ। मैंने उससे पूछा कि तब वह क्या करता, यदि मालती को ल्यूकोडर्मा शादी के बाद होता, मगर उसने हमारी एक नहीं सुनी। लड़की के परिवार को उसके भविष्य की चिंता थी। बहुत-सी परेशानियाँ थीं। घर के तनाव से बचने के लिए मेरे बेटे ने कभी-कभी पुस्तकालय जाना शुरू किया। एक महीने बाद लौटकर उसने मुझसे कहा कि वह मालती से शादी करने को तैयार है। हम सबके लिए यह सुखद आश्चर्य था। आज शादी है।'
मेरे सवाल का जवाब मुझे अब भी नहीं मिला था कि मैं इन सबमें कहाँ से शामिल हूँ? दूल्हे के पिता ने जवाब दिया।
'मैडम', बाद में हमें मालूम हुआ कि वह आपका उपन्यास महाश्वेता पढ़ रहा था। मेरे बेटे की स्थिति भी वैसी ही थी। उसने यह उपन्यास कम से कम दस बार पढ़ा और लड़की की हालत समझी। उसने एक महीना लिया और फैसला किया कि वह आपके उपन्यास के पुरुष की तरह नहीं होना चाहता, जो अपनी जिम्मेदारियों से भागकर बाद में अफसोस करता है। आपके उपन्यास ने उसकी सोच बदल दी।'
अब मैं सारे तार जोड़ पा रही थी। फिर दूल्हे के पिता एक पैकेट लेकर आए और मुझसे उस उपहार को स्वीकार करने की जिद करने लगे। जब मैं संकोच कर रही थी तो उन्होंने मेरे हाथों पर दबाव डालते हुए कहा, 'मालती ने यह आपके लिए खरीदा है। वह आपसे बाद में बात करेगी।'
बारिश तेज हो गई और पानी हॉल में आने लगा। बारिश की बूँदें मेरे चेहरे पर गिर रही थीं। मेरी सिल्क की साड़ी भीग रही थी। लेकिन मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। मैं बहुत खुश थी। मैंने कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि मेरे जैसा आम इंसान किसी की जिंदगी बदल सकता है। जब कभी मैं वह साड़ी पहनती हूँ, मुझे मालती का हँसमुख चेहरा और महाश्वेता का आवरण-पृष्ठ याद आता है। वह मेरी सबसे मूल्यवान साड़ी है।