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रूला गई वो चिट्ठी

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सुधा मूर्ति
- सुधा मूर्ति
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भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में अक्सर बाँझ महिलाओं (जो बच्चे को जन्म नहीं दे सकती है) को हेय दृष्टि से देखा जाता है। पहले तो ऐसी औरतों को किसी खास समारोह में आमंत्रित नहीं किया जाता था जैसे नामकरण समारोह आदि। उन्हें सभी ताने मारते थे। लेकिन माँ न बन पाने के दर्द और वेदना को कोई समझना नहीं चाहता था।

संवेदनशील अध्यापिका गौरम्मा मुझे पढ़ाती थीं। वे बहुत ही सुंदर थीं। हमेशा मुस्कराती रहती थीं। वे संस्कृत की अध्यापिका थीं। कक्षा में हमें बहुत सारी कहानियाँ सुनाती थीं। कुछ विद्यार्थियों को गौरम्मा की कहानी में कोई दिलचस्पी नहीं होती थी।

कक्षा समाप्त होने के बाद वे विद्यार्थी कक्षा से जल्दी चले जाते थे ताकि उन्हें गौरम्मा की कहानियों को सुनना नहीं पड़े। लेकिन मुझे उन कहानियों को सुनना बहुत अच्छा लगता था। इसलिए मैं उनके साथ कक्षा में घंटों बैठी रहती थी।

  तुममें इतनी शक्ति है कि समस्याओं से बड़ा बन जाओ और आसानी से समस्या का समाधान कर सको। यदि तुम छोटा रूप धारण करते हो तो कठिनाई पहाड़ों की तरह विशाल लगेगी और उसके विशाल रूप को देखकर आप घबरा उठेंगे। अक्सर हम यही करते हैं।      
गौरम्मा में कहानी को खूबसूरती से कहने की कला थी। वे अपनी मधुर आवाज में भगवान श्रीकृष्ण का इतना सुंदर वर्णन करतीं कि जब मैंने बाद में महाभारत की कथा टेलीविजन पर देखी तब गौरम्मा के वर्णन आँखों के सामने नजर आए।

गौरम्मा कथासरित्सागर से कहानी सुनाती थीं। तब कहानी का हर दृश्य सामने उपस्थित हो उठता था। कहानी सुनते हुए समय कब बीत जाता था पता ही नहीं चलता।

स्कूल का चौकीदार आकर हमें कहता कि स्कूल बंद होने का समय हो चला है। तब हम अपने घर की ओर रवाना होते थे। यह सिलसिला तब तक चलता रहा जब तक कि मैं कक्षा सात तक पहुँच गई। उसके बाद मैंने दूसरे स्कूल में दाखिला ले लिया था। कुछ दिन के लिए मैं दुःखी थी क्योंकि अब गौरम्मा से मिलना नहीं होता था। कभी-कभी उनसे मुलाकात बाजार में होती। वे बड़े प्यार से मेरी पढ़ाई के बारे में पूछतीं।

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घर पर मैं जब भी कहानियों की किताबों में डूब जाती तब घर के लोग मुझ पर व्यंग्य करते हुए कहते कि यह गौरम्मा की एकमात्र सच्ची विद्यार्थी है।

मेरी माँ अक्सर दुःखी होकर कहतीं, बेचारी गौरम्मा कितनी खूबसूरत हैं परंतु भाग्य उनके साथ नहीं है। उनके पति ने उनका साथ छोड़ दिया, क्योंकि वे बच्चे को जन्म नहीं दे सकतीं।

उनके पति ने किसी और से शादी कर ली जिसने बच्चे को तो जन्म दिया, लेकिन वह गौरम्मा के समक्ष कुछ भी नहीं थी। समय बीतता गया। मैंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। शादी भी हुई, संसार के कामों में व्यस्त हो गई। बाद में मैं इंफोसिस की अध्यक्ष बन गई थी। बहुत से कलाकारों के साथ मेरी मुलाकात होती रही। मैं देश के हर स्थान पर जाकर वहाँ का जायजा लेने लगी।

अक्सर मुझे स्कूल-कॉलेजों में किसी विषय विशेष पर बोलने के लिए आमंत्रित किया जाता था। एक बार भाषण के लिए मुझे एक विश्वविद्यालय में आमंत्रित किया गया था। भाषण के पश्चात विद्यार्थी मुझे घेरकर सवाल करने लगे।

मुझे लगता है कि विद्यार्थियों से हमेशा दोस्त की तरह व्यवहार किया जाना चाहिए, चाहे वे कम उम्र और कम अनुभवी हों। विद्यार्थियों ने बहुत से सवाल पूछे, उन्होंने मेरे अनुभवों के विषय में भी जानना चाहा।

एक लड़की ने मुझसे बड़ा कठिन सवाल पूछा कि जब आपके समक्ष कोई कठिन समस्या आ जाती है तब आप क्या करती हैं? आप कैसे उस समस्या को सुलझाती हैं?

उस सवाल को सुनकर मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उसका क्या जवाब दूँ। वह बीस साल की सुंदर, साहसिक एवं आत्मविश्वासी युवती थी। उस युवती को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे मैं खुद को देख रही हूँ जब मैं बीस साल की थी।

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तुरंत मेरे मन में उस सवाल का जवाब आया। मैंने कहा कि मैं आपको एक कहानी सुनाऊँगी-यह कहानी है रामायण की।

युद्ध भूमि में जब लक्ष्मण बेहोश हो गए तब उनके लिए हनुमान संजीवनी जड़ी-बूटी लाए थे। जिस पहाड़ पर यह बूटी थी उसे हनुमानजी ने विशाल रूप धारण कर आसानी से उठा लिया और उड़कर वापस आ गए थे। उसके बाद की कहानी आप सभी जानते हैं।

युवती ने कहा कि मैंने आपसे एक अलग सवाल किया था। लेकिन आपने उत्तर में एक ऐसी कहानी सुनाई है जिसे सभी जानते हैं। मैंने मुस्कराकर कहा कि धैर्य रखो मेरा जवाब अभी पूरा नहीं हुआ है। तुममें उतनी काबिलियत है जब तुम समस्या का सामना कर रहे हो तब तुम्हें समस्या से भी ज्यादा बड़ा होना पड़ेगा।

तुममें इतनी शक्ति है कि समस्याओं से बड़ा बन जाओ और आसानी से समस्या का समाधान कर सको। यदि तुम छोटा रूप धारण करते हो तो कठिनाई पहाड़ों की तरह विशाल लगेगी और उसके विशाल रूप को देखकर आप घबरा उठेंगे। अक्सर हम यही करते हैं।

  लोगों की संताने उनका सम्मान नहीं करती हैं। मुझे अपनी उस संतान पर गर्व है जिसे मैंने पढ़ाया था। मुझे अब भगवान से कोई शिकायत नहीं है। तुम्हारे रूप में उन्होंने मुझे बेटी दी।      
मेरी बात को सुनकर विद्यार्थी बहुत खुश हुए थे। मुझे गौरम्मा की याद आई। मैंने विद्यार्थियों से कहा कि इस कहानी को सुनाने का पूरा श्रेय मेरी अध्यापिका गौरम्मा को जाता है। मैं जब छोटी थी तब उन्होंने मुझे यह कथा सुनाई थी। वे मुझे बहुत-सी कहानियाँ सुनाती थीं। जिनमें बहुत-सी ज्ञान की बातें छुपी हुई होती थीं।

समारोह समाप्त होने के बाद मैं बेंगलुरू वापस चली गई थी। रोजमर्रा के काम में व्यस्त हो गई। एक दिन मेरी सेक्रेटरी ने मेरे हाथ में चिट्ठी दी और कहने लगी कि मैडम किसी ने आपके लिए चिट्ठी भेजी है। मैंने चिट्ठी हाथ में लेकर कहा- यह किसकी है? मैंने बड़े ध्यान से देखा और चकित रह गई, यह चिट्ठी तो गौरम्मा की है।

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पत्र में लिखा हुआ था- 'तुम जानती होगी कि मैं संतान को जन्म देने में असमर्थ थी और मेरे पति मुझे छोड़कर चले गए थे। सभी लोग मेरा मजाक उड़ाते और मुझे ताने मारते।

सब लोग मुझे देखकर कहते थे कि मैं कहानी सुनाने वाली अध्यापिका हूँ। मुझे संस्कृत की अध्यापक कम माना जाता था।'

कुछ लोग मुझे कहते थे कि बच्चों को कहानी न सुनाकर मुझे बच्चों को प्रायवेट ट्यूशन देना चाहिए। मेरा अपमान किया गया, क्योंकि मैं बाँझ थी। तुम्हें पता ही होगा कि मेरे पति ने दूसरी शादी कर ली थी। दूसरी पत्नी से उन्हें दो बच्चे हुए थे।

परंतु बच्चों ने अपयश, हानि, ऋण जैसी समस्या उनके पिता के सामने लाकर खड़ी कर दी थी। मेरे पति अक्सर मेरे पास आकर रोते थे। मैंने अपनी जमा पूँजी से उनकी मदद की थी।

  युद्ध भूमि में जब लक्ष्मण बेहोश हो गए तब उनके लिए हनुमान संजीवनी जड़ी-बूटी लाए थे। जिस पहाड़ पर यह बूटी थी उसे हनुमानजी ने विशाल रूप धारण कर आसानी से उठा लिया और उड़कर वापस आ गए थे।      
मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि गौरम्मा ने अपनी निजी बातें मुझे क्यों बताईं? मैं उनकी स्थिति के बारे में जानती थी। परंतु उन्होंने बीती हुई बातों के बारे में मुझे क्यों लिखा यह समझ में नहीं आ रहा था। धैर्यपूर्वक मैंने पत्र पढ़ना शुरू किया।

गौरम्मा ने पत्र में लिखा था कि आज मेरे पति ने आकर मुझे अखबार दिखाया था, जिसमें तुमने उस वक्त का जिक्र किया था जब मैं कहानी सुनाया करती थी। क्षणभर के लिए मैं स्तब्ध रह गई। मैं तुम्हारी माँ नहीं थी, परंतु तुमने मुझे हमेशा माँ का सम्मान ही दिया है।

लोगों की संताने उनका सम्मान नहीं करती हैं। मुझे अपनी उस संतान पर गर्व है जिसे मैंने पढ़ाया था। मुझे अब भगवान से कोई शिकायत नहीं है। तुम्हारे रूप में उन्होंने मुझे बेटी दी।

इस पत्र को पढ़कर मेरी आँखों से आँसू बह चले। पत्र पर आँसू गिरने से लिखे हुए शब्द आपस में मिल गए और मैं चिट्ठी को आगे नहीं पढ़ सकी।

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