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'रेनी डे' के लिए!

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रेनी डे
- सुधा मूर्ति

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शादी से पहले हर माँ अपनी बेटी को कुछ सलाह देती है। अक्सर यह देखा गया है कि माँ कहती है कि नई दुल्हन को घर के अन्य सदस्यों के साथ मिल-जुलकर रहना चाहिए। सास-ससुर का आदर करना चाहिए तथा नए घर के तौर-तरीके सीखना चाहिए। घर में किस प्रकार के पकवान बनते हैं, उन्हें स्वयं बनाना चाहिए। हर प्रकार से दूसरों की सहायता करनी चाहिए और सबसे स्नेह रखना चाहिए।

मेरी माँ विमला कुलकर्णी ने मुझसे यही कहा जब मेरी शादी हुई। परंतु इस सलाह के अलावा उन्होंने मुझसे कुछ और भी कहा जिससे आने वाली जिंदगी में मुझे बहुत मदद मिली। माँ ने कहा- जिंदगी में कब बारिश (आर्थिक मंदी) के दिन आएँ और तुम्हें पैसों की जरूरत पड़ जाए, ऐसी स्थिति के लिए तुम्हें पैसे अपनी आय से बचत करके रखने चाहिए।

यदि तुम कमा नहीं रही हो तो तुम्हारे पति की आय से तुम्हें कुछ रकम बचाकर रखनी चाहिए। एक हजार रुपए में से पचास या सौ रुपए बचाकर रख सकते हैं।

ये पैसे गहने या रेशमी साड़ी खरीदने के लिए नहीं हैं। कम उम्र में तुम्हारी इच्छा होगी कि तुम विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ खरीदो। परंतु याद रखना कि मुश्किल हालातों में कुछ ही चीजें तुम्हारे काम नहीं आएँगी। तुम्हारा साहस, नई स्थिति में सामंजस्य बैठाना एवं बचाया हुआ धन, यह बुरे समय में तुम्हारी सहायता करेंगे। कोई और आकर कठिन स्थिति में तुम्हारी सहायता नहीं करेगा।

जब मैंने उनकी यह सलाह सुनी तब मैं मुस्करा दी। मुझे लगा कि ऐसे 'रेनी डे' मेरी जिंदगी में कभी नहीं आएँगे। मैंने सोचा कि सभी दिन अच्छे होते हैं। परंतु मैं अपनी माता की बात हमेशा मानती हूँ इसलिए मैं धीरे-धीरे बचत करने की कोशिश करने लगी। उन पैसों को मैं रसोई कक्ष की लकड़ी की अलमारी में बिना गिने रखने लगी। शादी के बाद मुंबई में मेरी जिंदगी बड़ी ही सरलता से बीत रही थी।

हर मध्यमवर्गीय परिवार की तरह मैं अपने परिवार के साथ बहुत ही खुशी की जिंदगी बिता रही थी। बांद्रा में हमारा फ्लैट था। फोर्ट में स्थित टेल्को में मैं काम करती थी एवं मूर्ति नरीमन पॉइंट में काम करते थे। एक दिन पति ऑफिस से वापस घर लौटे तो वे बहुत चिंतित लग रहे थे। स्वभाव से वे बहुत मितभाषी हैं एवं अपनी भावनाओं को जल्दी प्रकट नहीं करते हैं। उस दिन उनका व्यवहार कुछ अलग-सा था। मैं खाना बना रही थी।

मैंने पूछा- आप चिंतित क्यों दिख रहे हैं?

उन्होंने कहा कि आने वाले समय में सॉफ्टवेयर देश के सबसे बड़े व्यापारों में से एक होगा। इस देश में चतुर व्यक्तियों की कोई कमी नहीं है। सॉफ्टवेयर लिखने के लिए तार्किक दिमाग एवं कठिन परिश्रम की जरूरत होती है, जो भारत में नहीं पाए जाते हैं। हमें इन गुणों को ढूँढना चाहिए। मैं एक सॉफ्टवेयर कंपनी खोलना चाहता हूँ।

मैं चकित रह गई। मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी कि कभी हम एक नई कंपनी खोलेंगे। मूर्ति एवं हमारे परिवार में से कोई भी उद्योगपति नहीं था। मैंने सोचा कि मूर्ति पीसीएम में काम करते रहेंगे एवं मैं टेल्को में काम करती रहूँगी। इस तरह सुखी जीवन व्यतीत करेंगे। तुरंत मैंने सोचा कि मैं न कह दूँ।

मूर्ति व्यापार के लिए बनाई गई योजना एवं कल्पनाओं का वर्णन करने लगे। उन्होंने मुझसे कहा कि तुम्हें इतिहास से बहुत लगाव है। तुम मेरे विचारों से अवश्य सहमत होंगी। पूर्व में हम भारतीय औद्योगिक क्रांति के विषय पर कुछ कर नहीं पाए थे। अब भारत में बौद्धिक क्रांति आने वाली है। इस मौके का फायदा उठाना चाहिए। हमें इस क्रांति को भारत में लाना चाहिए। यदि इस समय को जाने देंगे, तब हम जिंदगी में बहुत बड़ा अवसर खो देंगे। मैं इस कदम को उठाना चाहता हूँ, मात्र पैसों के लिए नहीं बल्कि इस देश के लिए।

मेरा मन मेरे बचपन के दिनों में लौट गया। मेरे रिश्तेदार ने कुछ साल पहले निजी उद्योग शुरू किया था, परंतु वह सफल नहीं हुआ एवं अंत में उन्हें अपनी पारिवारिक संपत्ति को भी बेचना पड़ा। इस घटना के बाद निजी रूप से व्यापार प्रारंभ करना मुझे नुकसानदायक लगता था। मुझे डर था कि वैसा ही हमारे साथ भी न हो। हमारे पास कोई संपत्ति नहीं थी जिसके माध्यम से हम नुकसान की भरपाई कर सकें। इसके अलावा हमारी एक बेटी भी थी। मुझे चिंता होने लगी।

मेरे पति ने शायद मेरे मन को पढ़ लिया था। 'यह व्यापार नए तरह का है, जो कि बौद्धिक शक्ति से चलेगा एवं इसमें ज्यादा धन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।' उन्होंने मुझसे कहा- 'मुझे तुम्हारा सहयोग चाहिए।' उनकी आवाज में निष्पक्षता एवं ईमानदारी थी जिसका मैं आदर करती थी।

मैं सोच-विचार में डूबी हुई थी कि इतने में रोटी जलने की गंध आई। मैं वहाँ बैठकर इस समस्या के परिणाम के बारे में सोच रही थी। मूर्ति का बहुत बड़ा परिवार था, जो उन पर आश्रित था। उनकी तीन अविवाहित बहनें थीं। इस स्थिति में यदि उन्होंने एक नई कंपनी खोलने का प्रयास किया, तब परिवार की आर्थिक स्थिति पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ेगा। मैं बहुत चिंतित थी, परंतु उन पर पूरा भरोसा था। मुझे लगा कि जब तक मैं उनका साथ न दूँ, तक तक वे इस कार्य को करने में असहज महसूस करेंगे।

व्यापार में हानि एवं लाभ होता रहता है। व्यापार में हानि होने से सालों से बचाकर रखा धन बर्बाद हो जाएगा, मैंने सोचा। परंतु जब मैं इस सोच में डूबी थी, तब मेरी आत्मा ने मुझसे कहा कि इस स्थिति में भी हम जीवित रहेंगे। मैंने उनसे पूछा- 'क्या आप इस व्यापार में अकेले हैं?'

मूर्ति ने मुस्कराकर कहा- 'नहीं। मेरे साथ छः नवयुवक काम करेंगे। यही एक समय है कि हम नैतिक एवं न्यायोचित रूप से कमा सकते हैं। मेरा एक स्वप्न है कि भारत इस क्षेत्र में अग्रणी बने जिससे इस देश को गौरव प्राप्त हो एवं मुनाफा मिले। तुम्हें ही मुझे सहारा देना होगा। क्या तुम मुझे कुछ पैसे दे सकती हो। यदि तुम मेरी सहायता नहीं करोगी तो मेरा स्वप्न अधूरा रह जाएगा।'

मैं जानती थी कि यदि मैंने उन्हें पैसे नहीं दिए तो वे निजी कंपनी नहीं खोल पाएँगे। उसी क्षण मुझे मेरी माँ की बात याद आई कि हमेशा कुछ पैसे बचाकर रखना और उसे बहुत ही महत्वपूर्ण स्थिति में प्रयोग करना। यह वही स्थिति थी अतः मैंने फैसला किया और रसोई में रखे अपनी बचत के पैसों का बॉक्स उठाया। जिसमें मैं हर महीने पैसे रखती थी। मैंने उनकी गिनती की। उस बक्से में दस हजार रुपए रखे हुए थे। मैंने मूर्ति को वे पैसे दे दिए।

मैंने कहा- 'ऑल द बेस्ट मूर्ति, मेरे पास बस यही है, आपको देने के लिए। मैं खुशी-खुशी हर दायित्व लेने के लिए तैयार हूँ, परंतु इस कंपनी का नाम क्या रखेंगे?'

उन्होंने कहा- 'इंफोसिस। तुम्हारे साथ के लिए और इन पैसों के लिए धन्यवाद। कुछ सालों के लिए जीवन के ऊँचे-नीचे पड़ाव के लिए तैयार रहना।'

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मुझे एहसास होता है कि हमारे जीवन की राह कैसे बदल गई, क्योंकि मैंने माँ के समझाए अमूल्य वचन पर अमल किया था। मैं अक्सर यह कहानी अपने बच्चों एवं विद्यार्थियों को सुनाती थी। कोई नहीं जानता कि कब 'रेनी डे' आ जाए औरबचत के पैसों की जरूरत महसूस हो। अगर वह दिन आया तो माँ की बात सच निकलेगी। माँ की शिक्षा हमेशा अनमोल होती है।

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