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बुद्घ विभाजन विदेशी पाकिस्तानी
- सुधा मूर्ति
ND
गौतम बुद्घ का जन्म आज से 2500 वर्ष पूर्व वर्तमान नेपाल के लुंबिनी नामक स्थान पर राजकुमार सिद्घार्थ के रूप में हुआ था। अपने पूरे जीवनकाल में वे संपूर्ण उपमहाद्वीप में शांति, सहिष्णुता और धर्म के मार्ग का संदेश देते हुए यहाँ से वहाँ तक घूमते रहे। श्रावस्ती, राजगृह, सारनाथ, बोधगया, कुशीनगर आदि कुछ स्थान थे, जहाँ वे गए और जो बुद्घ धर्म के महत्वपूर्ण केंद्र बन गए। हालाँकि उन्होंने अपनी ज्यादातर शिक्षाएँ भारत में दीं, लेकिन आने वाली सदियों में बौद्घधर्म सारे संसार में फैल गया। आज श्रीलंका, जापान, कोरिया, थाईलैंड आदि कुछ ऐसे देश हैं, जहाँ बौद्घधर्म फल-फूल रहा है और भारतीय उपमहाद्वीप में भी ऐसे स्थान हैं, जिनका बौद्घ इतिहास से मजबूत रिश्ता है।

इस्लामाबाद से लगभग 25 किमी दूर एक उनींदा-सा कस्बा है तक्षशिला। एक समय यहाँ विश्व का सबसे पुराना विश्वविद्यालय और बौद्घ शिक्षा का महत्वपूर्ण केंद्र था। बौद्घ धर्म के महान संरक्षक सम्राट अशोक ने यहाँ अनेक विहार बनवाए थे, जहाँ सदियों तक विद्वान धर्म एवं दर्शन पर चर्चाएँ करते। ह्वेनसांग ने अपने लेखन में तक्षशिला की महिमा और सौंदर्य का वर्णन किया है। कभी तमाम हलचलों का केंद्र रहा यह विश्वविद्यालय अब खंडहर हो चुका है। इसके एक भाग को पाकिस्तानी सरकार ने संग्रहालय में बदल दिया है, जहाँ कोई भी कला के शानदार नमूने देख सकता है, जिनमें खुदाई में निकले बुद्घ की मूर्तियों के सिर, जवाहरात और बुद्घ के जीवन को चित्रित करने वाली पट्टिकाएँ शामिल हैं। कोई भी व्यक्ति जिसकी बौद्घ धर्म और उसके इतिहास में रुचि हो, उसे यह स्थान अवश्य देखना चाहिए।

हाल ही में मैंने पहली बार पाकिस्तान की यात्रा की। हालाँकि मैं वहाँ किसी और काम से गई थीं, लेकिन मैंने बहुत पहले यह तय कर लिया था कि अगर कभी मुझे पाकिस्तान जाने का मौका मिला तो मैं तक्षशिला जाऊँगी। मैं जब इस्लामाबाद पहुँचीं तो मेरे मन में इस देश के बारे में अनेक पूर्व धारणाएँ थीं। लेकिन जल्द ही मैंने देखा कि महिलाएँ स्वतंत्रतापूर्वक घूम रही हैं और उन्होंने बुरका नहीं पहन रखा है।

  लेकिन आप मुझसे 200 रु. क्यों ले रहे हैं? मैं भारत से हूँ। ये जगह हमारी विरासत का भी उतना ही अंग है जितना कि आपकी। वह व्यक्ति निश्चल रहा और दृढ़ स्वर में बोला, 'आप भारतीय हैं और इसीलिए आप विदेशी हैं।'      
हमारे मेजबान ने हमारे लिए भोजन में चना-भटूरा, आलू के पराठे और जलेबी बनवाई थी, जिसके कारण हमें बिलकुल घर जैसा महसूस हुआ। मैंने कुछ समय बाजार में खरीददारी करते हुए बिताया और यहाँ के बाजार और दुकानें भी हमसे अलग नहीं थीं। हमने भाव-ताव करके खरीददारी की। जब मैंने ध्यान से सुना तो हमारा टैक्सी ड्राइवर एक हिन्दी फिल्मी गीत गुनगुना रहा था। बिलकुल हमारे देश की तरह। मुझे जो उड़ानपकड़नी थी वह भी देर से थी। इसलिए आश्चर्य नहीं कि मुझे एकदम आरामदायक स्थिति लग रही थी।

अगले दिन मैं एक फ्रांसीसी समूह के साथ तक्षशिला के लिए निकली। हमें संग्रहालय पहुँचने में थोड़ी देर हो गई। संभवतः संग्रहालय को देखने की हमारी तीव्र इच्छा को महसूस कर वहाँ का अध्यक्ष बोला, अब तो बंद होने का समय हो गया है। क्यों नहीं आप लोग भीतर जाकरदेखना चालू कर देते। मैं आपको सब समझा दूँगा। इस बीच आपका यात्रा आयोजक टिकट खरीद सकता है।


ये हम सभी को अच्छा विचार लगा और शीघ्र ही हम सभी वहाँ रखे आश्चर्यजनक सामान को देखने में व्यस्त हो गए। मेरे लिए यह अतिरिक्त उत्साहजनक था। क्योंकि मैं अपनी एक बहुत पुरानी इच्छा पूरी कर रही थी। मैंने अपने इतिहास की जिन चीजों के बारे में केवल किताबों में पढ़ा था, उन्हें साक्षात देख पा रही थी। विस्तार से घूमने के बाद संग्रहालय अध्यक्ष हमें बाहर ले गया, तब पहली बार मैंने टिकट खिड़कियों की ओर ध्यान दिया, टिकट की दरें थीं विदेशियों के लिए 200 रु. और स्थानीय लोगों के लिए 25 रु.। जब आयोजक ने मुझे टिकट की काउंटर फाइल दी तो मैंने जाना कि मैंने 200 रु. वाली रसीद पकड़ रखी है। यह सोचते हुए कि कोई गलती हो गई है, मैं टिकट खिड़की के पास बैठे आदमी के पास गई। मैं विदेशियों से अधिक शुल्क लेने का कारण समझती हूँ, क्योंकि आपको संग्रहालय की देखरेख के लिए धन की जरूरत होती है।

लेकिन आप मुझसे 200 रु. क्यों ले रहे हैं? मैं भारत से हूँ। ये जगह हमारी विरासत का भी उतना ही अंग है जितना कि आपकी। वह व्यक्ति निश्चल रहा और दृढ़ स्वर में बोला, 'आप भारतीय हैं और इसीलिए आप विदेशी हैं।' उन शब्दों ने मुझे गहराई तक चोट पहुँचाई। मैंने महसूस किया कि अपने पहनावे, भाषा, खानपान और बॉलीवुड फिल्मों के प्रति लगाव में समानता के बावजूद विभाजन ने हमें हमेशा के लिए बाँट दिया है। इसने हमें एक-दूसरे की भूमि पर अपरिचित बना दिया है। यहाँ तक कि उस प्राचीन विश्वविद्यालय वाले कस्बे में बुद्घ के प्रेम और सहिष्णुता के संदेश भी हमें एक नहीं कर सके। 200 रु. का वह टिकट एक झटके में मुझे वास्तविकता में ले आया।

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