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वे अनाम योद्धा

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अनाम योद्धा
- पटना से राघवेन्द्र नारायण मिश्र

ये अनाम योद्धाएं हैं जिनके प्रयासों ने बिहार को बदलने में अहम भूमिका अदा की है। इन अक्षर दूतों ने तमाम बाधाओं से लड़ते हुए अंधेरी गलियों में शिक्षा की मशाल जलाई। अक्षरदूतों ने नए-नए प्रयोग कर साक्षरता की रोशनी से गांवों को रोशन किया। महिला अक्षरदूतों ने बंदिशों की देहरी लांघी और सफलता की बड़ी लकीर खिंचती चली गईं। घूंघट उतार फेंका तो सामाजिक रूढ़ियां टूटने लगीं।

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रूढ़ियां हवा से नहीं टूटतीं, इसके लिए सामाजिक द्वंद्व और व्यक्ति-समूह का संघर्ष निरंतर चलता रहता है। कठिन राह में अक्षरदूतों के कदम कभी डगमगाए तो कभी ऊर्जा गुम होती नजर आई लेकिन संकल्प के प्रति दृढ़ता ने नई राह खोल दी। सपने कायम रहे और कल्पनाशीलता उसमें रोज नए-नए पंख लगाती रही। उत्साह और ललक ने हर कदम पर साथ दिया और नया इतिहास बनता चला गया।

आत्मविश्वास से लबरेज संजरी खातून जब मोहल्ले के बुजुर्गों से उनकी बहुओं को साक्षरता केंद्र पर लाने की बात करती तो सास-ससुर झल्ला जाते थे। संजरी उनसे सवाल करती थी कि 'जब मैं पढ़ सकती हूं तो आपकी बहू क्यों नहीं पढ़ सकती ?' मोहल्ले की हालत बुरी थी। हर तरफ गंदगी और चीजें जहां-तहां बिखरी पड़ी थीं। औरतों की बात तो दूर सयानी लड़कियां भी पढ़ी-लिखी नहीं थीं।

संजरी ने हार नहीं मानी और कहती रही कि 'मिलकर करें प्रयास हमें कुछ कर दिखाना है, गर हो गए उदास, नहीं कुछ होना-जाना है।' उसके प्रयास को सफलता मिली और मुख्यमंत्री अक्षर आंचल योजना का केंद्र अधेड़ महिलाओं के क, ख, ग के शोर से गुलजार होने लगा। गीत कारगर हथियार बने फिर करिश्मा हुआ और निरक्षर आबादी की 24 महिलाएँ साक्षर हो गईं। उन्नीस महिलाएं आम आदमी बीमा योजना से जुड़ीं।


पढ़ाई से महिलाओं का नजरिया भी बदला और जीने का अंदाज भी। अक्षर आँचल योजना खत्म हुई तो साक्षर लड़कियों ने स्कूलों में दाखिला लिया। इस बीच संजरी को पति का भी साथ मिला और वह अब खुद एमए कर रही हैं।

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शिक्षादान की राह पर साबरा खातून सिद्दीकी की रफ्तार अब तेज हो चुकी है। मैट्रिक पास करते ही शिक्षक पिता ने उसे अपनी राह पर डालना चाहा था। तब साबरा का चयन डाल्टेनगंज महिला टीचर ट्रेनिंग के लिए हुआ तो घर में भूचाल आ गया। मुस्लिम समाज की लड़की को हॉस्टल भेजने पर संबंधियों को आपत्ति थी लेकिन साबरा ने हार नहीं मानी।

साबरा परिवार के साथ सामाजिक कार्यों में पहले भी रुचि लेती रही हैं। उसके पति अंजुम आरफी ने छात्र जीवन में ही अपने गांव बिहटा में एक कमेटी बनाकर पोखर-तालाबों को अवैध कब्जों से मुक्त कराया था और मछली पालन के लिए मोटी राशि जुटाई। साबरा ने इससे प्रेरणा ली। दो बच्चों को संभालते हुए बीए, टीचर ट्रेनिंग के बाद अब एमए कर रही हैं। साबरा अब पटना में रहती हैं।

साबरा जब अक्षरदूत बनी तो कई बाधाएं सामने थीं। महिलाओं को केंद्र पर लाने के लिए उनके घरों में जातीं तो उनके शराबी पतियों की गालियां सुननी पड़तीं। चंचल, प्रभा, रेखा, निर्मला आदि महिलाओं की सीखने की ललक ने साबरा को जोश को दोगुना कर दिया। केंद्र आने वाली महिलाएं साक्षर हुईं और बैंक से पैसे निकालने के लिए जब अंगूठा लगाने के बदले हस्ताक्षर किया बैंक मैनेजर भी चौंक पड़े।

साबरा ने दर्जनों महिलाओं को साक्षर बनाकर उन्हें स्वयं सहायता समूह और आम आदमी बीमा योजना से जोड़ा। साबरा को सपने देखने और उन्हें हकीकत में बदलने में यकीन है।

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