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सुधा मूर्ति
आशा और मैं एमजी रोड पर खरीददारी कर रहे थे तभी हमने एक बुजुर्ग व्यक्ति को हमारी ओर आते हुए देखा। वह लगभग साठ वर्ष का होगा, उसके सिर पर सफेद बाल, चेहरे पर कुछ झुर्रियाँ थीं, पर वह स्वस्थ लग रहा था। वह आशा की ओर देखकर मुस्कुराया। उसने उन्हें पहचानने के कोई संकेत नहीं दिए। वह व्यक्ति एक क्षण को हमारे सामने खड़े रहकर, आगे चला गया।
उसके जाने के बाद मैंने आशा से पूछा, तुम्हें नहीं लगता कि वह आदमी तुम्हें पहचानता था? वह तुम्हारी ओर देखकर मुस्कुराया था। क्या तुम उसे जानती हो?
हाँ, मैं उन्हें जानती हूँ। वो मुझे स्कूल में गणित पढ़ाते थे। वह बहुत बुरी तरह से पढ़ाते थे और उन्होंने गणित में मेरी रुचि खत्म कर दी। वे एकदम रुखे और निर्दयी थे, हम लोगों के मन में उनका डर था। वे बहुत कठोरता से पढ़ाते थे। आशा की आवाज में गुस्सा और हताशा थी। शायद वह अति कर रही थी।
यह सच है कि स्कूल के शिक्षक, कॉलेज के शिक्षक की तुलना में आपके अंदर ज्ञान की नींव रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। स्नातक या उससे बड़े स्तर के छात्रों को पढ़ाना आसान है, लेकिन यही काम स्कूल के स्तर पर करना कठिन है। शिक्षक में अपने विद्यार्थियों के प्रति प्यार होना ही चाहिए। एक शिक्षक का आकलन करने की कसौटी केवल ज्ञान नहीं होता है।
मुझे अपने गणित के शिक्षक का ख्याल आया। मैंने सोचा मैं किस तरह से प्रतिक्रिया देती, अगर वे मुझे सड़क पर मिल जाते। वो क्या करते और किस तरह से मुझे मिलते वो शायद यही कहते, 'इस तरह एमजी रोड पर अपना समय क्यों बर्बाद कर रही हो, वापस ऑफिस जाओ या घर पर काम करो, बिना तैयारी के कभी मत पढ़ाओ।'
एक सेकंड सोचे बगैर, मैं कह देती, 'यस सर', तब थोड़े संकोच से मैं उनसे पूछती कि 'आप कहाँ ठहरे हैं, क्या मैं कुछ देर बाद आकर आप से मिल सकती हूँ।' वो उसी प्यार से मेरे कंधे पर थपकी देते, जैसा कि वो तब करते थे, जब मैं एक छात्रा थी, फिर हम दोनों हँस देते।
मेरे शिक्षक, राघवेंद्र वार्नेकर, एक असाधारण व्यक्ति थे। वे मेरे गृहनगर हुबली के थे। वे बहुत सादा जीवन जीते थे और उन्होंने कोई पुरस्कार नहीं हासिल किया। वे एक उत्कृष्ट शिक्षक थे, जबकि वे केवल स्नातक तक ही पढ़े थे। वे गणित इतना अच्छा पढ़ाते थे कि हमें गणित कभी कठिन लगा ही नहीं।
वे गणित को 'विज्ञान की रानी' कहते थे। वे कहते 'चलो, रानी से मिलने चलते हैं' और हमें गणित के आश्चर्यजनक संसार में ले जाते थे। वे हमें खूब उत्साह से पढ़ाते और कहते, 'मैं यहाँ उन बच्चों के लिए हूँ, जिन्हें लगता है कि वो गणित में अच्छे नहीं हैं। अच्छा और बुरा मन के ख्याल हैं। अगर तुम मेहनती हो और ईमानदारी से विषय को समझना चाहते हो तो तुम विधिपूर्वक इस रानी से मुलाकात कर सकते हो।' वे अपने छात्रों को कक्षा में इस तरह आकर्षित करते, जैसे कोई सपेरा अपनी बीन से नाग को आकर्षित करता है।
उनके अंतिम दिनों में, वे अस्वस्थ थे और मैं एक छोटा-सा तोहफा लेकर उनसे मिलने गई। आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया। वे मुझसे बोले, 'एक शिक्षक का कर्तव्य है कि वह अपने छात्र को जिंदगी का सामना करने का आत्मविश्वास दे। जिंदगी अनजानी परीक्षाएँ लेती हैं। अपने से बेहतर छात्र तैयार करना ही एक शिक्षक के लिए सबसे बड़ी खुशी की बात होती है। मैंने अपना काम बहुत अच्छे से किया है। मेरे छात्र आज कुछ बन गए हैं, यह मुझे आनंदित करता है, उनका शिक्षक कहलाने पर मुझे गर्व होता है।'
मैं उनकी सरल दार्शनिकता, जिसको आचरण में उतारना कठिन है, सुनकर आश्चर्य में थी। वे एक बड़े शहर के, बड़े स्कूल में होते, वे ट्यूशन पढ़ाकर या अपना स्वयं का स्कूल खोलकर पैसा कमा रहे होते। उन्होंने ऐसा नहीं किया। वे अपने आदर्शों में विश्वास रखते थे और उनका जीवन इसका उदाहरण है। उन्होंने मुझे उस मोमबत्ती की याद दिला दी, जो दूसरों को प्रकाश देने के लिए खुद जल जाती है।
आज, जब मैं मंच पर खड़े होकर आत्मविश्वास से बोलती हूँ, जब जिंदगी में कठिनाइयों का सामना करती हूँ, मैं अपने शिक्षक के बारे में सोचती हूँ। उन्होंने मुझे वह सबक सिखाया, जिसे कोई धन खरीद नहीं सकता, कठिनाइयाँ भुला नहीं सकती और कोई विश्वविद्यालय दे नहीं सकता।