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Shraddha Murder Case : 35 टुकड़ों की 35 आहें दूर तक और देर तक सुनाई देना चाहिए....

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स्मृति आदित्य

प्रेम, मोहब्बत, इश्क, आशिकी, प्यार.... इनको सींचते हैं भरोसा, समझदारी,परिपक्वता, संवेदनशीलता, समर्पण, सहनशीलता जैसे गहरे शब्द, लिव इन रिलेशन से लेकर पारंपरिक शादी तक बहु‍त कुछ सहना और सहेजना होता है....
 
35 टुकड़ों में बंटी लाश में से निकल रहे हैं सुलगते हुए सवाल.... शादी की जिद ही श्रद्धा ने इसलिए की होगी क्योंकि कहीं न कहीं सुरक्षा, सम्मान और सहज जीवन के निहितार्थ उसने इन्हीं शब्दों में महसूस किए होंगे... वरना साथ तो रह ही रहे थे, माता पिता से बगावत भी कर ही चुके थे, फिर शादी की जिद क्यों? कैसी शादी, किसकी शादी, शादी के नाम का मजाक भी क्यों ? 

ये आज की पीढ़ी है जिन्हें गलतियां और ठोकर ही सबक देती हैं। सीख और समाझाइश इन्हें चिड़चड़ा और विद्रोही बना देती है। यही वजह है कि जब भरोसा टूट रहा होगा, सुरक्षा दांव पर लगी होगी, सम्मान का भय सता रहा होगा तब जाकर शादी की अहमियत समझ में आई होगी.... मां बाप भी याद आए होंगे... 
 
लिव इन के खिलाफ जाकर कोई नई बहस शुरू नहीं करना है पर जरा सोचिए कि जिस रिश्ते में साथ चलने का साथ रहने का सिर्फ नाम भर हो और साथ रहने का भरोसा दूर दूर तक नहीं हो, रिश्ता रिश्ता न होकर शुद्ध हिसाब किताब वाला व्यापार हो वहां आप क्या उम्मीद करेंगे? 
 
लिव इन से नारी स्वतंत्रता की नई राह खुलती है या शोषण का अत्याधुनिक रास्ता।
 
लिव इन से हम आधुनिक हो रहे हैं या लौट रहे हैं उसी बर्बर युग की ओर जब मानव सभ्य नहीं हुआ था और उसे खुली आजादी थी कभी भी, किसी भी स्त्री या पुरुष के साथ मनचाहे दिनों तक रहने की। और जब चाहे उसे छोड़ देने की। सच तो यह है कि मानव की विकास-यात्रा में जितने और जैसे-जैसे प्रयोग महिला और उसकी आजादी के साथ हुए उतने शायद ही किसी और के साथ हुए होंगे।
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आदिम युग
इस युग की स्त्री को एक से अधिक पुरुषों से संबंध बनाने की पूर्ण आजादी थी। उन पुरुषों का उस पर कोई अधिकार भी नहीं था। स्त्री का अपना एक वजूद था। स्त्री तय करती थी कि अपना शरीर उसे कब, किसे और कितने दिनों तक सौंपना है। वह जब चाहे जितने चाहे बच्चे पैदा कर सकती थी। और तो और जिस पुरुष से चाहे उससे बच्चों को जन्म दे सकती थी। आदिम युग में आजादी इसलिए भी थी क्योंकि गुलामी नहीं थी। आजादी शब्द की गुहार ही तब लगी जब कबीलाई परंपरा के आगमन के साथ स्त्रियों की दुर्दशा शुरू हुई।
 
कबीला युग
जैसे-जैसे मानव की समझ में विस्तार हुआ, कबीलाई प्रथा ने जन्म लिया। प्राकृतिक आपदाओं और दुश्मनों से बचने के लिए मानव ने समूहों में रहना आरंभ किया। जब एक कबीला दूसरे कबीले की स्त्रियों और बच्चों को लूटने लगा और जब स्त्रियों की वजह से कबीलों में संघर्ष होने लगा तब शायद इस जरूरत ने जन्म लिया होगा कि स्त्री को अपने ही अधिकार में कैसे रखा जाए।
 
यहां से आरंभ होता है महिलाओं के दमन का ऐसा कुचक्र जो समय बदलने के साथ अपनी गति पकड़ता गया पर थमा नहीं। दिशा बदलता रहा पर सुधरा नहीं। 
 
सभ्य युग
हमारी सामाजिक व्यवस्था के सभ्य और सुसंस्कृत होने के साथ ही विवाह नाम की संस्था ने जन्म लिया। विवाह नामक संस्था या कहें कि संस्कार के साथ दो विपरीत लिंगी के जन्म-जन्मान्तर तक साथ रहने की एक अनूठी परंपरा अस्तित्व में आई। एक ऐसी सुगठित समन्वित व्यवस्था जिसमें दो अपोजिट सेक्स मान्यता प्राप्त तरीके से साथ जीवन गुजार सकते हैं। इस तरह से जीवन यापन को समाजिक सम्मान और प्रतिष्ठा की नजर से देखा जाने लगा। विवाह परंपरा ने महिलाओं को सुरक्षा कवच प्रदान किया। 
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राजा-महाराजाओं का युग
यह वह युग था जब स्त्रियां तमाम वैभव और ऐश्वर्य को तो भोग रही थी, मगर खुद भी भोग की एक वस्तु बन गई। राजा-महाराजा युद्धों में उसे जीत कर लाने लगे। और जिसे जीत कर हासिल किया हो भला उसका भी कोई सम्मान हो सकता था? वह जीत कर लाई गई एक ऐसी सामग्री बन गई जिसका पुरूष राजा को भरपूर इस्तेमाल करने का अधिकार प्राप्त था।
 
इस युग में नारी ने अपनी पसंद के जीवनसाथी को चयन करने का अधिकार स्वयंवर द्वारा हासिल किया। लेकिन राजकुमार-राजकुमारियों के कई ऐसे किस्से हमें मिलते हैं जिनमें विवाह परंपरा को धता बता कर उन्होंने रिश्ते बनाए और निभाए।
 
पौराणिक युग
पौराणिक युग की हर कथा में चाहे वह मेनका हो या शकुंतला, उर्वशी, चित्रलेखा हो या चित्रांगदा, विवाह पूर्व या विवाह बिना संबंध बनाने की बात सामने आती है। द्वापर युग की कुंती हो या निषाद पुत्री, सुभद्रा हो या रुक्मणि, सभी ने अपनी पसंद के पुरुष से बिना विवाह संबंध बनाए और उनके परिणाम-दुष्परिणाम भोगे।
 
लिव इन पर 2010 में आया था फैसला 
प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन, न्यायमूर्ति दीपक वर्मा और न्यायमूर्ति बीएस चौहान की पीठ ने 2010 में एक फैसले पर कहा था कि कि दो बालिग लोगों का एक साथ रहना कोई अपराध नहीं है? कोई गुनाह नहीं है। यह अपराध नहीं हो सकता अगर दो लोग अपनी मर्जी से साथ रहते हैं।
 
विरोध के स्वर
इस फैसले के साथ ही उठा था एक बवंडर। पारंपरिक सोच वालों के अनुसार इस तरह का फैसला आना दुर्भाग्यजनक है। हमारा सनातन धर्म इस बात की अनुमति कतई नहीं दे सकता कि दो लोग विवाह नामक पवित्र संस्कार की अवहेलना कर इस तरह साथ रहें और जब जी चाहे अलग हो जाए। इससे पतन की राह पर आगे बढ़ने का युवाओं में दुस्साहस पैदा होगा। अब तक जो युवा परिवार की मर्यादा या कानून के डर से रिश्ते को खुला रूप देने में हिचकिचाते थे उनमें भी इस गलत बात के लिए हिम्मत पैदा होगी। यानी कहीं कोई एक दबाव की जो परत है वह इस फैसले से चटक जाएगी। यूं भी आज का युवा अब किसी के बस का नहीं रहा। इस फैसले से उसमें आत्मविश्वास की अति का जन्म होगा। जो समय गुजरने पर गर्भपात, हिंसा और बेशर्मी का भी जनक होगा। हा‍लिया श्रद्धा-आफताब केस उसी का नतीजा है।  
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लड़के फायदा उठाएंगे
लिव इन पर फैसला जब आया तब यह शंका सामने आई थी कि लड़के फायदा उठाएंगे और देखिए नतीजे सामने आने लगे हैं। लड़के किस कदर फायदा उठा रहे हैं उस अदालती फैसले का। जो युवा व्यक्तिगत रिश्तों में पहले एक सीमा के बाद आगे नहीं बढ़ते थे अब उन्हें किसी बात का कोई खौफ नहीं रहा। भोली-भाली लड़कियों की भावनाओं से खेलना पहले ही जिनका शगल था वे अब देह तक पहुंचने में देर नहीं कर रहे हैं और शादी जैसी बात पर 35 टुकड़ों में काट भी रहे हैं। मानवीयता के बचे-खुचे धरातल खोए जा चुके हैं क्योंकि कानूनन उन पर कोई बंधन नहीं है।
 
छली जा रही हैं लड़कियां
वे लड़कियां जो कल तक इस तरह के सहजीवन से अपनी शादी, करियर, भविष्य, कानूनी उलझन और बदनामी के डर से बचती रही वे लिव इन की स्वीकृति से गलत शिकार बन रही हैं। वे यह सोचकर कि इस तरह साथ जीवन गुजारना कोई गुनाह नहीं है, अपने आपको खुद भी छल रही हैं और लड़कों से भी छली जा रही हैं। हम आज बढ़ती और बदलती तकनीक से खुलेपन के ऐसे युग में जी रहे हैं जहां कभी भी, किसी भी वक्त कोई भी वांछित लेकिन अवैध चीज सरलता से पाई जा सकती है। ऐसे में शारीरिक, मानसिक, सांस्कृतिक और सामाजिक मर्यादा व मूल्य बचाए रखने का दायित्व आखिर कौन निभाएगा?
 
देह को लेकर चाहे हम सामाजिक परिधियों और वर्जनाओं का उल्लंघन कर लें मगर नैसर्गिक रूप से भुगतना तो लड़की को ही है। 35 टुकड़ों में बंटी लाश इस बात का सबसे ताजा उदाहरण है। कानून के नाम पर नैतिकता को ताक पर रखने का प्रयास तो पहले ही हो चुका था अब अनुशासनहीन जीवन के ये हिंसक परिणाम हमें कहीं का नहीं छोड़ेंगे... नृशंस हत्या, अवसादग्रस्त आत्महत्या और यौन रोगों की बढ़ती संख्या को देखते हुए जरूरी है कि हम पर हमारा ही नियंत्रण, नियम और शासन रहे। कानूनन चाहे हमें किसी भी रूप में रहने की आजादी मिल जाए लेकिन एक जिंदगी के 35 टुकड़ों में कट जाने के बाद लड़कियों को कैसा जीवन जीना है यह उनका विवेक ही तय करें तो बेहतर है।
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विवाह का महत्व हमेशा रहेगा
वैदिक ऋचाओं में गुंथे मंत्रों के उच्च स्वर के बीच जब दो मन का मिलन होता है तब वातावरण में पवित्र और सकारात्मक तरंगे लहराती हैं। ये तरंगे ही एक-दूजे को हमेशा साथ रहने की प्रेरणा और ऊर्जा देती है। माता-पिता और स्नेहीजनों के आशीर्वाद में इतनी शक्ति होती है कि दाम्पत्य जीवन की हर बाधा को निर्विघ्न पार किया जा सकता है। सम्मान, सुरक्षा और प्रतिष्ठा की जो चमक विवाह करने के उपरांत चेहरे पर आती है वह यूं ही साथ रहने से मलीनता में बदल जाती है।
 
तय हमें करना है कि हम अपने जीवन में गरिमा और गौरव को वरीयता देते हैं या लिव इन के दम पर बनाए अस्तित्वहीन रिश्ते को? एक ऐसा रिश्ता जिसका कोई आधार नहीं, कोई मूल्य नहीं, कोई समर्पण नहीं, कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं। जो रिश्ता इनमें से किसी भी प्रकार की गारंटी नहीं लेता वह समाज की नजर में तो दूर खुद की ही नजरों में कितना सम्मानजनक होगा?
 
यह शोषण है स्वतंत्रता नहीं
इस रिश्ते में छल, कपट, शोषण और एक दूजे को इस्तेमाल करने की भावना अधिक होगी ही... जो बिना किसी सामाजिक बंधनों के बना है। एक दूजे के प्रति सम्मान की भावना भी नदारद होगी ही...हमें इस बात को मान लेने में हिचक नहीं होना चाहिए कि 'लिव इन' महिलाओं के शोषण की नई राह खोल रहा है, खोल चुका है..।

तथाकथित स्वतंत्र युवतियों को भी अपने मानस में स्वतंत्रता की इस नई और छद्म परिभाषा को बसाने से पहले सोचना चाहिए कि यह शोषण का ही आधुनिक रूप है। बलात्कार का ही नया और 'सभ्य' तरीका है, जहां सिवाय बर्बादी, बदनामी और 35 हिस्सों में बंट जाने के सिवाय हासिल कुछ नहीं होगा।
 
बहरहाल 35 टुकड़ों की 35 आहें, 35 सवाल.... करोड़ों लड़कियों को दूर तक और देर तक सुनाई देना चाहिए....
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