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महिला दिवस पर कविता : घर में भी थी एक उदास औरत

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रीमा दीवान चड्ढा

तुमने देखा
कुछ औरतों की तस्वीरें
छपी हैं अखबारों में
मिल रहा उन्हें सम्मान
महिला दिवस पर
बहुत खुश हैं आज ये महिलाएँ

कुछ औरतों ने
नये कीर्तिमान रचे
अपने क्षेत्र के शीर्ष पर थीं वे
जाने कितने संघर्ष के बाद
जीते थे उन्होंने पदक ....

उनकी विजयी मुस्कान !!
बहुत भली सी लगतीं हैं
हँसने मुस्कुराने वाली ये औरतें
टी.वी. के पर्दे पर
सिनेमा के बड़े पर्दे पर
बड़े बड़े विज्ञापनों में
चमकती /दमकती
अपनी अदाओं से लुभाती
सबको बहुत भली लगतीं हैं ....

हर मुस्कुराती औरत के पीछे
एक उदास औरत थी
उस उदास औरत की
 उदासी की वजह
ये समाज ही था
जो आज उसकी
जीत पर बजा रहा था तालियाँ ...

अख़बारों ,टी.वी. के पर्दों
और सिनेमा की स्क्रीन पर
चमकती तस्वीरों की
मुस्कान पर मोहित होने वालों
हर उदास औरत
इसी तरह चहकना चाहती है
मुस्कुराना चाहती है
खिलखिलाना चाहती है
तुमने कभी नहीं देखा
तुम्हारे घर में भी थी एक उदास औरत
और थी तुम्हारे पड़ोस में भी .....

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