Yoga Articles %e0%a4%9a%e0%a4%be%e0%a4%b9%e0%a5%87 %e0%a4%95%e0%a5%8b%e0%a4%88 %e0%a4%ae%e0%a5%81%e0%a4%9d%e0%a5%87 %e0%a4%9c%e0%a4%82%e0%a4%97%e0%a4%b2%e0%a5%80 %e0%a4%95%e0%a4%b9%e0%a5%87 109021100051_1.htm

Hanuman Chalisa

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia

चाहे कोई मुझे जंगली कहे...

Advertiesment
योग
आदमी भूल गया है प्रकृति के साथ रहना इसीलिए बीमारियों की गिरफ्तर में आ जाता है जबकि शरीर की प्रकृति नहीं है बीमार होना। सोचें जो जंगली पशु या पक्षी हैं वे कौन-से अस्पताल में जाते हैं।

ND
शहरी मानव जीवन की भागमभाग में खुद को तो भूल ही गया है साथ ही वह प्रकृति से दूर होकर प्राकृतिक जीवनशैली भी खो चुका है। जबरन की बौद्धिकता या स्टेटस के चलते जीवन को खोने से तो अच्छा है कि ठेठ गँवार, देहती या आदिवासी बनकर स्वस्थ जीवन का मजा लिया जाए। इससे रोग और शोक भी दूर भागने लगेंगे।

जब हम शहर में शहरी जीवनशैली ‍जीने लगते हैं तो वहाँ की धूल, धुँआ और धूप हमारे स्नायुतंत्र, रक्त परिवहन तंत्र, श्वास-संस्थान तथा पाचनतंत्र को कमजोर कर देती है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से ही हमारा बीमार होना तय हो जाता है। योग आपके उक्त सभी संस्थानों को फिर से प्रकृति प्रदत्त बनाने के लिए कुछ विधियाँ बताता है।

अन्नमय कोष : इस शरीर को अन्नमय कोष कहा गया है अर्थात इसका निर्माण अन्न और आबोहवा से होता है इसके लिए यौगिक आहार, आसान और विहार को अपनाएँ। इससे शरीर में ताजगी और स्फूर्ति बनी रहेगी।

प्राणमय कोष : यह कोष शरीर का वायु और जल तत्व संचालित करता है। शरीर के भीतर वायु के आवागम से रक्त और अन्न रस संचालित होते हैं। वायु की शुद्धता शरीर और मन के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसकी शुद्धता के लिए प्राणायम का सहारा लें। प्राणायम से दूषित वायु का निष्कासन और पवित्र वायु का संचार होगा।

मनोमय कोष : मन को ही मनोमय कोष कहते हैं। यदि हम निरंतर नकारात्मक भाव दशा में रहने के आदी हैं तो कितने ही आसन या प्राणायाम करें सब व्यर्थ सिद्ध होंगे। मन को श्रेष्ठ मनोरंजन और अध्ययन से पुष्ट करें। उसे बेचैनी, चिंता और उत्तेजना से बचाकर रखें। निरंतर प्रकृति के दर्शन करते रहने से मन शांत रहता है।

तीनों कोष यदि स्वस्थ, पुष्ट और संतुष्ट हैं तभी चित्त या आत्मा विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष में स्थित होकर मुक्त हो सकती है।

webdunia
IFM
जंगली बनो :
तीर्थंकर, तपस्वी या बुद्धपुरुषों के जीवन को तो आप जानते ही हैं। वे या तो पहाड़ पर अपना ढेरा जमाते थे या जंगल में जंगली जीवनशैली बिताते थे। वहाँ रहकर वह पूरी तरह से निरोगी बने रहते थे। आज भी यदि जंगली आदिवासियों का अध्ययन करें तो पाएँगे कि वे शहरी मानव से कहीं ज्यादा हष्ट-पुष्ट है, जबकि वे न तो जिम जाते हैं और न ही योग करते हैं, फिर भी वे जंगली बने रहकर सेहतमंद हैं। जंगली बने रहने का अर्थ है प्रकृति के नजदीक रहना और जंगलीपन न छोड़ना।

कैसे बनें जंगली :
आप बिस्तर पर गुलाटियाँ लगाना तो भूल ही गए हैं। दौड़ना, कूदना भी आपने छोड़ दिया है। मुँह चिढ़ाना, जोर से हँसना या मजाक करना भी छोड़ दिया है। सभ्यतावश यदि आप छींक को दबाते रहेंगे तो कैसे दूषित वायु बाहर होकर हृदय में रक्त संचार होगा। जोर से खाँसना छोड़ दिया है तब कैसे आप जंगली कहलाएँगे? ऐसा करने से आपकी माँस-पेशियों में सुचारु रूप से रक्तसंचार होता रहता है जिस कारण यौवनपन बरकरार रहता है।

webdunia
ND
पशुवत आसन :
क्या आप जानते हैं कि आसन या प्राणायाम की सभी विधियाँ पशु और पक्षियों के रहन-सहन को देखकर ही बनाई गई हैं। वह इसलिए कि आपका जंगलीपन बरकरार रहे। सोचें मत्स्यासन अर्थात मछली जैसी आकृति बनाने की हमें क्या जरूरत है।

सोचें जब कुत्ते को गर्मी लगती है तो वह अपनी जबान बाहर निकालकर कैसे भ्रस्तिका करता है। बिल्ली जब सोकर उठती है तो अपने पैरों को नजदीक लाकर उसकी नसों को तानती है जिससे उसकी पीठ का भाग ऊँचा उठ जाता है। यह भी एक विशेष तरह का आसन है, जिससे उसके स्नायुतंत्र पुन: सक्रिय होकर स्फूर्तिदायक बन जाते हैं।

इसी प्रकार प्राचीन ऋषियों ने शेर, सर्प, मयूर, ऊँट, खरगोश आदि कई जानवारों के स्वस्थ रहने का अध्ययन किया और उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखकर आसनों और प्राणायमों का अविष्कार कर मानव जाति को 100 वर्ष तक स्वस्थ बने रहने की कुंजी दे दी। इसीलिए कहते हैं कि थोड़ा-सा जंगली बनो।

यह भी देखें :-
बदल दें लाइफ स्टाइल

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi