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दिल का मामला है...

हृदय रोग की देखभाल

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हृदय रोग
''हृदय वीणा की तरह होता है। यदि तार ढीले हैं या फिर ज्यादा कसे हैं तो दोनों ही स्थिति में नहीं बजेगी।''

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क्या है हृदय : सामान्यत: युवावस्था में हृदय एक मिनट में 70-75 बार धड़कता है। बच्चों का हृदय तेजी से और बूढ़ों का हृदय धीमे धड़कता है। कई कारणों से हृदय की धड़कन तेज या कम हो जाती है, जिससे हृदय में विकार उत्पन्न हो जाता है- जैसे भय, अतिहर्ष, ज्वर, अनेकानेक रोगों में, मैथुन की इच्छा या क्रिया, भोजन करने, अति-कसरत करने से हृदय की गति तेज हो जाती है।

क्लेश, निर्बलता और उपवास से हृदय की गति मंद हो जाती है। कई औषधियों के सेवन से हृदय गति बढ़-घट जाती है। किसी भयंकर दृश्य को देखने से या कोई दुखद समाचार अचानक सुनने से हृदय की धड़कन एकदम बंद हो जाती है।

हृदय एक दिन में एक लाख से अधिक बार धड़कता है और दिनभर में 7500 ल‍ीटर से अधिक रक्त धमनियों को देता है। इससे ही शरीर के विभिन्न अंग शक्ति पाते हैं और उनके क्रियाकलाप संभव हो पाते हैं। अलग-अलग कारणों और लक्षणों के रूप में हृदय की इन धमनियों में रुकावट आ जाना ही 'हार्ट अटैक' कहलाता है।

क्या हैं धमनियाँ : पेंसिल के आकार की दो मुख्य कारोनरी धमनियाँ और उनसे निकली हुई बहुत-सी छोटी बड़ी शाखाएँ- ये ही हृदय का जीवन है। उनसे ही उसे ऑक्सीजन और ग्लूकोज रूपी ईंधन मिलता है। शक्तिशाली माँसपेशियों को ईंधन की आवश्यकता होती है।

आमतौर पर कारोनरी धमनियाँ हृदय की आवश्यकताओं का पूरा-पूरा ध्यान रखती हैं। जब हृदय को अधिक काम करना पड़ता है (जैसे अधिक मानसिक दबाव या शारीरिक श्रम के समय) तब इन धमनियों के आयतन में अपने-आप फैलाव आ जाता है। फलत: उनमें रक्त का बहाव बढ़ जाता है और हृदय की इन धमनियों की भीतरी दीवारों में वसा की परत जमा हो जाती है।

इनमें कभी-कभी यूँ ही सिकुड़न आ जाती है, जिससे हृदय को उसकी पूरी खुराक नहीं पहुँच पाती। जिस समय हृदय पर अधिक काम का जोर पड़ता है, तब उसके लिए यह स्थिति असहनीय हो जाती है और हृदय तिलमिलाकर अपने रोगी होने की सूचना बाहर भेजने लगता है।

रोग के प्रकार : हृदय रोग के दो प्रकार हैं- (1) इंजाइना (2) दिल का दौर

(1) इंजाइना : कारोनरी धमनी रोग की प्रारम्भिक अवस्था है। शक्ति वाहक कारोनरी धमनियों में उत्पन्न हुई सिकुड़न को काफी हद तक सहने की कोशिश करता है, जब स्थि‍‍ति तनावपूर्ण हो जाती है और वह प्रतिकूल परिस्थितियों को कबूल नहीं कर पाता।

लक्षण : रोगी को इसका पता तब चलता है जब उसके सीने में बाईं ओर दर्द उठने लगता है, भारीपन रहने लगता है। बेचैनी होने लगती है और वह स्वयं को थका-थका महसूस करता है। जाँच कराने से ही रोग का पता लगता है कि यह इंजाइना है या नहीं।

(2) दिल का दौरा : किसी बड़ी कारोनरी धमनी में जब अचानक रुकावट आ जाने से रक्त का बहाव रुक जाता है, तब दिल के उस भाग की माँसपेशियाँ जीवित नहीं रह पातीं- इसे ही 'हार्ट अटैक' कहा जाता है।

रोग का लक्षण : सीने में बाईं ओर प्राणलेवा दर्द उठना, छाती पर कोई बहुत भारी वस्तु रख दिए जाने का अहसास होना। दर्द का कंधे, गर्दन और अँगुलियों तक फैलना, पसीना छूटना, घबराहट होना, मितली की ‍शिकायत होना आदि इसके लक्षण हैं। इन लक्षणों वाला रोगी बेहोश भी हो जाता है और धड़कन भी रुक जाती है।

रोग के कारण : मोटापा, धूम्रपान, रक्त में कोलेस्ट्रोल की अधिकता, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मदिरापान, अधिक मात्रा में वसायुक्त आहार, भागदौड़ का तनावयुक्त जीवन आदि इसके मुख्य कारण हैं।

फेफड़े, त्वचा और गुर्दे में खराबी से भी हृदय रोग की सम्भावना बनती है। अधिक काम करना, मनोरंजन का कोई साधन न होना, पूरी नींद न लेना, समय पर न खाना, माँस खाना, अधिक चाय या कॉफी पीना, अत्यधिक औषधियों का सेवन करना- ये सब हृदय रोग के कारण हैं।

क्या करें : इमरजेंसी स्थिति में तुरंत डॉक्टरी सहायता लेना चाहिए। रोगी को पीठ के बल लेटा दें। कपड़े ढीले कर दें। यदि दिल की धड़कन रुकती नजर आए तो उसके सीने की मालिश करें। दबाव के झटके दें, मुँह से मुँह सटाकर श्वास दें। मरीज खाँस सके तो ज्यादा से ज्यादा खाँसे।

हृदय रोग का उपचार :

(A) हृदय रोग है तो : बेफिक्र रहें। शराब-माँस आदि व्यसनों तथा तीखे और चरके पदार्थों का सेवन न करें। मीठा न खाएँ। नमक और चिकनाईयुक्त भोजन का त्याग करें। केवल फलों और सब्जियों के रस पर कुछ दिन रहें। हो सके तो केवल फल-फ्रूट, जौ क‍ी रोटी और लोकी की सब्जी खाएँ। सुबह-शाम नींबू पानी, नींबू-गर्म पानी-शहद, किसी फल या सब्जी का रस पीएँ।

(1) सावधानी : सर्दी से बचें। कफ न होने दें। पेट साफ रखें। कम बोलें। शोरगुल, धूल-धुएँ और तेज धूप से बचें।
(2)योगासन : अंग संचालन करें। शवासन और पर्वतासन करें। स्वस्थ रहने पर सामान्य आसन करें जिनमें वज्रासन, उष्ट्रासन, शलभासन, मकरासन, पवनमुक्तासन, मत्स्यासन, सिंहासन आदि करें। सुविधा अनुसार अभ्यास को बढ़ाएँ। अंत में 5 से 10 मिनट का शवासन अवश्य करें।
(3) प्राणायाम : नाड़ी-शोधन, कपालभांत‍ि तथा भ्रामरी को धीरे-धीरे नियमित करें।
(4) योगनिद्रा : शवासन में योगनिद्रा 20-40 मिनट तक करें। उसके बाद आधा घंटे रुचिकर शांतिदायक संगीत सुनें।

(B) हृदय रोग न हो तो : हमेशा स्वस्थ्य और मजबूत रहने के लिए प्राणायम, आसन, आहार संयम और योगनिद्रा तथा ध्यान को जीवन का हिस्सा बनाएँ। तनावमुक्त जीवन जीएँ। तनावमुक्त रहने के लिए नाड़ी-शोधन प्राणायाम करें और शरीर पुष्‍ट रखने के लिए सूर्यासन या सूर्यनमस्कार करें।

(1) आहार संयम : जितने कम से कम भोजन से काम चलता है, तो चलाएँ। यदि वजन अधिक हो तो कम करें। इस रोग में उपवास से बचें, इसलिए फल और सब्जी का रस, मधु, किशमिश, अंजीर, गाय का ताजा दूध आदि ही लें। भोजन में प्रतिदिन काफी मात्रा में सलाद सेवन करें। सलाद खट्टा न हो।

आप जो भी खाएँ, थोड़ा, चबाकर और आराम से खाएँ। खाने के साथ ही पानी कम पीएँ। खाने के आधे से एक घंटे बाद पानी पीएँ। थोड़ा-थोड़ा घूँट-घूँट कर पीएँ। सोने से ढाई घंटे पूर्व भोजन करें। भोजन प्रसन्न मुद्रा में करें। बातें न करें। क्रोध करना और ऊँचा बोलना छोड़ दें।

नोट- अंतत:- योग्य योग चिकित्सक से सलाह लेकर ही योगासनों का लाभ लें।

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