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बड़े ध्यान का बड़ा जादू

योग का साँतवें अंग की धूम

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ध्यान
जापानी का झेन और चीन का च्यान यह दोनों ही शब्द ध्‍यान के अप्रभंश है। अंग्रेजी में इसे मेडिटेशन कहते हैं, लेकिन अवेयरनेस शब्द इसके ज्यादा नजदीक है। वर्तमान में ध्यान की धूम मची हुई है, लेकिन क्रियाओं को ध्यान समझने की भूल भी की जा रही है। विधि को भी ध्यान समझने की भूल की जा रही है।

ND
जागरूकता : वर्तमान में जीने से ही जागरूकता जन्मती है। भविष्य की कल्पनाओं और अतीत के सुख-दुख में जीना ध्यान विरूद्ध है। दृष्टा हो जाओ या फिर नष्ट हो जाओ। ध्यानियों की कोई मृत्यु नहीं होती। लेकिन ध्यान से जो अलग है बुढ़ापे में उसे वह सारे भय सताते हैं, जो मृत्यु के भय से उपजते हैं। अंत काल में उसे अपना जीवन नष्ट ही जान पड़ता है।

ध्‍यान का प्रचलन : वर्तमान में पश्चिमी देशों में ध्यान और योग का प्रचलन बढ़ता जा रहा है और बढ़ेगा भी क्योंकि असल बात लोगों को देर से ही समझ में आती है, वे ध्यान या योग का नाम सुनकर ऐसा समझते हैं कि कोई परम्परागत बात हो रही है, जबकि कार्पोरेट और सिनेमाई जगत में भी अब इस ओर रूझान बढ़ा है। जरूरी नहीं है कि ध्यान से हमें किसी प्रकार का आध्‍यात्मिक लक्ष्य साधना हो, ध्यान से सांसारिक लक्ष्य भी साधे जा सकते हैं।

सिर्फ तुम : खुद तक पहुँचने का एक मात्र मार्ग ध्‍यान ही है। ध्यान को छोड़कर बाकी सारे उपाय प्रपंच मात्र है। यदि आप ध्यान नहीं करते हैं तो आप स्वयं को पाने से चूक रहे हैं। स्वयं को पाने का अर्थ है कि हमारे होश पर भावना और विचारों के जो बादल हैं उन्हें पूरी तरह से हटा देना और निर्मल तथा शुद्ध हो जाना।

ज्ञानीजन कहते हैं कि जिंदगी में सब कुछ पा लेने की लिस्ट में सबमें ऊपर स्वयं को रखो। मत चूको स्वयं को। 70 साल सत्तर सेकंड की तरह बीत जाते हैं। योग का लक्ष्य यह है कि किस तरह वह तुम्हारी तंद्रा को तोड़ दे इसीलिए यम, नियम, आसन, प्राणायम, प्रत्याहार और धारणा को ध्यान तक पहुँचने की सीढ़ी बनाया है।

क्या होगा ध्यान से : हर तरह का भय जाता रहेगा। चिंता और चिंतन से उपजे रोगों का खात्मा होगा। शरीर में शांति होगी तो स्वस्थ अनुभव करेंगे। कार्य और व्यवहार से सुधार होगा। रिश्तों में तनाव की जगह प्रेम होगा। सफलता के बारे में सोचने मात्र से ही सफलता आपके नजदीक आने लगेगी। दृष्टिकोण सकारात्मक होगा। शुद्ध रूप से देखने की क्षमता बढ़ने से विवेक जाग्रत होगा। विवेक के जाग्रत होने से होश बढ़ेगा। होश के बढ़ने से मृत्यु काल में देह के छूटने का बोध रहेगा। देह के छूटने के बाद जन्म आपकी मुट्‍ठी में होगा। यही है ध्यान का महत्व।

ध्यान विधियाँ : ध्यान करने की अनेकों विधियों में एक विधि यह है कि ध्यान किसी भी विधि से किया नहीं जाता, हो जाता है। फिर भी जाने की भगवान शंकर ने माँ पार्वती को 112 विधियाँ बताई थी जो 'विज्ञान भैरव तंत्र' में संग्रहित हैं। इन विधियों के माध्यम से ध्यान को जाग्रत किया जा सकता है। इसके अलावा जैन, बौद्ध तथा साधु संगतों में अनेक विधियों का प्रचलन है। उन तमाम विधियों में से आप किसी भी एक विधि का चयन कर लें और बस उसे ही करते रहें। ध्यान धीरे-धीरे घटित होने लगेगा और आपके आसपास जादू भी।

मृत्यु आए उससे पहले पूर्णिमा का चाँद निकले उस मुकाम तक ले जाओ अपने होश को।

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