Publish Date: Tue, 03 Aug 2010 (15:32 IST)Updated Date: Tue, 03 Aug 2010 (15:31 IST)
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भ्रामरी प्राणायाम करते समय भ्रमर अर्थात भँवरे जैसी गुंजन होती है, इसी कारण इसे भ्रामरी प्राणायाम कहते हैं। भ्रामरी प्राणायाम से जहाँ मन शांत होता है वहीं इसके नियमित अभ्यास से और भी बहुत से लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।
विधि- सुखासन, सिद्धासन या पद्मासन में बैठकर सर्वप्रथम दोनों होथों की अँगुलियों में से अनामिका अँगुली से नाक के दोनों छिद्रों को हल्का सा दबाकर रखें। तर्जनी को कपाल पर, मध्यमा को आँखों पर, सबसे छोटी अँगुली को होठ पर और अँगुठे से दोनों कानों के छिद्रों का बंद कर दें।
फिर श्वास को धीमी गति से गहरा खींचकर अंदर कुछ देर रोककर रखें और फिर उसे धीरे-धीरे आवाज करते हुए नाक के दोनों छिद्रों से निकालें। श्वास छोड़ते वक्त अनामिका अँगुली से नाक के छिद्रों को और अँगुठे से कानों के छिद्रों को हल्का-सा दबाएँ और फिर छोड़ दें, जिससे कंपन उत्पन्न होगा।
जोर से पूरक करते समय भँवरी जैसी आवाज और फिर रेचक करते समय भी भँवरी जैसी आवाज उत्पन्न होना चाहिए। पूरक का अर्थ श्वास अंदर लेना और रेचक का अर्थ श्वास बाहर छोड़ना होता है।
सावधानी : भ्रामरी प्राणायाम को लेटकर नहीं किया जाता। नाक या कानों में किसी प्रकार का संक्रमण होने की स्थिति में यह अभ्यास ना करें। अभ्यास की सही प्रक्रिया समझकर ही अभ्यास करें। हृदय और फेफड़ों में गंभीर समस्या होने की स्थिति में भी इसका अभ्यास नहीं करना चाहिए।
इसके लाभ- इसे करने से मन शांत होकर तनाव दूर होता है। इस ध्वनि के कारण मन इस ध्वनि के साथ बँध सा जाता है, जिससे मन की चंचलता समाप्त होकर एकाग्रता बढ़ने लगती है। यह मस्तिष्क के अन्य रोगों में भी लाभदायक है।
इसके अलावा यदि किसी योग शिक्षक से इसकी प्रक्रिया ठीक से सीखकर करते हैं तो इससे हृदय और फेफड़े सशक्त बनते हैं। उच्च-रक्तचाप सामान्य होता है। हकलाहट तथा तुतलाहट भी इसके नियमित अभ्यास से दूर होती है। योगाचार्यों अनुसार पर्किन्सन, लकवा, इत्यादि स्नायुओं से संबंधी सभी रोगों में भी लाभ पाया जा सकता है।