Publish Date: Fri, 24 Jun 2011 (14:18 IST)Updated Date: Fri, 24 Jun 2011 (14:15 IST)
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योग का अभ्यास गुरु या किसी जानकार व्यक्ति के निर्देशन में ही आरंभ करना चाहिए। मात्र पुस्तकों में पढ़कर नहीं। अन्यथा लाभ के बदले हानि की संभावना अधिक रहती है। योगाचार्यों अनुसार अभ्यास के समय प्रमुख छह आदतें भी साधक को विभिन्न प्रकार की बाधाएं खड़ी कर सकती हैं। ये हैं- अत्याहार, प्रयास, प्रजल्प, नियमाग्रह, जनसंग तथा लौल्य।
अधिक भोजन : अधिक भोजन करने की प्रवृत्ति को अत्याहार कहते हैं। योगाभ्यास के प्रारंभ में स्वाभाविक रूप से जठराग्नि अर्थात भूख बढ़ती है। अतः यह ध्यान रखना चाहिए कि डटकर भोजन न करें। वैसे तो सामान्य अवस्था में भी अधिक भोजन उचित नहीं कहा गया है क्योंकि इससे आलस्य, निद्रा, मोटापा आदि उत्पन्न होते हैं।
जोर-जबरदस्ती : शरीर के कड़ेपन के चलते प्रारंभ में कुछ योगाभ्यास ठीक से नहीं हो पाते है तो साधक जोर लगाकर अधिक 'प्रयास' से अभ्यास को जल्दी से जल्दी करता है। यह प्रवृत्ति घातक है। अतः शरीर की क्षमता को ध्यान में रखते हुए अपनी ओर से कभी अधिक प्रयास नहीं करना चाहिए। सामर्थ्यानुसार अपने आप जितना हो सके, उतना ही करें।
दिखावा : कुछ लोगों की प्रवृत्ति होती है अपने अभ्यासों के संबंध में लोगों को बढ़ा-चढ़ाकर कहना, योगाभ्यास में इसे विघ्न माना गया है। इसे प्रजल्प कहते हैं। क्योंकि इससे अभ्यास से प्राप्त होने वाली सफलता संदिग्ध हो जाती है और दिखावापन बढ़ने लगता है। अतः जो भी अभ्यास करें, उसकी चर्चा अनधिकारी व्यक्तियों से कभी न करें।
कड़े नियम : बहुत से लोग कुछ खास नियम बना लेते हैं और आग्रह रखते हैं कि उसी के अनुसार चलेंगे। इसे नियमाग्रह कहते हैं। एक अर्थ में यह ठीक है और ऐसा करना भी चाहिए। किन्तु कभी-कभी यह विघ्नकारक भी हो जाता है।
उदाहरणार्थ- यह नियम बना लिया कि स्नान के बाद ही अभ्यास करेंगे या सुबह-सुबह करेंगे या किसी खास स्थान में ही करेंगे। किन्तु कभी अधिक ठंड हो, स्नान करने में कठिनाई हो, तो शरीर पोंछकर, कपड़े बदलकर भी किया जा सकता है। कभी सुबह न हो पाया तो शाम को ही कर लें। नियमित स्थान पर किसी दिन नहीं हो पाया, तो कहीं दूसरे स्थान पर ही कर लिया। इस प्रकार नियमों में लचीलापन बना रहना चाहिए। याद रहे नियम आपकी सुविधा के लिए हैं, आप नियम के लिए नहीं।
जनसंपर्क : योग के अभ्यास को अधिक लोक-संपर्क में नहीं रहना चाहिए। इससे योगाभ्यास समय में बाधा पहुंचती है। जब अभ्यास का समय हो रहा हो, तब भी लोग घेरे रहते हैं। साथ ही अधिक जनसंग से खानपान की बुरी आदतें भी बनने लगती हैं। अतः जहां तक संभव हो लोगों से कम संपर्क रखें।
चंचलता : चंचलता को योगाचार्य लौल्य कहते हैं। अधिक चंचल प्रवृत्ति भी योगाभ्यास में बाधा सिद्ध होती है। कभी यहां, कभी वहां, कभी कुछ, कभी कुछ, यह प्रवृत्ति ठीक नहीं। शारीरिक चंचलता से मन की चंचलता तथा मन की चंचलता से शारीरिक चंचलता उत्पन्न होती है। अतः शरीर को भी स्थिर रखें, अधिक दौड़धूप न करें और मन को भी शांत व स्थिर रखें। अधिक इधर-उधर की न सोचें।
इस प्रकार उपरोक्त छह प्रकार को योग अभ्यास में विघ्नकारक तत्व माना जाता है। सच्चा साधक या योगाभ्यासी इन विघ्नों से सदा दूर रहकर और अपनी आदतों में सुधार कर अपने योगाभ्यास को सफल बनाता है।