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स्वयं से करें प्यार

मानसिक और शारीरिक स्वास्थ के लिए जरूरी

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स्वाध्याय योग
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आप महत्वपूर्ण हैं। आपके अतिरिक्त कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं। आप हैं तो ही जगत के होने का महत्व है। जब तक आप हैं, आपको जाना जाता है। आपके जाने के बाद आपको लोग भूल जाते हैं। स्वार्थ का अर्थ आप यह माने की स्वयं के होने के अर्थ को जानना।

योग सिर्फ आपके लिए है। आप कैसे स्वयं से जुड़ जाएँ इसके लिए है योग। अपना संगीत, अपना गीत और अपना आनंद। आपके आनंदित रहने से ही सभी आनंदित रहते हैं। आप दुखी हैं तो आपके दुख में कोई भी दुखी नहीं रहना चाहता।

सदा अच्छा महसूस करते रहने या आनंदित रहने से जीवन में खुशी और सेहत बरकरार रहती है यही है योग का रहस्य। योग आपको जोड़ना चाहता है सकारात्मक ऊर्जा से ताकि आप अच्छे से जी सकें। योग के दूसरे अंग नियम के स्वाध्याय के अंतर्गत आता है स्वयं को जानना। स्वयं को जानने से ही होता है- स्वयं से प्यार। कैसे होगा यह संबंध?

इसके तीन स्तर है: 1.पवित्र विचार 2.पवि‍त्र वार्तालाप 3.पवित्र कर्म।

1.पवित्र विचार :
यदि आप ईश्वर को मानते हैं तो आप कुछ भी सोचे उसे ईश्वर सुन रहा है। एक दिन जब आप उसके समक्ष उपस्थित होंगे तो कहीं ऐसा न हो कि अपने बुरे विचारों के कारण उसके समक्ष गर्दन झुका कर खड़ा रहना पड़े।

कोई बात नहीं यदि आप ईश्वर को नहीं मानते तो क्या आप खुद के समक्ष शर्मिंदा होने के लिए तैयार हैं?

कैसे हो विचार पवित्र : ईर्ष्या से द्वैष, द्वैष से दुश्मनी और दुश्मनी से रंजीश का जन्म होता है। सकारात्मक सोच का विकास करें। जब भी कोई बुरा विचार आए तो तुरंत ही कोई अच्छा विचार सोचने लगें। इसे आदत बनाएँगे तो बुरे विचार आना बंद हो जाएँगे।

2.पवि‍त्र वार्तालाप :
ऐसी बातें कहें जिससे लोगों का चित्त प्रसंन्न रहे। कड़वे वचन कहने वाले बहुत मिल जाएँगे और अत्यिधिक मीठे वचन कहने वाले भी कम नहीं है, लेकिन ऐसे वचन कहने वाले कम ही है जिससे लोग प्रसंन्न रहें और उनसे मिलने की का बार-बार इच्छा हो।

वित्र वार्तालाप के लिए किसी दूसरे के प्रति सकारात्मक भाव रखना जरूरी है। किसी को भी बातों या बहस में हरा देना आसान है, लेकिन ध्यान रखें कि वाद-विवाद में कहीं संवाद खो ना जाए।

3.पवित्र कर्म :
जिससे स्वयं को भी सुख मिले और दूसरों को भी ऐसा कर्म किया जाना चाहिए। सभी के हित में किए गए सत्य कर्म से ही जीवन में सफलता और सदगति अर्जित की जाती है। बहुत से लोग अकेले में भी ऐसे कर्म करते हैं जिससे उन्हें खुद को शर्मिंदा होना पड़ता है या किसी ओर के लिए वह परेशानी का कारण बन जाते हैं।

स्वयं से प्यार करने के यह तीन तरीके हैं। आप चाहें तो इनसे असहमत भी हो सकते हैं।

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