यदि जीना चाहते हैं 150 वर्ष, तो जानिए 5 उपाय...

जीने की इच्छा किस में नहीं रहती? स्वस्थ रहकर आप 100 साल तक भी जी लिए तो इससे बेहतर जिंदगी का कोई दूसरा अचीवमेंट शायद नहीं हो सकता। लेकिन आजकल 50 के बाद लोग ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक, डायबिटीज आदि बीमारियों के अलावा कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की चपेट में भी आ जाते हैं।

क्या है इसका कारण और क्या है इसके निदान जानेंगे अगले पन्नों पर।

आपकी आयु आपके शरीर की उपचय और अपचय की क्रियाओं पर निर्भर है यानी यदि आपके शरीर में अपचय की तुलना में उपचय की क्रियाएं बढ़ रही होती हैं तो इसका मतलब आप बुढ़ापे की ओर बढ़ रहे हैं। योगाभ्यास इस हेतु ही करते हैं कि अंतःस्रावी ग्रंथियों के क्रम और चक्रों को उचित व्यवस्था में स्थित किया जा सके। शरीर की चयापचयी क्रियाओं में संतुलन स्थापित कर शरीर के चक्र को सुधारकर शरीर को पूरी तरह दुरुस्त किया जा सकता है।

सवाल यह है कि क्या आप सचमुच ही 150 वर्ष जीना चाहते हैं तो हम आपके लिए यहां लाए हैं कुछ ऐसे जानकारी जिसके सहारे आप ज्यादा कुछ मेहनत किए बगैर शतायु तो हो ही सकते हैं। योग और आयुर्वेद में ऐसे ढेर सारे नियम और उपाय बताए गए हैं। उन्हीं में से हमने कुछ उपायों को चुनकर आपके सामने रखा है।

अगले पन्ने पर पहला नियम और उपाय...


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1. जल पर नियंत्रण : जल, वायु और अन्न से ही शरीर बनता और बिगड़ता है। जल ही जीवन है। जल का अलग-अलग तरह से सेवन करने से सभी तरह के रोग में लाभ मिलता है। जल योग न केवल उच्च रक्तचाप, कब्ज, गैस आदि बीमारियों से मुक्ति दिलाता है, बल्कि यह हमारी हड्डियों, मस्तिष्क और हृदय को मजबूत बनाने में भी खास भूमिका निभाता है।

जल के नियम : जल को पीतल या कांच के गिलास में ही पीना चाहिए। बहुत से रोगों में किसी रंग की बोतल में रखे जल को पीने की डॉक्टर सलाह देते हैं इसलिए रंगीन बोतलों में रखा जल न पीएं। यह आपके स्वास्थय को बिगाड़ देता है। कब्ज पैदा कर देता है। जल न कम पीएं और न ही अत्यधिक। कहीं का भी जल न पीएं। जल हमेशा बैठकर ही पीएं।

जल पूर्णत: शुद्ध होना चाहिए। अशुद्ध जल से लिवर और गुर्दों का रोग हो जाता है। यदि उक्त दोनों में जरा भी इंफेक्शन है तो इसका असर दिल पर भी पड़ता है। लगभग 70 प्रतिशत रोग जल की अशुद्धता से ही होते हैं। जल पीते वक्त सावधानी रखेंगे तो भोजन और प्राण में इसका भरपूर लाभ मिलेगा।

उपाय : जल से ही योग में गणेश क्रिया, जलनेति, धौति क्रिया और वमन क्रिया की जाती है। शरीर में 10 छिद्र हैं। 2 आंखें, नाक के 2 और कान के 2 छिद्र के अलावा मुंह, ‍लिंग और गुदा के छिद्र मिलाकर कुल 10। इन छिद्रों को 10 बार पानी से अच्छे से धोने से उनमें किसी भी प्रकार का विकार नहीं रह जाता।

‘उत्कट’ आसन : रात में ‘तांबे के बर्तन’ में जल रखकर प्रात:काल बासी मुंह से ‘उत्कट’ आसन में बैठकर उसका सेवन करना चाहिए। इस जल से हमारे शरीर में वात-पित्त और कफ का नाश होता है। इस आसन के लिए शुरू-शुरू में 2 गिलास तक जल पीएं। उसके बाद धीरे-धीरे 5 गिलास तक पीने का अभ्यास करें। जल का सेवन करने के बाद शौच आदि के लिए जाएं। इस योग से शरीर में कॉपर की मात्रा जाती रहती है जिससे शरीर को हड्डियों और मांसपेशियों को लाभ मिलता है।

अगले पन्ने पर दूसरा नियम और उपाय...


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2. श्वास पर नियंत्रण : कछुए की श्वांस लेने और छोड़ने की गति इंसानों से कहीं अधिक दीर्घ है। व्हेल मछली की उम्र का राज भी यही है। बड़ और पीपल के वृक्ष की आयु का राज भी यही है। वायु को योग में प्राण कहते हैं। वायु का शुद्ध होना जीवन की दीर्घता के लिए बेहद जरूरी है।

वायु, प्राण, व्यान, अपान, समान आदि वायुओं से मन को रोकने और शरीर को साधने का अभ्यास करना ही असल में प्राणायाम है।

यदि आपके शहर में अधिक वायु प्रदूषण है तो आप उससे बचने के उपाय करें। प्राणायाम में अनुलोम-विलोम करें। जलनेति से भी प्राणवायु ठीक होती है। यदि आप शुद्ध वायु ग्रहण नहीं कर रहे हैं तो कोई गारंटी नहीं कि अच्छा भोजन और कसरत करने के बाद भी आपको कोई बीमारी न हो।

उपाय : 'वनों से वायु, वायु से आयु' कहना किसी भी तरह से गलत न होगा इसलिए अपने घर के आसपास अधिक से अधिक वृक्ष लगाएं। पीपल और बड़ का वृक्ष आपकी आयु बढ़ाने में ज्यादा सक्षम हैं। नियमित तुलसी के 1 पत्ते का सेवन करें। पंचामृत बनाकर पीएं। सिर पर चंदन का टीका लगाएं।

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3. उचित आहार : उत्तम, सात्विक और स्वादिष्ट खाने के बजाए आजकल फास्ट फूड, जंक फूड और कोल्ड ड्रिंक की ओर रुझान बढ़ गया है। इसके चलते व्यक्ति मोटापा, मधुमेह, कब्ज, शरीर में भारीपन आदि समस्याओं का शिकार हो गया है। निरोगी रहकर लंबी उम्र चाहते हैं तो आहार पर ध्यान दें। भोजन से केवल भूख ही शांत नहीं होती बल्कि इसका प्रभाव तन, मन एवं मस्तिष्क पर पड़ता है। 'जैसा खाओ अन्न वैसा बने मन'।

क्या खाएं और क्या न खाएं, जानिए

नियम : सात्विक भोजन करना चाहिए।
उपाय : सप्ताह में एक बार उपवास करना चाहिए।

फलों का ज्यूस : आयुर्वेद में फलों के ज्यूस के अलावा अन्य जड़ी-बूटियों के रस को अमृत समान बताया गया है, लेकिन इन्हें कब पीएं और किसके साथ पीएं यह भी नियम जानकर ही पीएं। यदि आपको संतरे के ज्यूज की जरूरत नहीं है तो उसे पीने का कोई मतलब नहीं। आप किसी प्रकार की दवा का सेवन कर रहे हैं तो संतरे, नींबू और मौसंबी का ज्यूस उस दवा का असर खत्म कर देगा।

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नियमित अंग संचालन : जल, वायु और अन्न के बारे में जानने के बाद जरूरी है नियमित व्यायाम करना। कसरत नहीं, जिम वाला व्यायाम नहीं, अखाड़े वाला व्यायाम नहीं, योग के आसन भी नहीं। बस योग का अंग संचालन करना है।

दंडासन में किए जाने वाले योग अंग संचालन-1

इससे पाचन क्रिया सुचारु रूप से चलेगी और अन्न, जल और वायु अच्छी तरह से पच जाएगी इसलिए सिर्फ सुबह ही शौचादि से निवृत्त होकर अंग संचालन करें।

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योग निद्रा और ध्यान : ध्यान जहां हमारे जागरण को ठीक करता है, वहीं योग निद्रा हमारी नींद को ठीक करती है इसलिए ध्यान और नींद में फर्क करना सीखें।

योग निद्रा : नींद एक डॉक्टर है और दवा भी। आपकी नींद कैसी होगी, यह निर्भर करता है इस पर क‍ि आप दिनभर किस तरह से जीएं। जरूरी है कार्य, विचार, आहार और व्यवहार पर गंभीर मंथन करना। यदि यह संतुलित और सम्यक रहेगा तो भरपूर ‍नींद से स्वास्थ्‍य में लाभ मिलेगा। ज्यादा या कम नींद से सेहत और मन पर विपरीत असर पड़ता है। बेहतर ‍नींद के लिए आप 'योग निद्रा का सहारा लें।

ध्यान : ध्यान का नियमित अभ्यास करने से आत्मिक शक्ति बढ़ती है। आत्मिक शक्ति से मानसिक शांति की अनुभूति होती है। मानसिक शांति से शरीर स्वस्थ अनुभव करता है। ध्यान से विजन पॉवर बढ़ता है तथा व्यक्ति में निर्णय लेने की क्षमता का विकास होता है। ध्यान से सभी तरह के रोग और शोक मिट जाते हैं। ध्यान से हमारा तन, मन और मस्तिष्क पूर्णत: शांति, स्वास्थ्य और प्रसन्नता का अनुभव करते हैं।

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