अगर फिजा में थोड़ी ठंडक हो, गुनगुनी धूप भली लगती हो, कॉलेज का अगली क्लास में लेक्चर न हो तो...? तो आइए बैठें पेड़ों की छाँव के बीच से छनकर आती सूरज की किरणों के नीचे... दोस्तों से बतियाते हुए... गप्पों के साथ पढ़ाई को भी डिस्कस करते हुए और उमंगों की उड़ान को पर देते हुए। यूनिवर्सिटी के तक्षशिला कैंपस के गार्डन में बैठे एमबीए सीएम (कम्प्यूटर मैनेजमेंट) के स्टूडेंट्स से जरा रूबरू हो जाइए और फिर जिंदगी के मायने खुलते चले जाएँगे।
सबके अलग सपने, सबके अलग इरादे लेकिन जब समय हो दोस्ती का, तो ये सब एक ही रंग में रंगे नजर आते हैं। तो चलिए पहले इन सबका इंट्रोडक्शन ले लें। ये हैं- त्रिपुरेश त्रिपाठी उर्फ टीटी, राजेशसिंह केम, कन्हैया जाटव, संदीप कैथवास, अनुज पाठक, तपन बौरासी, राधिका ठाकुर, वैभव बैरागी, रीना वरफा, श्वेता सोनी, कीर्ति बांगड़, सपना द्विवेदी, आशीष विश्वकर्मा, मोहिता चापोरकर, मोना दुबे, एकता मिश्रा, इरा व्यास, विनीता शर्मा, अमित सोलंकी, मीनल दुबे, राजश्री भिलवारे, पारुल गंगराड़े, नेहा मेहता, अपर्णा मेहरा और पूजा लोदवाल।
यहाँ मनाया जा रहा था विनीता शर्माजी का जन्मदिन। जिसके लिए सारे दोस्तों ने मिलकर सरप्राइज़ केक और मस्ती का इंतज़ाम किया हुआ था।
मैं तुलसी तेरे आँगन की
वैसे विनीताजी को सभी दोस्तों ने एक नाम भी दिया हुआ है-"मैं तुलसी तेरे आँगन की।" ऐसे कुछ और नाम हैं- जैसे टीटी यानी त्रिपुरेश हैं गब्बर सिंह और उनकी एक सहपाठी हैं बसंती। ये सारे नाम उन किरदारों पर रखे गए हैं जिन्हें इन्होंने एनुअल फंक्शन में निभाया था। और हाँ, इन्होंने अपने कुछ अध्यापकों को नाम दिए हैं। जैसे- टेडी बियर, केलू सर और चाचा दर्दनाक दुबे। खैर..
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पॉलिटिक्स को हौवा न बनाएँ
राजनीति के बारे में ये कहते हैं कि आम युवाओं के लिए अक्सर पॉलिटिक्स को हौवा बना दिया जाता है। उन्हें इसमें इंटरफेयर करने से भी रोका जाता है। नतीजतन पॉलिटिक्स के तरफ युवाओं का रुझान कम हो जाता है और समाज तथा देश के हित में अपनी ऊर्जा का उपयोग नहीं कर पाते। जबकि यदि शुरू से युवाओं को पॉलिटिक्स में रुचि दिलाकर उन्हें अपनी ऊर्जा का सही उपयोग करने दिया जाए तो संभव है कि देश को कई अच्छे राजनीतिज्ञ मिल सकेंगे और वंशवाद जैसी चीजें भी खत्म हो पाएँगी। ये मानते हैं कि आज आम आदमी में सेल्फ रिस्पांसिबिलिटी की सबसे ज्यादा कमी है। हम आसानी से हर समस्या का ठीकरा व्यवस्था के माथे फोड़ देते हैं और खुद बच निकलते हैं। यह रवैया भी सुधारना होगा।
सफाया करो सफाया
अब लिंगभेद के मामले में वाकई धारणाएँ बदली हैं लेकिन सभी का, खासतौर पर लड़कियों का मानना है कि पुरानी धारणाएँ कहीं न कहीं हावी हो जाती हैं। लड़कियों के मामले में अब भी समाज में कुछ संकीर्णताएँ गहरे पैठी हैं, जिनका सफाया बहुत जरूरी है। लड़कियाँ सिर्फ इतना चाहती हैं कि उनके लिए समाज में वैचारिक स्वतंत्रता वाला स्वस्थ माहौल बने।
झंडू और जा बे
लड़कियाँ, लड़कों से किसी लड़के दोस्त जैसा ही व्यवहार रख पाती हैं, बिना किसी झिझक के। बोलचाल में भी "अबे मत कर", "झंडू", और "जा बे" जैसे शब्द अब लड़कियों के मुँह से भी सुने जा सकते हैं। "दिमाग का दही मत कर", "भइये" आदि जैसे शब्द आसानी से मध्यप्रदेश के युवा से भी सुने जा सकते हैं।