इस बार हम बत्ती गुल के लिए पहुँचे गुजराती कॉलेज। यहाँ पहुँचते ही हमें पार्किंग के पास ही कई विद्यार्थी खड़े मिल गए। बातों में मशगुल लड़कियों के एक ग्रुप से हमने पूछा कि क्या वे बत्ती गुल का हिस्सा बनना चाहेंगी? कुछ देर तक एक-दूसरे का मुँह देखने के बाद इनमें से एक लड़की ने कहा कि चलो यार कुछ नहीं तो पेपर में फोटो तो आएगा... ले लेते हैं हिस्सा। उसकी बात मान कर बाकी सभी लड़कियाँ भी राजी हो ही गईं। बस फिर क्या था। बिना कोई देर किए हमने इन सबके सामने हमारा इस बार का प्रश्न रखा-
प्रश्न- इस बार का रेमन मैगसेसे पुरस्कार किन दो भारतीयों को मिला है?
प्रश्न सुनते ही इन सबके चेहरे की हवाइयाँ उड़ गईं और कुछ देर के लिए खामोशी ही छा गई। यह खामोशी दूर न होते देख सोचा हम ही इस सन्नाटे को तोड़े।
हमने अपनी बात शुरू की बीएससी अंतिम वर्ष की छात्रा टीना जोशी से। हाँ तो टीना आप ही बताइए इसका जवाब। अपने दिमाग पर जोर डालने का कष्ट किए बिना ही इन्होंने सीधे कह दिया कि इन्हें इस बारे में कोई अंदाजा नहीं है।
फिर हमने रुख किया भूमिका वर्मा की ओर। पहले तो इन्होंने भी कहा कि इन्हें जवाब नहीं आता। फिर थोड़ा सोच कर कहा कि अण्णा हजारे को मिला है। (बिलकुल वे सुर्खियों में जो छाए हैं।)
उपासना खरे के पास तो पहले ही बहाना मौजूद था। सुबह जल्दी कॉलेज आना होता है, फिर पूरा दिन यहीं हो जाता है, इसलिए पेपर पढ़ने का समय ही नहीं मिलता। इसलिए जवाब नहीं पता।
अंत में बड़ी उम्मीद के साथ हमने रुचित डागा से बात की, पर यहाँ भी निराशा ही हाथ लगी। शायद अपने कई दोस्तों की तरह इन्होंने भी इस पुरस्कार का नाम पहली बार ही सुना था।
जब इन सभी को जवाब नहीं आया तो इन्होंने अपने कुछ दोस्तों को बुलाया। सुमित पाटीदार बड़े ही उत्साह से बत्ती गुल का हिस्सा बनने को तैयार हो गए। पूछने पर इन्होंने बताया कि वे रोज पेपर पढ़ते हैं, पर जैसे ही प्रश्न पूछा ये जनाब भी इधर-उधर देखने लगे। फिर थोड़ा सकुचाते हुए बोले वो अअअ.. अभी परीक्षा चल रही है ना, इसलिए कुछ दिनों से पेपर नहीं पढ़ पाया। (बहुत अच्छे!) रेमन मैगसेसे पुरस्कार हरीश हांडे और नीलिमा मिश्रा को मिला है। हरीश की सौर ऊर्जा कंपनी है और वे एक लाख से ज्यादा गरीबों के घर रोशन कर चुके हैं, वहीं नीलिमा ने महाराष्ट्र के गाँवों में ग्रामीणों के विकास के लिए अथक प्रयास किए हैं।