दायरों के बाहर भी एक दुनिया है... ये तुमने ही मुझे बताया...वो दायरे जो हम खुद बना लेते हैं या हमें बने हुए मिलते हैं...तुम कैसे उन सभी दायरों के बाहर हमेशा मुझे मुस्कुराती हुईं खड़ी मिलतीं...हाँ तुम जब हाथ थामकर मुझे उन दायरों से बाहर ले गईं तो वो दुनिया अलग थी...
जिसका एहसास करना तो बहुत आसान हुआ करता लेकिन तुम्हारी आँखों में झाँकते हुए उन एहसासों को नाम देना उतना ही मुश्किल... हाँ बहुत मुश्किल पर जब भी तुम साथ चलते हुए यूँ ही मेरा हाथ थाम लेतीं तो यूँ लगता कि मुझे उस एहसास का नाम मिल गया हो...
तुम्हारे साथ उन भूले हुए दायरों और बहुत कहीं पीछे छूट गए रिश्तों के नाम को मैं याद ना तो किया करता और ना ही मुझे याद रहते। ऐसे कई अनगिनत तुम्हारे पूछे गए सवालों को मैं अपने कुर्ते की जेब में संभालकर रखता और तुम्हारे इंतजार में उन्हें बार-बार एक-एक करके निकालता...शायद किसी सवाल का जवाब मुझे मिल जाए...
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हाँ लेकिन उन सवालों में छुपी हुई, घुली हुई तुम्हारी यादों को में एक-एक करके हाथ पर रखता और अपने चेहरे पर मल लेता...देखना चाहता कि तुम्हारी यादों के साथ मेरा चेहरा कैसा दिखता है...
सच कहूँ तो मैं ठीक से आज भी अपने चेहरे को उन यादों के साथ महसूस करने की कितनी भी कोशिश करूँ वो चेहरा कहीं दिखाई नहीं पड़ता... शायद वो चेहरा तुम अपने साथ जो ले गई हों...हाँ साथ ही ले गई होगी...नहीं तो मुझे मेरा चेहरा यूँ अजनबी-सा ना लगता, हाँ अगर कुछ याद रहता है तो वो पल जब तुमने उस रोज हमारे आस पास उन सभी एहसासों को बुला लिया था... और हम रिश्तों के दायरों से बहुत दूर कहीं एहसासों की बसाई हुई दुनिया में खुद को पाया हुआ महसूस कर रहे थे...
हाँ वो पल सबसे जुदा था... मैंने खुद को तो पाया ही तुम्हें भी पा लिया था। रिश्तों के दायरों से दूर और तुम्हारे-मेरे एहसासों के नजदीक मैं तुम्हें आज भी खुद के साथ पाता हूँ... हाँ यही तो एक एहसास है जो सबसे जुदा... सबसे सुखद है... और जो हमेशा मेरे साथ रहता है।