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उसकी त्वचा पर पड़ जाते थे काले धब्बे

होम्योपैथिक केस हिस्ट्री

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एक्खीमोसिस
डॉ. कैलाशचन्द्र दीक्षि
NDND
यह एक 14 वर्षीय लड़की का केस है जिसे एक्खीमोसिस नामक बीमारी थी। इस बीमारी में रक्त नलिकाएँ फट जाती है और रक्त त्वचा के नीचे काले या नीले धब्बे के रूप में जमा हो जाता है। इसकी शुरूआत 4 महीने पहले बाँह में एक हल्की चोट लग जाने से हुई थी। चोट लगने के बाद एकाएक धब्बा उभर आया।

चूँकि उसमें कोई दर्द नहीं था इसलिए किसी ने गंभीरता से नहीं लिया। कुछ दिनों में धब्बा धीरे-धीरे हल्का होते हुए गायब हो गया। कुछ अर्से बाद अकस्मात एक धब्बा जहाँ चोट लगी थी उसकी दूसरी ओर प्रकट हो गया। पर इस बार लड़की के पालकों को आश्चर्य इस बात का था कि वहाँ कोई चोट नहीं लगी थी।

कुछ दिनों में दूसरा धब्बा भी हल्का होकर गायब हो गया। चंद हफ्तों बाद लड़की की दोनों भुजाओं और पैरों में छोटे धब्बे प्रकट हो गए। आकार में भले ही छोटे रहें हो लेकिन इस बार संख्या में काफी अधिक थे। कुछ ही अर्से में धब्बों का आकार भी बढ़ गया और वे अधिक उभर कर दिखाई देने लगे। पालकों ने इस बार पारिवारिक चिकित्सक की सलाह ली। चिकित्सक ने जाँच के बाद लड़की को नॉर्मल पाया। और रूटीन ब्लड चैकअप के लिए कहा।

खून की जाँच में पाया गया कि लड़की के रक्त में प्लेटलेट काउंट एक लाख से भी काफी कम है। सामान्यत: किसी मनुष्य के रक्त में एक लाख पचास हजार से लेकर 4 लाख प्रति क्यूबिक मिलीमीटर प्लेटलेट्स होते हैं। स्पष्टत: यह एक्खीमोसिस का केस था। खून का थक्का बन जाने के कारण यह स्थिति निर्मित हुई थी। मरीज को हिमेटोलॉजिस्ट के पास रैफर कर दिया गया। विशेषज्ञ द्वारा गहराई से जाँच के बाद भी काउंट कम होने के अलावा कोई दूसरी नई समस्या सामने नहीं आई। लेकिन बीमारी की स्थि‍ति में कोई परिवर्तन नहीं आया था।

कुछ दिनों बाद मरीज के हाथ-पैरों में नए और धब्बे उभर आए। पुन: रक्त की जाँच की तो पा‍या कि काउंट 75 हजार से गिर कर 50 हजार तक पहुँच गया है। अब मरीज को नाक और मसूढ़ों से खून निकलने की समस्या शुरू हो गई।

विशेषज्ञ ने इडियोपॉथिक थ्रोम्बोसायटोपीनिक पुरपुरा (आईटीपी) नामक बीमारी के रूप में इस समस्या को पहचाना और इलाज शुरू किया। चूँकि इस बीमारी की मुख्य दवा स्टेरॉयड होती है इसलिए इसी से इलाज की शुरुआत हुई। डेढ़ महीने के इलाज के बाद रक्त में प्लेटलेट का काउंट लगभग डेढ़ लाख तक पहुँच गया। मनुष्य के रक्त में प्लेटलेट्स का काउंट सामान्यत: डेढ़ लाख से शुरू होता है इसलिए मरीज का इलाज रोक दिया गया।

कुछ हफ्तों बाद फिर से मरीज को हाथ और पैरों में धब्बे उभरने लगे। तत्काल विशेषज्ञ की सेवाएँ ली गई। जाँच में पाया गया कि मरीज के रक्त का काउंट पुन: गिरकर 60 हजार तक आ गया है। विशेषज्ञ ने पालकों को कुछ दिन रुकने और देखने की सलाह दी। मरीज की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। बल्कि काउंट गिरकर 40 हजार तक पहुँच गया।

जब तक मरीज कोई और दूसरी शिकायत करती तब तक काउंट 20 हजार ही रह गए।यह एक घातक स्थिति थी। मरीज का इलाज पुन: स्टेरॉयड्स से होने लगा। डेढ़ महीने के इलाज के बाद मरीज का काउंट ठीक हुआ और बढ़ कर सवा लाख तक आ गया। कुछ हफ्तों तक मरीज ठीक रही लेकिन बाद में काउंट फिर गिरने लगा।

अब पालक स्टेरॉयड्स के साइड इफेक्ट्स से घबरा कर किसी दूसरे विकल्प की तलाश करने लगे। किसी पारिवारिक मित्र की सलाह पर होम्योपैथिक इलाज शुरू किया। मरीज की केस हिस्ट्री लेने के बाद लक्षणों के आधार पर उसका इलाज शुरू हुआ। फास्फोरस नामक दवाई मरीज को दी गई। यह दवा इसलिए दी थी ताकि मरीज का काउंट ‍गिरना रुके। और बढ़ना शुरू हो।

2-3 महीनों के इलाज के बाद मरीज का काउंट सामान्य हो गया। इसके बाद मरीज को दूसरी बार यह समस्या न हो इसलिए फिर इलाज किया। छ: महीने के इलाज के बाद मरीज सामान्य हो गई। और फिर उसे इस बीमारी का दौरा नहीं पड़ा।

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