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एक त्योहार, दो तारीखें: क्यों बार-बार बदल रही हैं त्योहारों की तिथियां? जानें इसके पीछे का ज्योतिषीय गणित

2-2 दिन त्योहार, क्यों हो रहा है तिथियों को लेकर कंफ्यूजन, जानिए पूरा गणित

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सचमुच ही बहुत से लोग अब यह समझ नहीं पाते हैं कि आज अष्टमी है या नवमी, होली कब है, दिवाली कब है 08 नवंर या कि 09 नवंबर? ऑनलाइन देखो तो अलग तरीख, काल निर्णय कैलेंडर में देखो तो अलग और लाला रास्वरूप कैलेंडर में देखों तो अलग तारीख, आखिर सही तारीख क्या है। आजकल त्योहारों की तारीखों को लेकर जो भ्रम की स्थिति बनती है, उसके पीछे कोई एक कारण नहीं, बल्कि कई कारण है चलिए जानते हैं इसके पीछे का पूरा ज्योतिष गणित।
 

हिंदू त्योहारों और तिथियों के भ्रम का मुख्य कारण

1. सूर्य और चंद्रमा की अलग चाल

हिंदू पंचांग में 'दिन' (वार) सूर्य पर आधारित है, जबकि 'तिथि' चंद्रमा की गति पर निर्भर करती है। सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक एक दिन माना जाता है, लेकिन चंद्रमा की एक तिथि (12 अंश की दूरी) कभी 24 घंटे से ज्यादा लंबी होती है, तो कभी 20-22 घंटे में ही समाप्त हो जाती है। पंचांग में समय को तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण तिथि होती है, जो चंद्रमा और सूर्य के बीच की दूरी से बनती है। एक तिथि लगभग 19 से 26 घंटे तक की हो सकती है, इसलिए कई बार तिथि एक दिन में शुरू होकर अगले दिन तक चलती रहती है।
 

2. तिथि वृद्धि और तिथि क्षय

तिथि वृद्धि: जब कोई तिथि सूर्योदय से पहले शुरू हो और अगले दिन के सूर्योदय के बाद तक चले (24 घंटे से अधिक), तो वह तिथि दो दिनों के सूर्योदय में शामिल हो जाती है। इसी कारण एक ही त्योहार दो दिन में व्याप्त होता है।
तिथि क्षय: जब कोई तिथि एक सूर्योदय के बाद शुरू हो और अगले सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाए, तो वह कैलेंडर से 'गायब' हो जाती है। इसे तिथि का कटना या क्षय होना कहते हैं।
 

3. गणना का आधार (60 घटी)

समय की पारंपरिक इकाई 'घटी' है (1 घटी = 24 मिनट)। एक औसत तिथि 60 घटी (24 घंटे) की होती है। चंद्रमा की गति घटने-बढ़ने से जब तिथि 60 घटी से ज्यादा समय लेती है, तो तारीख बढ़ जाती है।
 

4. उदयातिथि का महत्व

त्योहार तीन तिथियों में मनाते हैं मध्‍यान्ह तिथि, निशीथ काल और उदयातिथि। शास्त्रों में अधिकतर त्योहार के निर्धारण के लिए 'उदयातिथि' (सूर्योदय के समय मौजूद तिथि) को प्रधानता दी जाती है। चूंकि हर शहर में सूर्योदय का समय अलग होता है, इसलिए कभी-कभी एक शहर में त्योहार आज तो दूसरे शहर में कल मनाया जाता है।
 
लेकिन कुछ पर्व ऐसे भी होते हैं जिनमें तिथि का विशेष समय ज्यादा महत्वपूर्ण माना जाता है। उदाहरण के लिए कृष्ण जन्माष्टमी, दीपावली और महाशिवरात्रि जैसे त्योहार रात के समय मनाए जाते हैं। यदि रात्रि के त्योहार में यदि तिथि दो दिनों में पड़ जाए तो पहला दिन चुनते हैं जिसमें प्रदोष काल या निशीथ काल हो।
 

5. व्रत बनाम उत्सव (नक्षत्र और समय)

कुछ त्योहारों के लिए नियम बहुत विशिष्ट होते हैं:
दिवाली: इसके लिए 'अमावस्या' का रात में होना अनिवार्य है।
होली: इसके लिए 'पूर्णिमा' और 'भद्रा' नक्षत्र का विचार किया जाता है।
करवा चौथ-जन्माष्टमी: इनके लिए चंद्रोदय या मध्यरात्रि का समय देखा जाता है।
रामनवमी और हनुमान जयंती: इसके लिए मध्यानव्यापिनी तिथि का विचार करते है, क्योकि दोनों का जन्म मध्यान्ह काल में हुआ था।
व्रत-उत्सव: जब तिथि दो दिनों में बंट जाती है, तो एक दिन 'व्रत' के लिए उपयुक्त होता है और दूसरा 'उत्सव' या दान-पुण्य के लिए।
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6. अंग्रेजी कैलेंडर नहीं पंचांग देखें:

त्योहारों का दो दिन होना कोई अंधविश्वास नहीं, बल्कि सूर्य और चंद्रमा की परस्पर गतियों के बीच सामंजस्य बिठाने का एक शुद्ध खगोलीय गणित है। हिंदू धर्म में त्योहारों की तारीख ग्रेगोरियन कैलेंडर (अंग्रेजी कैलेंडर) से नहीं बल्कि चंद्रमा की स्थिति के आधार पर तय होती है। इसे हिंदू पंचांग कहा जाता है। यदि आप अंग्रेजी कैलेंडर की दिनांक देखकर गणना करेंगे तो ही कन्यूज होंगे। उस दिकांक या तारीख को देखना छोड़कर तिथि और दिन को देखें।
 

7. अलग-अलग पंचांग के कारण भी होता भ्रम:

भारत में कई तरह के पंचांग प्रचलित हैं। प्रमुख रूप से दो प्रकार के कैलेंडर माने जाते हैं:-
अमांत पंचांग– इसमें महीना अमावस्या से अमावस्या तक माना जाता है।
पूर्णिमांत पंचांग– इसमें महीना पूर्णिमा से पूर्णिमा तक माना जाता है।
इन दोनों पद्धतियों में गणना अलग होने से कई बार त्योहार की तिथि एक दिन आगे-पीछे हो जाती है।
 

8. क्षेत्रीय परंपराओं का असर

भारत एक विशाल देश है और हर क्षेत्र की अपनी धार्मिक परंपराएं हैं। उदाहरण के लिए हनुमान जयंती, गुड़ी पड़वा और रामनवमी जैसे पर्व कई राज्यों में अलग-अलग दिन मनाए जाते हैं। कुछ जगह मंदिर परंपरा के अनुसार पर्व मनाया जाता है, जबकि कहीं पंचांग के अनुसार।
 

9. ज्योतिषीय गणना में अंतर

आजकल कई ज्योतिष संस्थान और पंडित अलग-अलग खगोलीय सॉफ्टवेयर और गणना पद्धति का उपयोग करते हैं। कभी-कभी इन गणनाओं में थोड़ा अंतर होने से भी त्योहार की तारीख अलग दिखाई देने लगती है।
 

10. सही तिथि कैसे तय करें?

  • अगर किसी त्योहार की तिथि को लेकर भ्रम हो जाए तो इन बातों का ध्यान रखें:
  • स्थानीय मंदिर या धार्मिक संस्थान की तिथि देखें
  • विश्वसनीय पंचांग का उपयोग करें
  • जिस परंपरा का परिवार में पालन होता है उसी के अनुसार पर्व मनाएं
  • धार्मिक दृष्टि से श्रद्धा और भक्ति सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है।

11. सोशल मीडिया और सूचनाओं की अधिकता

  • आजकल जानकारी जितनी सुलभ है, भ्रम भी उतना ही ज्यादा है।
  • सोशल मीडिया पर अलग-अलग पंडितों और ज्योतिषियों के वीडियो/पोस्ट वायरल होते हैं।
  • जब लोग एक ही त्योहार की दो अलग-अलग तारीखें देखते हैं, तो वे अपनी स्थानीय परंपरा को मानने के बजाय इंटरनेट की बहस में उलझ जाते हैं।

12. शुद्ध खगोलीय गणना (Modern Astronomy)

प्राचीन काल की गणना और आधुनिक सटीक खगोलीय गणना में कभी-कभी सेकंड्स या मिनट्स का फर्क आता है। आजकल डिजिटल पंचांग इस सूक्ष्म अंतर को भी दिखाते हैं, जिससे आम आदमी के लिए यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा समय 'सबसे शुद्ध' है।
 

13. सार यह है: 

त्योहारों का यह भ्रम मुख्य रूप से चंद्रमा की गति और सूर्योदय के समय के बीच के तालमेल की वजह से होता है। ऐसे में सबसे बेहतर यही होता है कि आप अपने स्थानीय मंदिर या उस पंचांग का पालन करें जिसे आपका परिवार पीढ़ियों से मानता आ रहा है।
 
एक ही त्योहार का दो दिन मनाया जाना कोई नई बात नहीं है। इसके पीछे तिथि की गणना, सूर्योदय का नियम, अलग पंचांग, कप्यूटर की गणना और क्षेत्रीय परंपराएं जिम्मेदार होती हैं। इसी के साथ आजकल सोशल मीडिया के जमाने में लोग अपनी व्यू और लाइक बढ़ाने के लिए भी जानबूझकर हर त्योहार कर कंफ्यूजन क्रिएट करने लगे हैं। इसलिए अगर किसी वर्ष त्योहार दो दिन दिखाई दे तो घबराने की जरूरत नहीं है। श्रद्धा के साथ पूजा करने पर ही त्योहार का असली महत्व पूरा होता है।
 

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