आम चुनाव 2019: वोटर लिस्ट से दो करोड़ महिलाओं के 'ग़ायब' होने का रहस्य

सोमवार, 18 मार्च 2019 (13:58 IST)
सौतिक बिस्वास (बीबीसी संवाददाता)
 
भारत में महिलाओं को वोट देने का अधिकार उसी साल मिल गया था, जिस साल भारत देश बना था। एक औपनिवेशिक राष्ट्र रह चुके भारत के लिए ये एक बड़ी कामयाबी थी। लेकिन इसके 70 साल बाद 2 करोड़ 10 लाख महिलाओं से वोट देने का अधिकार क्यों छिन लिया गया है? भारत के सामने ये एक बड़ा सवाल है।
 
 
भारत में महिलाएं बढ़-चढ़कर मतदान करती रही हैं: इस साल होने वाले आम चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से ज़्यादा रहने का अनुमान है। अधिकतर महिलाओं का कहना है कि वो अपने पसंद के उम्मीदवार को वोट डालेंगी और वो इसके लिए अपने पति या परिवार से नहीं पूछेंगी।
 
 
महिलाओं को प्रोत्साहित करने के लिए अलग पोलिंग स्टेशन बनाए जाते हैं और महिला पुलिसकर्मियों को उनकी सुरक्षा में लगाया जाता है। पोलिंग स्टेशनों पर कम से कम एक महिला अधिकारी नियुक्त होती है। 2014 में हुए आम चुनावों में 660 से ज़्यादा महिला उम्मीदवारों ने अपनी किस्मत आज़माई थी। 1951 में हुए पहले चुनावों के मुकाबले ये आंकड़ा कहीं ज़्यादा था, क्योंकि उस वक्त महज़ 24 महिलाएं ही चुनावी मैदान में उतरी थीं।
 
 
राजनीतिक पार्टियां भी अब महिला मतदाताओं को ख़ास महत्व देती हैं। वो उन्हें एक अलग इकाई मानती हैं और उनके लिए कई वादे करती हैं जैसे सस्ती रसोई गैस देने का वादा, पढ़ाई में स्कॉलरशिप देने का वादा और कॉलेज जाने के लिए साइकिल देने का वादा।
 
 
'बड़ी समस्या'
लेकिन ये एक हैरान कर देने वाली बात है कि भारत में बहुत सी महिलाओं का नाम वोटर लिस्ट में नहीं है। इन महिलाओं की तादाद इतनी है, जितनी श्रीलंका की पूरी आबादी। ये दावा एक नई किताब में किया गया है। चुनाव विशेषज्ञ प्रणॉय रॉय और दोराब सोपारीवाला ने ये किताब लिखी है। वो कुछ आंकड़ो का अध्ययन कर इस नतीजे पर पहुंचे। इसका ज़िक्र उन्होंने अपनी आने वाली किताब 'द वर्डिक्ट: डिकोडिंग इंडियाज़ इलेक्शन' में किया है।
 
 
उन्होंने देखा कि जनगणना के हिसाब से 18 साल से ज़्यादा उम्र की महिलाओं की संख्या कितनी है। इस संख्या के आधार पर उन्होंने महिलाओं की मौजूदा तादाद का अंदाज़ा लगाया। इसके बाद उन्होंने इस संख्या की तुलना महिला मतदाताओं की ताज़ा लिस्ट से की। उन्होंने इन दोनों में बड़ा अंतर पाया।
 
 
उन्होंने पाया कि महिला मतदाताओं की लिस्ट में करीब दो करोड़ 10 लाख महिलाओं का नाम ही नहीं है। ग़ायब महिला मतदाताओं में ज़्यादातर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान की हैं, जबकि आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु जैसे दक्षिणी राज्यों में स्थिति फिर भी बेहतर है।
 
 
इसका क्या मतलब है?
विश्लेषकों का कहना है कि दो करोड़ से ज़्यादा महिलाओं का नाम वोटर लिस्ट से गायब होने का मतलब है कि भारत के हर निर्वाचन क्षेत्र में औसतन 38 हज़ार महिलाएं वोटर लिस्ट में नहीं हैं। उत्तर प्रदेश भारत का सबसे ज़्यादा आबादी वाला राज्य है और इस राज्य का चुनावी जीत में अहम योगदान होता है। लेकिन किताब में लिखे आंकड़ों की माने तो उत्तर प्रदेश की हर सीट में 80 हज़ार महिलाओं के नाम वोटर लिस्ट में नहीं है।
 
 
यहां ये जान लेना भी ज़रूरी है कि पांच में से कम से कम एक सीट पर हार-जीत का अंतर 38 हज़ार वोटों से कम होता है। मतलब ये कि जिन महिलाओं का नाम वोटर लिस्ट से गायब है, वो कई सीटों पर चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं।
 
 
महिलाओं का इतनी बड़ी तादाद में लिस्ट से गायब होना ये भी बताता है कि इस साल गर्मियों में होने वाले चुनाव में मतदाताओं की संख्या और ज़्यादा हो सकती थी। अगर किसी निर्वाचन क्षेत्र में लिंग अनुपात महिलाओं के विपरीत जाता है तो वहां औसत मतदाता, पुरुष हो जाता है। ऐसे में हो सकता है कि वहां कि महिला मतदाताओं को नज़र अंदाज़ किया जाए।
 
प्रणॉय रॉय ने बीबीसी को बताया, "महिलाएं मतदान करना चाहती हैं, लेकिन उन्हें मतदान करने नहीं दिया जाता है। ये बहुत ही चिंता की बात है। इससे कई बड़े सवाल भी खड़े होते हैं। हम सभी जानते हैं कि इस समस्या के पीछे कुछ सामाजिक कारण भी हैं। लेकिन हम ये भी जानते हैं कि लोगों को मतदान करने से रोककर नतीजों को भी कंट्रोल किया जा सकता है। क्या ये भी एक कारण है? सच का पता लगाने के लिए हमें इसकी और पड़ताल करनी होगी।"
 
 
लिंग अनुपात को पुरुषों के पक्ष में कर देने से भारत में एक समस्या ये हुई है कि महिलाओं को लंबे समय से वोट करने का अधिकार नहीं मिला है। पिछले साल सरकार की एक रिपोर्ट में सामने आई थी कि भारत में महिलाएं पहले से 6।3 करोड़ कम हो गई हैं। इसकी वजह है कि बेटे की चाहत में बेटी को गर्भ में ही मार दिया जाता है और बेटों की ज़्यादा अच्छे से देख-रेख की जाती है।
 
 
इसके अलावा अर्थशास्त्री शमिका रवि और मुदित कपूर के अनुमान के मुताबिक 6।5 करोड़ से ज़्यादा महिलाएं कम हो गई हैं। यानी करीब 20 फीसदी महिला मतदाता गायब हैं। इनमें वो महिलाएं भी हैं जिन्होंने मतदान के लिए रजिस्ट्रेशन नहीं कराया और वो महिलाएं भी जिन्हें दुनिया में आने ही नहीं दिया गया। उनका कहना है कि ये चुनाव उस आबादी के लिए हो रहे हैं जहां महिलाएं कृत्रिम रूप से कम दिखाई देती हैं।
 
 
ऐसा नहीं है कि चुनाव अधिकारियों ने महिलाओं को पोलिंग बूथ तक लाने के लिए कोशिशें नहीं की। चुनाव आयोग कई तरीकों से कोशिश कर रहा है कि सभी वोटरों को वोट डालने के लिए लाया जाए। इन तरीकों में वो लिंग अनुपात, इलेक्टोर-पॉपुलेशन रेश्यो और मतदाताओं की उम्र को ध्यान रखते हैं।
 
 
इसके लिए वो लोगों के घर-घर जाते हैं और इस काम के लिए अक्सर महिला अधिकारियों को भेजा जाता है। गावों में बाल विकास कर्मचारियों और महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों को इस काम में लगाया जाता है। सरकारी टीवी और रेडियो प्रोग्रामों में महिलाओं को रजिस्टर करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। कई पोलिंग स्टेशन सिर्फ़ महिलाओं के लिए ही बनाए जाते हैं।
 
 
चुनाव के समय महिला पुलिसकर्मियों को पोलिंग स्टेशनों पर तैनात किया जाता है। तो क्या वजह है कि इतनी सारी महिलाएं मतदान करने नहीं आतीं? क्या एक वजह ये हैं कि कई महिलाएं शादी के बाद अपना पता नहीं बदलती हैं और नए पते के साथ रजिस्टर नहीं करती हैं? (30 से 34 की उम्र की तीन फीसदी से भी कम महिलाएं सिंगल हैं।)
 
 
क्या इसकी एक वजह ये भी है कि परिवार वाले वोटर लिस्ट में लगाने के लिए महिलाओं की तस्वीर अधिकारियों को नहीं देते हैं? या इसका कुछ इस बात से भी लेना-देना है कि मतदाताओं को दबाने के लिए ये किया जा रहा है?
 
 
डॉक्टर रॉय कहते हैं, "कुछ सामाजिक रुकावटें हैं, लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि ये इतनी बड़ी संख्या के वोटर लिस्ट से गायब होने की वजह हो सकता है।"
 
 
चुनावों का आयोजन करने में मदद करने वालों लोगों का कहना है कि इसमें डरने की कोई बात नहीं है। पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी ने बीबीसी को कहा कि बीते कुछ वक्त में बहुत सी महिलाओं ने वोटर के तौर पर रजिस्ट्रेशन कराया है। हालांकि उन्होंने ये भी कहा कि अब भी महिलाओं के सामने कई सामाजिक रुकावटें हैं?
 
 
उन्होंने कहा, "मैंने कई ऐसे मां-बाप के बारे में सुना है जो अपनी बेटी का रजिस्ट्रेशन सिर्फ़ इसलिए नहीं कराते कि इससे उनकी बेटी की उम्र का पता चल जाएगा। उन्हें लगता है कि इससे उनकी शादी होने में दिक्कत आ सकती है।"
 
 
2019 के आम चुनाव होने में एक महीने से भी कम का वक्त बचा है। ऐसे में इस समस्या को सुलझाने के लिए वक्त है ही नहीं। डॉक्टर रॉय का मानना है कि इसका एक ही तरीका है कि उन महिलाओं को भी वोट करने दिया जाए, जिनका नाम रजिस्टर्ड नहीं है। वो कहते हैं, "कोई भी महिला जो पोलिंग स्टेशन आती है और वोट डालना चाहती है, अगर वो अपने 18 साल से ज़्यादा होने का सबूत देती है तो उसे वोट देने दिया जाना चाहिए।"
 
 

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