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लालू यादव जातियों की जनगणना से आख़िर क्या हासिल करना चाहते हैं?

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BBC Hindi

गुरुवार, 12 अगस्त 2021 (08:01 IST)
कमलेश, बीबीसी संवाददाता
बिहार की राजनीति में जातीय जनगणना का मुद्दा गरमाया हुआ है। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों जातीय जनगणना कराने के लिए एकजुट नज़र आ रहे हैं।
 
राष्ट्रीय जनता दल इस मुद्दे पर लगातार बयान देकर केंद्र की बीजेपी सरकार को घेरने में जुटी है और साथ ही सीएम नीतीश कुमार पर भी दबाव बना रही है।
 
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने ट्वीट करके मोदी सरकार को पिछड़ा और अति पिछड़ा विरोधी कहा था।
 
इसके बाद बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री और राजद प्रमुख लालू यादव ने भी जातीय जनगणना ना होने पर जनगणना के ही बहिष्कार की बात कह दी है।
 
उन्होंने ट्वीट किया, "अगर 2021 जनगणना में जातियों की गणना नहीं होगी तो बिहार के अलावा देश के सभी पिछड़े-अति पिछड़ों के साथ दलित और अल्पसंख्यक भी गणना का बहिष्कार कर सकते हैं। जनगणना के जिन आँकड़ों से देश की बहुसंख्यक आबादी का भला नहीं होता हो, तो फिर जानवरों की गणना वाले आँकड़ों का क्या हम अचार डालेंगे?"
 
लंबे समय से राजनीतिक पटल से दूर रहे लालू यादव इस मसले को लेकर काफ़ी सक्रिय और गंभीर नज़र आ रहे हैं।
उन्होंने पिछले दिनों मुलायम सिंह यादव और शरद यादव से भी मुलाक़ात की थी और कहा था कि संसद में जनता के मुद्दे को उठाने वाली अहम आवाज़ें अब नहीं हैं।
 
उनकी सक्रियता को उत्तर प्रदेश के चुनाव और बिहार की जातीय राजनीति में राजद की पकड़ मजबूत करने के नज़रिए से देखा जा रहा है। बिहार और उत्तर प्रदेश में जातीय मुद्दा प्रभावी रहा है। यूपी समेत कई राज्यों में चुनाव भी आने वाले हैं।
 
जातीय जनगणना का मामला असल में ओबीसी यानी अति पछड़ी जातियों की जनगणना का मामला है। बिहार की राजनीति में ओबीसी जातियों का बहुत प्रभाव है। राजद हो या जदयू दोनों का वोट बैंक ओबीसी जातियां रही हैं। यहां तक की बीजेपी को भी अति पिछड़ा वर्ग की कुछ जातियों से समर्थन मिला है।
 
ऐसे में राजद ने जातीय जनगणना पर अपना पूरा ज़ोर लगाया हुआ है। बिहार में चुनाव भले ही ना हों, लेकिन राजद संभवत: अपने ओबीसी आधार को मज़बूत करना चाहती है।
 
ओबीसी जातियों का समर्थन पाने की कोशिश
विधानसभा चुनाव में राजद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। राजद को जदयू से लगभग दोगुनी 75 सीटें हासिल हुई थीं। लेकिन, फिर भी जदयू और बीजेपी के गठबंधन के चलते राजद सत्ता में नहीं आ पाई।
 
ऐसे में राजद मज़बूत विपक्ष बनकर सामने आई है और अगले चुनावों में सत्ता में आने का कोई मौका नहीं गंवाना चाहती है। राजद अगर अपने जनाधार को बढ़ा पाती है तो आने वाले समय में उसकी स्थित और बेहतर हो सकती है।
 
बिहार की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार मणिकांत ठाकुर इस पर कहते हैं, "राजद को सबसे ज़्यादा नुक़सान इसी कारण हुआ था क्योंकि अति पिछड़ी जातियों को नीतीश कुमार ने तरजीह दी और उन्हें आगे बढ़ाया। वो राजद के साथ पहले की तरह नहीं रहीं। इससे चुनावी नुक़सान भी उठाना पड़ा। अब राजद उस नुक़सान की भरपाई भी करना चाहती है।"
 
बिहार की राजनीति में एक समय ऐसा रहा है जब लालू यादव की छवि ओबीसी जातियों के एक बड़े नेता के तौर पर थी, लेकिन धीरे-धीरे गैर-यादव जातियां जैसे कुर्मी, कोइरी, कहार, बेलदार आदि राजद से छिटकती चली गईं।
 
नीतीश कुमार को भी गैर-यादव ओबीसी जातियों का समर्थन मिला और अलग-अलग जातियों के छोटे-छोटे दल भी उभर आए।
 
इससे ओबीसी की पार्टी के तौर पर राजद की छवि धूमिल होती गई। भ्रष्टाचार और परिवारवाद के आरोपों के बीच राजद को यादवों की पार्टी भी कहा जाने लगा। अब लालू यादव सामाजिक न्याय के लिए काम करने वाली पार्टी की छवि और ओबीसी का व्यापक जनाधार वापस पाना चाहते हैं।
 
मणिकांत ठाकुर बताते हैं कि जातीय राजनीति में जातीय जनगणना की बात उभरेगी ही। अगर जातीय जनगणना होगी तो पिछड़ी जातियों में अति पिछड़ी जातियों की तादाद इतनी ज़्यादा है कि उन्हें एक वोट बैंक की तरह लिया जा सकता है।
 
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बढ़ाई बीजेपी के लिए चुनौती
लालू यादव के ट्वीट को लेकर वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं कि ये कोई नई बात नहीं है। लालू यादव पहले भी ये मांग उठाते आए हैं। बल्कि ये मामला तो मंडल आयोग के समय से ही उठ रहा है।
 
उन्होंने बताया, "80 के दशक में मंडल कमीशन बनने के समय से ही मांग चल रही है कि भारत में एससी और एसटी की जनगणना होती है, लेकिन अति पिछड़े वर्ग की नहीं होती। मंडल आयोग की सिफ़ारिश में भी ये कहा गया है कि उन्हें ये रिपोर्ट तैयार करते हुए इसलिए मुश्किल आई क्योंकि भारत में ओबीसी के बारे में उनके पास कोई प्राथमिक और प्रामाणिक डेटा ही नहीं था।"
 
"आज तक ओबीसी को पूरी भागीदारी मिली ही नहीं है। किसी वर्ग की सही भागीदारी देने के लिए उसकी संख्या का पता होना ज़रूरी है। इसलिए ओबीसी की गिनती होना ज़रूरी है। लालू प्रसाद यादव भी इसी मामले को उठा रहे हैं जो वो पहले भी उठाते रहे हैं।"
 
लेकिन, वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश इसमें एक नया पहलू भी जोड़ते हैं। वह कहते हैं, ''ये मुद्दा उठाने के साथ ही बीजेपी के लिए चुनौती पैदा हो गई है। नीतीश कुमार बिहार में बीजेपी के सहयोगी हैं, लेकिन फिर भी वो जातीय जनगणना के पक्ष में बोल रहे हैं। बिहार में सत्ता और विपक्ष की पार्टी एक हो गई है।''
 
''बीजेपी के दलित और पिछड़े वर्ग के विधायक भी जातीय जनगणना का समर्थन कर रहे हैं। ऐसे में बीजेपी सबसे ज़्यादा उहापोह की स्थिति में है और इस सबके बीच यूपी में चुनाव भी हैं। अगर ये बहुत बड़ा मुद्दा बना तो बीजेपी का ओबीसी जनाधार दरक सकता है। इससे बीजेपी के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।''
 
जातीय जनगणना से नए राजनीतिक समीकरण
ओबीसी जातियों के लिए इस समय 27 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है जो उनकी जनसंख्या में भागीदारी के आधार पर तय गई है। ये जनसंख्या 1931 में हुई जातिगत जनगणना में सामने आई थी।
 
1931 तक भारत में जातिगत जनगणना होती थी। 1941 में जनगणना के समय जाति आधारित डेटा जुटाया ज़रूर गया था, लेकिन प्रकाशित नहीं किया गया था।
 
1951 से 2011 तक की जनगणना में हर बार अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति का डेटा दिया गया, लेकिन ओबीसी और दूसरी जातियों का नहीं।
 
इसी बीच साल 1990 में केंद्र की तत्कालीन विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने दूसरा पिछड़ा वर्ग आयोग, जिसे आमतौर पर मंडल आयोग के रूप में जाना जाता है, उसकी एक सिफ़ारिश को लागू किया था।
 
ये सिफ़ारिश अन्य पिछड़ा वर्ग के उम्मीदवारों को सरकारी नौकरियों में सभी स्तर पर 27 प्रतिशत आरक्षण देने की थी। इस फ़ैसले ने भारत, ख़ासकर उत्तर भारत की राजनीति को बदल कर रख दिया।
 
जानकारों का मानना है कि भारत में ओबीसी आबादी कितनी प्रतिशत है, इसका कोई ठोस प्रमाण फ़िलहाल नहीं है। लेकिन, अगर ये ठोस आधार निकल आता है तो क्षेत्रीय दलों को राजनीति का नया आधार मिल सकता है।
 
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, ''जातीय जनगणना से पता चल जाएगा कि किस जाति की जनसंख्या कितनी है। अगर किसी जाति की जनसंख्या ज़्यादा निकलती है तो उसके लिए सुविधाओं और आरक्षण की मांग हो सकती है। चुनाव में उसकी भागीदारी से राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। ऐसे में राजद को भी इन नए समीकरणों की उम्मीद हो सकती है।''
 
हालांकि, जानकार ये भी मानते हैं कि ये मसला फ़िलहाल राजनीति के स्तर पर ही है क्योंकि असली फ़ायदा तभी मिलेगा जब ओबीसी के उपवर्ग के अनुसार आरक्षण मिले। इसके लिए जस्टिस रोहिणी आयोग की रिपोर्ट का भी इंतज़ार है। पहले आयोग का कार्यकाल 31 जुलाई तक था, फिर इसे छह महीने के लिए और बढ़ा दिया गया है।

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