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अमजद खान : धधकते शोलों से उपजा अमजद

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समय ताम्रकर

जन्म : 12 नवम्बर 1940                                                                                निधन : 27 जुलाई 1992 
 
अनेक बरसों से हिन्दी सिनेमा में डाकू का एक परम्परागत चेहरा चला आ रहा था। धोती-कुरता। सिप पर लाल गमछा। आँखें हमेशा गुस्से से लाल। मस्तक पर लम्बा-सा तिलक। कमर में कारतूस की पेटी। कंधे पर लटकी बंदूक। हाथों में घोड़े की लगाम। और मुँह से आग उगलती गालियाँ। फिल्म शोले के गब्बरसिंह उर्फ अमजद खान ने डाकू की इस इमेज को एकदम काऊ बॉय शैली में बदल दिया। उसने ड्रेस पहनना पसंद किया। कारतूस की पेटी को कंधे पर लटकाया। गंदे दाँतों के बीच दबाकर तम्बाखू खाने का निराला अंदाज। अपने आदमियों से सवाल-जवाब करने के पहले खतरनाक ढंग से हँसना। फिर गंदी गाली थूक की तरह बाहर फेंकते पूछना - कितने आदमी थे? अमजद ने अपने हावभाव, वेषभूषा और कुटिल चरित्र के जरिए हिन्दी सिनेमा के डाकू को कुछ इस तरह पेश किया कि वर्षों तक डाकू गब्बर के अंदाज में पेश होते रहे। शोले फिल्म के गब्बरसिंह को दर्शक चाहते हुए भी कभी नहीं भूल सकते।
 

पहली पसंद डैनी
शोले की कास्टिंग करते समय डायरेक्टर रमेश सिप्पी के दिमाग में अमजद का नाम मीलों दूर तक नहीं था। गौरतलब है कि शोले की पटकथा पढ़ने के बाद संजीव कुमार ने भी गब्बरसिंह का रोल करने की इच्छा प्रकट की थी, लेकिन सिप्पी की पहली पसंद डैनी थे, जो उस दौर में तेजी से उभरकर पहली पायदान के खलनायक बन गए थे। डैनी उन दिनों फिरोज खान की फिल्म 'धर्मात्मा' की शूटिंग में व्यस्त थे। डेट्‌स की समस्या के साथ फिरोज के प्रति कमिटमेंट था। ऐसे समय में शोले के पटकथा लेखक सलीम-जावेद ने अमजद के नाम की सिफारिश रमेश सिप्पी से की थी। रमेश सिप्पी ने एक नाटक में उन्हें बेबाकी से अभिनय करते देखा, तो शोले के लिए साइन कर लिया। डैनी के स्थान पर अमजद गब्बर के रोल में क्या आए, गब्बरसिंह का चरित्र हमेशा के लिए अमर हो गया। 
 
गेट-अप गब्बर का
दरअसल अमजद को जो गेट-अप दिया गया, उस कारण उनका चरित्र एकदम से लार्जर देन लाइफ हो गया। पश्चिम के डाकूओं जैसा लिबास पहनकर, मटमैले दाँतों से अट्टहास करती हँसी हँसना, बढ़ी हुई काँटेदारदाढ़ी और डरावनी हँसी के जरिये अमजद ने सीन-चुराने की कला में महारत हासिल कर ली। और संवाद अदायगी में 'पॉज' का इस्तेमाल तो उनका कमाल का था। क्रूरता गब्बर के चेहरे से टपकती थी और दया करना तो जैसे वह जानता ही नहीं था। उसकी क्रूरता ही उसका मनोरंजन होती थी। उसने बसंती को काँच के टुक्रडों पर नंगे पैर नाचने के लिए मजबूर किया। इससे दर्शक के मन में गब्बर के प्रति नफरत पैदा हुई और यही पर अमजद कामयाब हो गए। 
 
 
बचपन से शरारती
12 नवंबर 1940 को जन्मे अमजद खान पचास के दशक के चरित्र अभिनेता जयंत के बेटे थे। जयंत ने अपनी पठानी कद काठी का इस्तेमाल करते हुए खलनायक और चरित्र नायक के रोल में अपने को सफल बनाया था। अमजद बचपन से शरारती स्वभाव के थे। अपने सहपाठी छात्र का सिर उन्होंने छोटी-सी बात पर फोड़ दिया था। अपने एनसीसी टीचर द्वारा डाँटने पर वे उनसे भिड़ लिए थे। स्कूली शिक्षा के बाद उनकी दिलचस्पी थिएटर की तरफ हुई। रंगमंच ने उन्हें आत्मविश्वास और निडरता दी। ‘शोले’ के पहले उन्होंने एक-दो फिल्में की और अपनी पहचान बनाने के लिए वे संघर्षरत थे। जिस दिन उनके बेटे शादाब का जन्म हुआ उसी दिन उन्होंने शोले फिल्म साइन की। उनका फिल्मी संघर्ष रंग लाया और अमजद फिल्म शोले के गब्बरसिंह के पर्याय बन गए। उनके संवादों का एलपी ग्रामोफोन रेकॉर्ड जारी हुआ था। शोले की रिलीज के बरसों बाद तक उसके संवाद का इस्तेमाल लोग अपनी बातचीत में करते रहे। बच्चों में भी उनका किरदार काफी लोकप्रिय हुआ और बच्चों के लिए बिस्किट बनाने वाली कंपनी का उन्होंने विज्ञापन भी किया। 1972 में उन्होंने शीला खान से शादी की। उनके दो बेटे शादाब खान, सीमाब खान और एक बेटी एहलम खान हैं। शादाब ने कुछ फिल्मों में काम किया, लेकिन सफल नहीं हो सका।

निर्देशन भी किया
अमजद खान ने अपने लंबे करियर में ज्यादातर नकारात्मक भूमिकाएँ निभाईं। अमिताभ बच्चन, धर्मेन्द्र जैसे सितारों के सामने दर्शक उन्हें खलनायक के रूप में देखना पसंद करते थे और वे स्टार विलेन थे। इसके अलावा उन्होंने कुछ फिल्मों में चरित्र और हास्य भूमिकाएँ अभिनीत की, जिनमें शतरंज के खिलाड़ी, दादा, कुरबानी, लव स्टोरी, याराना प्रमुख हैं। निर्देशक के रूप में भी उन्होंने हाथ आजमाए। चोर पुलिस (1983) और अमीर आदमी गरीब आदमी (1985) नामक दो फिल्में उन्होंने बनाईं, लेकिन इनकी असफलता के बाद उन्होंने फिर कभी फिल्म निर्देशित नहीं की। 
 
पिता को माना गुरु
अमजद अपनी सफलता और अभिनेता के करियर को इतनी ऊँचाई देने का श्रेय पिता जयंत को देते हैं। पिता को गुरु का दर्जा देते हुए उन्होंने कहा था कि रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट अपने छात्रों को जितना सिखाती है, उससे ज्यादा उन्होंने अपने पिता से सीखा है। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में यदि उन्होंने प्रवेश लिया होता, तो भी इतनी शिक्षा नहीं मिल पाती। उनके पिता उन्हें आखिरी समय तक अभिनय के मंत्र बताते रहे।
 
दरियादिल अमजद
पर्दे पर खलनायकी के तेवर दिखाने वाले अमजद निजी जीवन में बेहद दरियादिल और शांति प्रिय इंसान थे। अमिताभ बच्चन ने एक साक्षात्कार में बताया था कि अमजद बहुत दयालु इंसान थे। हमेशा दूसरों की मदद को तैयार रहते थे। यदि फिल्म निर्माता के पास पैसे की कमी देखते, तो उसकी मदद कर देते या फिर अपना पारिश्रमिक नहीं लेते थे। उन्हें नए-नए चुटकुले बनाकर सुनाने का बेहद शौक था। अमिताभ को वे अक्सर फोन कर लतीफे सुनाया करते थे। 
 
मोटापा बना बाधा
एक कार दुर्घटना में अमजद बुरी तरह घायल हो गए। एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में लोकेशन पर जा रहे थे। ऐसे समय में अमिताभ ने उनकी बहुत मदद की। वे तेजी से रिकवर होने लगे। लेकिन डॉक्टरों की बताई दवा के सेवन से उनका वजन और मोटापा इतनी तेजी से बढ़ा कि वे चलने-फिरने और अभिनय करने में कठिनाई महसूस करने लगे। वैसे अमजद मोटापे की वजह खुद को मानते थे। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि ‘शोले’ की रिलीज के पहले उन्होंने अल्लाह से कहा था कि यदि फिल्म सु‍परहिट होती है तो वे फिल्मों में काम करना छोड़ देंगे। फिल्म सुपरहिट हुई, लेकिन अमजद ने अपना वादा नहीं निभाते हुए काम करना जारी रखा। ऊपर वाले ने मोटापे के रूप में उन्हें सजा दे दी। इसके अलावा वे चाय के भी शौकीन थे। एक घंटे में दस कप तक वे पी जाते थे। इससे भी वे बीमारियों का शिकार बने। मोटापे के कारण उनके हाथ से कई फिल्में फिसलती गई। 27 जुलाई 1992 को उन्हें दिल का दौरा पड़ा और दहाड़ता गब्बर हमेशा के लिए सोया गया। अमजद ने हिन्दी सिनेमा के खलनायक की इमेज के लिए इतनी लंबी लकीर खींच दी थी कि आज तक उससे बड़ी लकीर कोई नहीं बना पाया है।

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