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रंगों के नाम से सराबोर रंग-रंगीली फिल्में

हमें फॉलो करें रंगों के नाम से सराबोर रंग-रंगीली फिल्में

समय ताम्रकर

, सोमवार, 9 मार्च 2020 (18:02 IST)
रंगों को उत्साह, उल्लास और खुशियों का पर्याय कहा जा सकता है। इसलिए रंगों के त्योहार पर चारों ओर खुशियाँ दिखाई देती हैं। फिल्म वालों को तो रंगीला ही कहा जाता है। जीवन के हर रंग उनकी फिल्मों में शामिल होते हैं। 
 
खुशियों का रंग, जोश का रंग, देशभक्ति का रंग, हास्य का रंग, दर्द का रंग उनकी फिल्मों में दिखाई देता है। फिल्मों में होली के दृश्य और गाने समय-समय पर दिखाई दिए हैं। फिल्मों के नाम में भी रंगों ने अपना रंग जमाया है। आइए चर्चा करें उन फिल्मों की जिनके नाम रंगों से सराबोर हों- 
 
होली पर गुलाल और लाल रंग सबसे ज्यादा प्रयोग किया जाता है इसलिए शुरुआत इसी रंग से करते हैं। लाल बंगला (1966), लाल किला (1961), लाल पत्थर (1972) तथा लाल हवेली (1944) अपने नाम से ही रहस्यमय फिल्मों का आभास देती हैं। लाल दुपट्टा (1948) और लाल चुनरिया (1983) में लाल शब्द का उपयोग रोमांस के लिए किया गया है। 
 
कुछ नाम बड़े अजीब भी हैं मसलन लाल बादशाह (1999), लाल चिठ्‍ठी (1935) और लाल चीता (1935)। रानी और लाल परी (1975), लाल परी (1954) और लाल बुझक्कड़ (1938) भी फिल्मों में दिखाई दिए हैं। इसके अलावा लाल सलाम (2002), काली टोपी लाल रुमाल (1959) और लाल बत्ती (1957) जैसी फिल्में भी प्रदर्शित हो चुकी हैं, जिनके नाम में लाल है। लाल रंग (2016) और लाल कप्तान (2019) कुछ समय पहले ही रिलीज हुई हैं। वैसे ज्यादातर फिल्में असफल रही हैं जिनके नाम में लाल आया है। 
 
कुछ लोगों को हिंदी पसंद नहीं है, इसलिए उन्होंने अपनी फिल्मों के नाम में ‘रेड’ शब्द प्रयुक्त किया है। रेड रोज़ (1980), रेड सिग्नल (1941), रेड स्वस्तिक (2007) और रेड (2007) नामक फिल्में दर्शकों को देखने को मिलीं, ये बात और है कि इन फिल्मों को देखकर दर्शक रेड हो गए। 
 
नीले रंग का भी अपना ही महत्व है। इससे विशालता का आभास होता है। नीला आकाश (1965), नीलकमल (1947, 1968), नीला (1935), नीलम परी (1952), नील मणि (1957), नीली आँखें (1962) और नीलम (1945)  नामक फिल्में देखने को मिलीं। ब्लू अम्ब्रेला (2004) और हैदराबाद ब्लूज़ (1998) जैसे फिल्में प्रदर्शित हो चुकी हैं। अक्षय कुमार की 'ब्लू' (2009) करोड़ों की लागत से बनी थी लेकिन दर्शक जरा भी आकर्षित नहीं हुए। 
 
काला रंग को भले ही कुछ लोग अशुभ मानते हैं, लेकिन फिल्म वालों को यह बेहद प्रिय है। इस रंग के नाम पर आधारित उन्होंने कई फिल्में बनाईं। काला या ब्लैक शब्द जुड़ने से किसी भी शब्द का अर्थ बदल जाता है। 
 
एक निर्माता ने तो समुंदर ही काला कर दिया और फिल्म का नाम रखा काला समुंदर (1962), तो किसी को पर्वत काला दिखाई दिया और उन्होंने फिल्म बना डाली काला पर्वत (1971)। 
 
काला घोड़ा (1963), काला सोना (1975), काला आदमी (1978), काला पत्थर (1979), काला पानी (1958, 1980), काला धंधा गोरे लोग (1986), काला बाजार (1960, 1989), काला कोट (1993), काला सच (1995), सज़ा-ए-काला पानी (1996), काला चोर (1956), काला आदमी (1978), गोरा और काला (1972), दाल में काला (1964) और काला चश्मा (1962) जैसे रोचक नाम भी फिल्मों के रखे गए हैं। 
 
ब्लैक शब्द भी प्रचलन में रहा है। ब्लैक बॉक्स (1936), ब्लैक आउट (1942), ब्लैक केट (1959), ब्लैकमेलर (1959), ब्लैक राइडर, ब्लैक टाइगर (1960), ब्लैक शेडो (1963), ब्लैक ऐरो (1969), ब्लैकमेल (1973, 2005), ब्लैक (2005), ब्लैक फ्रायडे (2007) जैसी फिल्मों में ब्लैक शब्द का उपयोग फिल्म के प्रभाव को बढ़ाने के लिए किया गया। एक निर्माता ने बिपाशा के नाम पर ही फिल्म बना डाली- बिपाशा द ब्लैक ब्यूटी (2006)।
 
ब्लैक जहाँ अँधेरे का प्रतीक है वहीं व्हाइट रोशनी का। इसलिए कुछ फिल्मकारों ने इन दोनों रंगों का नाम एक साथ प्रयोग किया। सुभाष घई की ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ प्रदर्शित हुई है। मि. ब्लैक मि. व्हाइट और द ब्लैक एंड व्हाइट फैक्ट जैसी फिल्में भी देखने को मिलीं। 
 
सफेद रंग पर ‘श्वेत : द व्हाइट रेनबो’ (2005), व्हाइट नॉइज़ (2005) प्रदर्शित हो चुकी हैं। 1977 में सफेद शब्द वाली दो फिल्में प्रदर्शित हुईं ‘सफेद झूठ’ और ‘सफेद हाथी’। सफेद सवार (1941) में दिखाई दिए थे।
 
गुलाबी (1966) और गाल गुलाबी नैन शराबी (1974) नामक दो फिल्मों में गुलाबी रंग दिखाई दिया। वहीं हरे रंग पर ‘हरे काँच की चूडि़याँ’ (1967) का नाम इस समय याद आ रहा है। 
 
रंग से सभी रंगों का आभास होता है। इसलिए फिल्मों के नाम में रंग शब्द खूब दिखाई दिया। रंग शब्द से अलग-अलग मतलब निकाले गए हैं। देशभक्ति का रंग, रंग दे बसंती (2006) और तिरंगा (1993) में दिखाई दिया। 
 
किसी को दुनिया मतलबी दिखाई दी तो उन्होंने अपनी फिल्म का नाम रख दिया दो रंगी दुनिया (1933) तो किसी को दुनिया अच्छी लगी तो उन्होंने अपनी फिल्म का नाम रखा रंगीन जमाना (1948)। केसरी भी एक रंग है और इसी नाम की फिल्म 2019 में देखने को मिली। 
 
कुछ ज्यादा ही उत्साहित या जिसके चरित्र में थोड़ी खोट हो, उसके लिए अक्सर रंगीला शब्द उपयोग किया जाता है। इसलिए रंगीला राजपूत (1933), रंगीला नवाब (1935), रंगीला मजदूर (1938), रंगीला जवान (1940), रंगीले दोस्त (1944), रंगीला मुसाफिर (1950), रंगीला (1952, 1995), रंगीला राजा (1960) रंगीला रतन (1976), रंगीन रातें (1956) और रंगीन कहानी (1947) जैसे नाम से ही फिल्म की कहानी का आभास हो जाता है। 
 
रंग शब्द का उपयोग घमंड के लिए भी प्रयुक्त किया जाता रहा, इसलिए अपने रंग हजार (1975) और रंगबाज (1996) नामक फिल्में भी आईं। एक्शन और सामाजिक फिल्मों के नाम में भी रंग आया, जैसे लहू के दो रंग (1997, 1979), कुरबानी रंग लाएगी (1991), मेहँदी रंग लाएगी (1982) और ये खून रंग लाएगा (1970)। 
 
इसके अलावा सात रंग के सपने (1998), रंग (1993), रंग-बिरंगी (1983), रुत रंगीली आई (1972), रंगोली (1962), नवरंग (1959), रंगीला राजस्थान (1949) और रंग महल (1948) में भी रंग छाया रहा। 
 
चूँकि त्योहार होली का है इसलिए होली नामक फिल्मों पर भी गौर कर लिया जाए। होली (1940, 1984), होली आई रे (1970), सिंदूर की होली (1996) और कर्मा, कन्फेशन एंड होली प्रदर्शित होने वाली है। 
 
हमें तो इतने ही नाम याद आए। अगर आपको भी कोई नाम याद आ रहा हो तो हमें जरूर बताइएगा। 

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