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समय से आगे चलने वाला जादूगर: क्यों आज भी हर प्लेलिस्ट में जिंदा हैं राहुल देव बर्मन?

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RD Burman
भारतीय सिनेमा में कई महान संगीतकार आए और उन्होंने अपने दौर को यादगार बनाया, लेकिन कुछ कलाकार ऐसे होते हैं जो सिर्फ अपने समय के नहीं होते, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भी बन जाते हैं। राहुल देव बर्मन, जिन्हें दुनिया प्यार से पंचम दा के नाम से जानती है, उन्हीं विरले कलाकारों में शामिल हैं। उनकी धुनें सिर्फ गाने नहीं थीं, बल्कि भावनाओं, प्रयोगों और आधुनिक सोच का ऐसा संगम थीं, जो आज भी उतना ही ताजा महसूस होता है जितना 40-50 साल पहले होता था।
 
आज जब सोशल मीडिया पर पुराने गाने फिर से वायरल होते हैं, रीमिक्स बनते हैं, नए कलाकार उनके गीतों को रीक्रिएट करते हैं और ओटीटी की फिल्मों में उनकी धुनें दोबारा सुनाई देती हैं, तब एक सवाल बार-बार उठता है—आखिर राहुल देव बर्मन इतने वर्षों बाद भी लोगों के दिलों पर राज क्यों करते हैं?
 

समय से कई दशक आगे सोचने वाले संगीतकार

राहुल देव बर्मन की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि वे कभी भी एक तय ढर्रे पर नहीं चले। जिस दौर में हिंदी फिल्मों में पारंपरिक ऑर्केस्ट्रा और सीमित वाद्ययंत्रों का इस्तेमाल होता था, उस समय उन्होंने पश्चिमी संगीत, भारतीय शास्त्रीय संगीत, लोकधुनों, जैज, रॉक, लैटिन और ब्लूज़ को एक साथ जोड़कर ऐसा संगीत तैयार किया जिसे सुनकर लोग हैरान रह जाते थे।

वे सिर्फ धुन नहीं बनाते थे, बल्कि हर गीत के लिए एक अलग दुनिया तैयार करते थे। यही वजह है कि उनके बनाए गीत आज भी आधुनिक महसूस होते हैं। अगर कोई युवा पहली बार उनका कोई गीत सुने, तो शायद उसे यह अंदाजा भी न लगे कि यह धुन कई दशक पुरानी है।

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हर गीत में होता था एक नया प्रयोग

पंचम दा को भारतीय फिल्म संगीत का सबसे बड़ा प्रयोगधर्मी संगीतकार कहा जाए तो गलत नहीं होगा। वे रोजमर्रा की चीजों से भी संगीत निकाल लेते थे। कांच की बोतल, कंघी, सांसों की आवाज, ताली, सीटी, गिलास, धातु की वस्तुएं, इन सबका इस्तेमाल उन्होंने अपने गीतों में बेहद रचनात्मक तरीके से किया।
 
उनका मानना था कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती। यही सोच उन्हें अपने समकालीन संगीतकारों से अलग बनाती थी। वे रिकॉर्डिंग स्टूडियो को प्रयोगशाला की तरह इस्तेमाल करते थे, जहां हर नए गीत के साथ कुछ नया करने की कोशिश होती थी।
 

युवाओं के बीच आज भी क्यों हैं सबसे लोकप्रिय?

राहुल देव बर्मन की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह यह है कि उनका संगीत किसी एक पीढ़ी तक सीमित नहीं है। उनके गीतों में ऊर्जा है, रोमांस है, दर्द है, दोस्ती है, आजादी है और जिंदगी को खुलकर जीने का संदेश भी है।
 
आज के युवा जब उनकी धुनें सुनते हैं तो उन्हें उनमें वही ताजगी महसूस होती है, जो किसी नए संगीत में होती है। यही कारण है कि इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और स्पॉटिफाई जैसी डिजिटल म्यूजिक प्लेटफॉर्म्स पर उनके गीत लगातार सुने जाते हैं।
 
उनकी धुनों में एक ऐसी सार्वभौमिक अपील है जो समय के साथ खत्म नहीं हुई। वे पुराने दौर की याद भी दिलाती हैं और आधुनिक संगीत का एहसास भी कराती हैं।

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कुछ गीत जो हमेशा अमर रहेंगे

अगर राहुल देव बर्मन की प्रतिभा को समझना हो तो उनके कुछ कालजयी गीतों पर नजर डालना ही काफी है। 'दम मारो दम' सिर्फ एक गीत नहीं था, बल्कि उस दौर के युवाओं की सोच और आजादी का प्रतीक बन गया। इसकी धुन और रिदम आज भी लोगों को झूमने पर मजबूर कर देती है।
 
'चुरा लिया है तुमने जो दिल को' रोमांटिक गीतों की दुनिया में आज भी एक मानक माना जाता है। इसकी शुरुआती गिटार ट्यून सुनते ही गीत पहचान में आ जाता है।
 
'महबूबा महबूबा' में उन्होंने भारतीय और मध्य-पूर्वी संगीत का ऐसा मिश्रण पेश किया, जो उस समय बिल्कुल नया था। इस गीत में उनकी अपनी आवाज भी लोगों को खूब पसंद आई।
 
'ओ मेरे दिल के चैन', 'तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा नहीं', 'कुछ तो लोग कहेंगे', 'ये शाम मस्तानी', 'रैना बीती जाए', 'हमें तुमसे प्यार कितना', 'मुसाफिर हूं यारों', 'पिया तू अब तो आजा' और 'मेरे नैना सावन भादों' जैसे गीत यह साबित करते हैं कि वे हर भावना के लिए अलग रंग का संगीत रच सकते थे।
 
उनकी सबसे बड़ी सफलता यह थी कि हर गीत का अपना अलग व्यक्तित्व होता था। कोई भी धुन दूसरी जैसी नहीं लगती थी।
 

सिर्फ संगीत नहीं, भावनाओं की रचना करते थे

राहुल देव बर्मन का संगीत सुनते समय ऐसा लगता है कि वे सिर्फ सुरों को नहीं, बल्कि कहानी के पात्रों की भावनाओं को भी संगीत में ढाल रहे हैं। यही कारण है कि उनके गीत फिल्म खत्म होने के बाद भी दर्शकों के साथ बने रहते हैं।
 
वे निर्देशक, गीतकार और गायक के साथ मिलकर पूरी स्थिति को समझते थे। उसके बाद ऐसी धुन तैयार करते थे जो कहानी का हिस्सा बन जाती थी। यही वजह है कि उनके अधिकांश गीत फिल्म से अलग होकर भी अपनी अलग पहचान रखते हैं।

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भारतीय फिल्म संगीत में उनका ऐतिहासिक योगदान

भारतीय फिल्म संगीत में राहुल देव बर्मन का योगदान सिर्फ हिट गानों तक सीमित नहीं है। उन्होंने यह साबित किया कि फिल्म संगीत भी लगातार बदल सकता है और नए प्रयोगों को स्वीकार कर सकता है।
 
उन्होंने आधुनिक रिकॉर्डिंग तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ाया, पश्चिमी वाद्ययंत्रों को भारतीय धुनों के साथ सहजता से जोड़ा और संगीत संयोजन (ऑर्केस्ट्रेशन) को नई ऊंचाई दी। आज बॉलीवुड में जो फ्यूजन म्यूजिक, इलेक्ट्रॉनिक साउंड और मल्टी-लेयर अरेंजमेंट सामान्य बात मानी जाती है, उसकी नींव काफी हद तक पंचम दा ने ही रखी थी।
 
कई बड़े संगीतकार, चाहे वे 1990 के दशक के हों या आज के, खुले तौर पर स्वीकार करते हैं कि वे राहुल देव बर्मन के काम से प्रेरित रहे हैं। उनकी धुनों का प्रभाव आज भी बॉलीवुड, इंडी म्यूजिक और लाइव कॉन्सर्ट संस्कृति में साफ दिखाई देता है।
 

असफलता के दौर ने भी नहीं मिटाई उनकी चमक

अपने करियर में राहुल देव बर्मन ने उतार-चढ़ाव भी देखे। 1980 के दशक के उत्तरार्ध में संगीत का स्वाद बदलने लगा और उन्हें पहले जैसी सफलता नहीं मिली। लेकिन समय ने साबित किया कि महान कलाकारों का मूल्य तत्काल नहीं, बल्कि इतिहास तय करता है।
 
उनके निधन के बाद उनकी रचनाओं को जिस तरह नई पीढ़ी ने अपनाया, वह अपने आप में एक अनोखी मिसाल है। आज उनके गीतों को सुनने वालों में बड़ी संख्या ऐसे युवाओं की है, जिनका जन्म उनके निधन के कई वर्षों बाद हुआ।

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इसलिए कभी पुराने नहीं होंगे पंचम दा

राहुल देव बर्मन की सबसे बड़ी ताकत उनकी जिज्ञासा थी। वे लगातार सीखते रहे, नए प्रयोग करते रहे और संगीत को बदलते समय के साथ आगे ले जाने की कोशिश करते रहे। शायद यही कारण है कि उनका संगीत समय के साथ बूढ़ा नहीं हुआ।
 
आज जब संगीत तेजी से बदल रहा है, तब भी पंचम दा की धुनें यह याद दिलाती हैं कि सच्चा संगीत ट्रेंड का मोहताज नहीं होता। वह पीढ़ियां बदल जाने के बाद भी लोगों के दिलों में जगह बनाए रखता है।
 
राहुल देव बर्मन सिर्फ एक संगीतकार नहीं थे, बल्कि भारतीय फिल्म संगीत में एक ऐसे युग के निर्माता थे, जिन्होंने यह साबित किया कि कल्पना, साहस और प्रयोग मिल जाएं तो संगीत समय की सीमाओं को पार कर जाता है। यही वजह है कि पंचम दा आज भी हर नई पीढ़ी के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने अपने दौर में थे। उनकी धुनें सिर्फ सुनी नहीं जातीं, बल्कि महसूस की जाती हैं और शायद यही किसी महान संगीतकार की सबसे बड़ी पहचान होती है।

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