Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia
Advertiesment

शिकारा : फिल्म समीक्षा

webdunia

समय ताम्रकर

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020 (13:15 IST)
शिकारा के रिलीज होने के पहले जिस तरह की बातें और प्रचार किया गया था उससे यह आभास हुआ कि 30 साल पहले 4 लाख कश्मीरी पंडितों को जिस हालात में कश्मीर छोड़ना पड़ा उस मुद्दे पर यह फिल्म बात करेगी, लेकिन फिल्म देखने के बाद मामला कुछ और ही निकला। 
 
कश्मीरी पंडित की व्यथा तो है, लेकिन लव स्टोरी के बैकड्रॉप में। बहुत ही सतही तरीके से इस मुद्दे को छू भर लिया गया है और लव स्टोरी पर ज्यादा फोकस किया गया है। जबकि कश्मीरी पंडितों की बात ड्राइविंग सीट पर और लव स्टोरी बैक सीट पर होनी थी, लेकिन ऐसा न होने से फिल्म देखने के बाद निराशा होती है। 
 
1990 में कश्मीरी पंडितों को अचानक कश्मीर छोड़ कर जाने की धमकियां मिलने लगी। इसके कुछ दिनों पहले ही शिव कुमार धर (आदिल खान) और शांति (सादिया) की शादी हुई थी। दोनों ने बड़े जतन से अपना घर बनाया जिसे 'शिकारा' नाम दिया। 
 
मुस्लिम लीडर खुर्शीद हसन लोन (ज़मीर आशी) को मार दिया जाता है जिससे ज्यादातर मुसलमान भड़क जाते हैं जिसमें शिव का खास दोस्त लतीफ लोन (ज़ैन खान दुर्रानी) भी शामिल है। कश्मीरी पंडितों को कश्मीर छोड़ कर 'इंडिया' जाने की धमकी दी जाती है। लतीफ भी यह बात शिव से कहता है। 
 
शिव और शांति कश्मीर छोड़ कर नहीं जाना चाहते, लेकिन जब उनके घर पर हमला होता है तो भारी मन से उन्हें यह फैसला लेना पड़ता है। वे अपने ही देश में रिफ्यूजी बन कर रहने लगते हैं। 
 
अभिजात जोशी, राहुल पंडिता और विधु विनोद चोपड़ा ने मिलकर फिल्म लिखी है, लेकिन शिव और शांति की लव स्टोरी को उन्होंने ज्यादा महत्व दिया है। यह प्रेम कहानी 30 से ज्यादा सालों तक फैली हुई है। चूंकि दर्शक कश्मीर पंडितों के साथ हुए अन्याय पर फिल्म देखने के लिए आए हैं इस कारण उन्हें लव स्टोरी में बिलकुल भी रूचि नहीं रहती है। 
 
फिल्म की शुरुआत बेहद बोरिंग है और शुरुआती 20-25 मिनट फिल्म को झेलना मुश्किल हो जाता है। जब शिव और शांति को कश्मीर छोड़ने के लिए कहा जाता है, कश्मीर की घाटी का बदला हुआ रंग देखने को मिलता है तो फिल्म में थोड़ी पकड़ आती है, लेकिन जैसे ही शिव और शांति कश्मीर छोड़ने का फैसला करते हैं फिल्म फिर से उनकी प्रेम कहानी पर शिफ्ट हो जाती है। इसके बाद फिल्म लय खो देती है। 
 
कश्मीरी पंडितों को किस वजह से कश्मीर छोड़ना पड़ा? उन्हें क्या सहना पड़ा? क्यों ज्यादातर मुस्लिम भड़क गए? किन्होंने लोगों को गुमराह किया? पाकिस्तान का इसमें कितना हाथ है? क्यों भारतीय सरकार परिस्थिति पर नियंत्रण नहीं पर पाई? इन सब बातों की गहराई में फिल्म नहीं गई। फिल्म देखने के बाद कोई नई बात या जानकारी भी सामने नहीं आती। उतना ही दिखाया है जितना कि एक सामान्य व्यक्ति इस बारे में जानता है। 
 
शिव और शांति की लव स्टोरी भी नकली लगती है। इसमें कुछ अच्छे मोमेंट्स जरूर है, लेकिन ज्यादातर समय यह 'बनावटी' लगती है। शिव और शांति को अधिक उम्र का दिखाते समय उनका जो मेकअप किया गया है वो भी बहुत नकली है इसलिए भी उनकी प्रेम कहानी बहुत ज्यादा अपील नहीं करती। 
 
निर्देशक के रूप में विधु विनोद चोपड़ा ने एक अहम विषय को चुना है जो आज भी सुलगता हुआ है, लेकिन वे इस विषय के साथ न्याय नहीं कर पाए। कश्मीरी पंडितों के साथ हुए अन्याय ऐसा नहीं पेश किया गया कि दर्शक इमोशनल हो जाए। वे उनके दर्द को महसूस करें।
 
नए कलाकारों को लेकर फिल्म बनाना सही कदम है क्योंकि कहानी की यही डिमांड थी। आदिल और सादिया का अभिनय उम्दा है। सुलझे और भले लोगों का किरदार उन्होंने बारीकी से निभाया है। 
 
फिल्म की सिनेमाटोग्राफी शानदार है और कुछ सीन अच्छे से रिक्रिएट किए गए हैं जो उस दौर की बारीकियां दिखाते हैं। 
 
कुल मिलाकर 'शिकारा' एक अच्छे सब्जेक्ट पर बनी औसत फिल्म है। 
 
बैनर : विनोद चोपड़ा फिल्म्स, फॉक्स स्टार स्टूडियोज़
निर्देशक : विधु विनोद चोपड़ा 
संगीत : संदेश शांडिल्य, अभय सोपोरी 
कलाकार : आदिल खान, सादिया, ज़ैन खान दुर्रानी, प्रियांशु चटर्जी
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 24 सेकंड 
रेटिंग : 2/5 

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

अली अब्बास जफर की सुपरहीरो फिल्म में दिखेगा कैटरीना कैफ का एक्शन अवतार!