उजड़ा चमन : फिल्म समीक्षा

समय ताम्रकर

शुक्रवार, 1 नवंबर 2019 (14:37 IST)
जिन लड़कों के बाल कम उम्र में या शादी के पहले ही झड़ जाते हैं उन्हें बड़ी परेशानी का सामना करना पड़ता है। न केवल वे लोगों के लिए मजाक बन जाते हैं बल्कि उन्हें शादी में भी दिक्कत होती है। लड़कियां गंजे से शादी करना पसंद नहीं करती। इसी थीम के इर्दगिर्द 'उजड़ा चमन' की कहानी बुनी गई है। 
 
उजड़ा चमन आमतौर पर उस शख्स के लिए कहा जाता है जिसके सिर पर बालों की कमी हो गई हो। फिल्म के नायक चमन कोहली (सनी सिंह) की तो शादी भी नहीं हुई और वह उजड़ा चमन हो गया।
 
30 वर्ष के चमन को तब जोरदार झटका लगता है जब ज्योतिष कहता है कि यदि उसने 31 के होने के पहले शादी नहीं की तो वह कुंआरा ही रह जाएगा। 
 
कॉलेज में हिंदी पढ़ाने वाला चमन साथी लेक्चरर एकता (ऐश्वर्या सलूजा) से नजदीकी बढ़ाने की कोशिश करता है, लेकिन वहां से उसे रिजेक्शन मिलता है। 
 
कॉलेज की फर्स्ट ईयर की स्टूडेंट आईना अली खान (करिश्मा शर्मा) उससे नजदीकियां बढ़ाती हैं, लेकिन कुछ दिनों में चमन को समझ में आ जाता है कि यह सिर्फ प्रश्नपत्र हासिल करने के लिए किया गया था। 
 
हारकर वह टिंडर पर जाता है जहां उसकी जोड़ी अप्सरा (मानवी गागरू) से जमती है। दोनों पहली बार मिलते हैं तो अप्सरा को चमन गंजापन पसंद नहीं आता तो चमन को अप्सरा के भारी वजन पर ऐतराज रहता है। दोनों एक-दूसरे को रिजेक्ट कर देते हैं। 
 
किस्मत फिर दोनों को साथ खड़ा कर देती है। चमन से अप्सरा शादी के लिए तैयार हो जाती है। चमन अनमने ढंग से मान जाता है। दोनों की सगाई हो जाती है। शादी वाले दिन अप्सरा शादी से इंकार कर देती है। वह ऐसा क्यों करती है? चमन पर क्या बीतती है? इनके जवाब फिल्म के अंत में मिलते हैं। 
 
2017 में रिलीज हुई कन्नड़ फिल्म 'ओंडू मोट्टेया कथे' का उजड़ा चमन ऑफिशियल हिंदी रिमेक है। मूल कहानी राज बी. शेट्टी ने लिखी है। दानिश जे. सिंह ने 'उजड़ा चमन' का स्क्रीनप्ले और संवाद लिखे हैं। 
 
निश्चित रूप से फिल्म की कहानी नयापन लिए हुए है और एक मनोरंजक हास्य फिल्म बनने की इसमें भरपूर गुंजाइश है। लेकिन इतने उम्दा आइडिए पर ठीक-ठाक फिल्म ही बन पाई है। 
 
फिल्म अपनी ताजगी बहुत जल्दी खो देती है। शुरुआत में ही इतनी सारी बातें तेजी से दिखा दी गई कि बाद में बताने के लिए कुछ रहा ही नहीं। खासतौर पर इंटरवल के बाद फिल्म की रफ्तार सुस्त हो जाती है और बोर भी करने लगती है। दो घंटे की फिल्म बहुत लंबी लगती है। 
 
स्क्रीनप्ले में कुछ बातें अधूरी सी हैं। चमन एक लड़की को पटाने की कोशिश करता है, लेकिन उसी लड़की को उसका छोटा भाई पटा लेता है। यह प्रसंग दर्शकों को हंसाने के लिए रखा गया है, लेकिन निर्देशक ने इसे बहुत ही अस्पष्ट तरीके से पेश किया है। 
 
जो एकता, चमन को पहले रिजेक्ट कर देती है, चमन की सगाई टूटने के बाद चमन के प्रति क्यों आकर्षित होती है, समझ से परे है। चमन का अनमने ढंग से अप्सरा से शादी के लिए तैयार होने वाली बात भी ढंग से दिखाई नहीं गई है। 
 
चमन को अप्सरा से अपने रिश्ते की अहमियत तब समझ में आती है जब वह अपने कॉलेज के दोस्त के घर जाता है। यह सीन अच्छा बन पड़ा है, लेकिन फिल्म में चमन को बहुत समझदार दिखाया गया है तो उसे इतनी सी बात इतनी देर से क्यों समझ में आती है? 
 
आईना और चमन वाला ट्रैक शुरू में अच्‍छा लगता है, लेकिन बहुत जल्दी ही समझ आ जाता है कि आगे क्या होने वाला है। कहानी में ऐसी कुछ गड़बड़ियां फिल्म देखते समय परेशान करती हैं। 
 
फिल्म में कुछ सीन हंसाते भी हैं, जैसे चमन और उसके पैरेंट्स के बीच के सीन, चमन और अप्सरा की पहली मुलाकात, चमन का बालों की समस्या के लिए डॉक्टर से मिलना, लेकिन इनकी संख्या कम है। 
 
कॉमेडी के नाम पर कुछ सीन लाउड हो गए हैं और कुछ में हंसाने की कोशिश नजर आती है। चमन को कॉलेज स्टूडेंटस द्वारा चिढ़ाने वाले सीन नकली लगते हैं। 
 
अभिषेक पाठक के डायरेक्शन में स्पार्क नजर नहीं आता। उन्होंने सीधे-सीधे लिखे हुए को फिल्मा दिया है। वे न तो फिल्म को मनोरंजक बना पाए और न स्क्रिप्ट की कमियों को छिपा पाए। फिल्म के जरिये उन्होंने मैसेज भी देने की कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। 
 
सनी सिंह फिल्म की कमजोर कड़ी साबित हुए। पूरी फिल्म में उन्होंने चेहरा लटका के रखा। एक ही एक्सप्रेशन में उन्हें पूरी फिल्म में देखना आसान बात नहीं है। सिर्फ बाल कम होने से कोई इतना उदास कैसे रह सकता है? कैमरा ज्यादातर समय सनी पर ही फोकस रहता है और वे अपनी एक्टिंग से दर्शकों को बांध नहीं पाए। 
 
मानवी गागरू, ऐश्वर्या सलूजा, शरीब हाशमी और करिश्मा शर्मा अपनी एक्टिंग से प्रभावित करते हैं। छोटे-से रोल में सौरभ शुक्ला फॉर्म में नजर नहीं आए। फिल्म का संगीत निराश करता है। तकनीकी रूप से भी फिल्म औसत है। 
 
उजड़ा चमन के आइडिए में दम है, लेकिन स्क्रिप्ट, डायरेक्शन और एक्टिंग की वजह से यह चमन हरा-भरा नहीं हो पाया। 
 
निर्माता : कुमार मंगत पाठक, अभिषेक पाठक
निर्देशक : अभिषेक पाठक
कलाकार : सनी सिंह, मानवी गागरू, सौरभ शुक्ला, अतुल कुमार, करिश्मा शर्मा, ऐश्वर्या सखूजा, शरीब हाशमी
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * अवधि : 2 घंटे 
रेटिंग : 2/5 

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