वॉर : फिल्म समीक्षा

समय ताम्रकर

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019 (15:03 IST)
इन दिनों बॉलीवुड में बड़े बजट की एक्शन फिल्म बनाने की होड़ मची हुई है। विदेश से स्टंट डायरेक्टर्स बुलाए जाते हैं जो कमाल के एक्शन सीन रचते हैं। एक-एक स्टंट पर ही करोड़ों रुपये फूंक दिए जाते हैं और हॉलीवुड की एक्शन फिल्मों जैसा एक्शन दिखाने की कोशिश की जाती है।
 
निश्चित रूप से भारतीय फिल्मों में भी बेहतरीन एक्शन सीन देखने को मिलते हैं, लेकिन इन एक्शन दृश्यों को पिरोने के लिए एक अच्छी कहानी की भी जरूरत पड़ती है और वहीं पर भारतीय फिल्में मार खा जाती हैं। 
 
वॉर में भी तीन-चार बेहतरीन एक्शन डायरेक्टर्स हैं, जिन्होंने पुर्तगाल में, इराक में, माल्टा में शानदार एक्शन सीन फिल्माए हैं। कार या मोटर बाइक द्वारा एक-दूसरे का पीछा करना हो या चलते हवाई जहाज में फाइटिंग सीन हो, बढ़िया तरीके से फिल्माए हैं, लेकिन कमजोर कहानी के कारण वॉर उन उम्मीदों पर खरी नहीं उतरती जिसकी अपेक्षा लेकर दर्शक टिकट खरीदते हैं। 
 
कहानी है कबीर (रितिक रोशन) नामक भारतीय एजेंट की जो इलियास नामक आतंकी के पीछे पड़ा हुआ है। अचानक कबीर विद्रोही बन जाता है। वह अपने ही लोगों को मारने लगता है। 
 
कबीर को पकड़ने का जिम्मा खालिद (टाइगर श्रॉफ) को दिया जाता है जिसे कबीर ने ही तैयार किया है। कबीर और खालिद के बीच अजीब सा रिश्ता है। खालिद के गद्दार पिता का कत्ल कबीर ने ही किया था। 
 
कबीर विद्रोही क्यों बन गया? क्या खालिद बदला लेने के लिए कबीर के नजदीक गया है? क्या इलियास को कबीर पकड़ पाएगा? इन सारे सवालों के जवाब फिल्म में मिलते हैं। 
 
फिल्म की शुरुआत बेहतरीन है। आधे घंटे में ही बहुत कुछ घट जाता है और फिल्म सरपट दौड़ती नजर आती है। सारे पत्ते तुरंत खोल दिए जाते हैं। रितिक की एंट्री वाला सीन जबरदस्त है और दर्शक चौंक जाते हैं क्योंकि रितिक के किरदार से ऐसी उम्मीद नहीं रहती। 
 
टाइगर श्रॉफ का एंट्री सीन फिल्म का सर्वश्रेष्ठ एक्शन सीन है। इसे बिना कट के एक ही बार में फिल्माया गया है और यह सीक्वेंस टाइगर की एक्शन पर पकड़ को दर्शाता है। 


 
शुरुआती आधे घंटे के बाद फिल्म का ग्राफ नीचे आने लगता है, हालांकि कुछ ट्विस्ट और टर्न फिल्म को लगातार संभालते रहते हैं। बीच बीच में एक्शन सीन या स्लो मोशन में टाइगर और रितिक के सीन दर्शकों में हलचल मचा देते हैं, लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म बिखरने लगती है। ऐसा लगता है कि निर्देशक और लेखक के पास अब बताने के लिए कुछ नहीं है और वे फिल्म को खींच रहे हैं। 
 
फिल्म का सबसे बड़ा माइनस पाइंट ये है कि क्या हो रहा है? कैसे हो रहा है? जैसी बातें यदि आपने सोच ली तो फिल्म देखने का मजा आप नहीं उठा सकते। पहले हाफ में फिर भी तेज गति से भागती फिल्म के आगे ये प्रश्न छिपे रहते हैं, लेकिन सेकंड हाफ में जैसे ही कहानी हांफने लगती है ये प्रश्न परेशान करने लगते हैं। 
 
कबीर के पीछे खालिद लगा हुआ है, यह जानते हुए भी खालिद से कबीर मिलने जाता है। वह अब किसे मारने वाला है यह भी बताता है। ये बातें बेवकूफी भरी लगती है। आखिर कबीर अपना ही काम मुश्किल क्यों कर रहा है? 
 
कबीर यदि किसी मिशन पर है तो ऐसा कर वह देश का ही नुकसान कर रहा है। लेकिन निर्देशक को दोनों हीरो को आमने-सामने दिखाना था इसलिए उन्होंने इस तरह के सीन बना डाले। 
 
कबीर को ढूंढने की कोशिश में खालिद को बहुत मेहनत करना पड़ती है, लेकिन जब लेखक और निर्देशक चाहते हैं वह तुरंत कबीर के सामने आ जाता है। 
 
कहने का मतलब ये कि लेखक ने पूरी तरह से सहूलियत ली है और जब चाहा अपने हिसाब से सब कुछ करवाया है, भले ही वो जस्टिफाई हो रहा हो या नहीं। 
 
फिल्म के आखिर में खालिद के किरदार को लेकर एक ट्विस्ट दिया गया है। चौंकाने की कोशिश की गई है, लेकिन इससे फिल्म का नुकसान ही होता है। कमर्शियल और लार्जर देन लाइफ मूवी पसंद करने वाले दर्शक इस तरह की बात कभी पसंद नहीं करेंगे। 


 
कबीर और खालिद को बहुत काबिल बताया गया है, लेकिन उनकी ये काबिलियत परदे पर नजर नहीं आती है। दुश्मनों को मारने या पकड़ने का काम वे बेहद आसानी से करते रहते हैं। कभी उनके सामने कोई रूकावट नहीं आती। 
 
कहानी पूरी तरह से एक्शन को समर्पित है, लेकिन मनोरंजन की कमी फिल्म में लगती है। एक ही ट्रेक पर चलती फिल्म तभी अच्छी लगती है जब वो ट्रैक अच्छी तरह से लिखा गया हो। 'वॉर' देखते समय कॉमेडी, रोमांस या हिट गानों की कमी खलती है जो फिल्म के लिए अच्छी बात नहीं है। 
 
वाणी कपूर वाला ट्रैक छोटा-सा है, लेकिन वाणी-रितिक की 'प्रेम कहानी' में जिस तरह का व्यवहार रितिक का दिखाया गया है वो हीरो की इमेज से मेल नहीं खाता। इस तरह की फिल्मों में दर्शक हीरो को शुद्ध अवतार में देखना पसंद करते हैं और वे उसमें कोई कमी बर्दाश्त नहीं कर पाते। 
 
फिल्म के प्लस पाइंटस हैं इसका एक्शन। हालांकि दर्शकों की पूरी तरह प्यास नहीं बुझती। उन्हें और ज्यादा एक्शन की उम्मीद थी। अन्य प्लस पाइंट्स हैं- फिल्म का स्टाइलिश लुक, शॉट टेकिंग, सिनेमाटोग्राफी और बैकग्राउंड म्युजिक। 
 
फिल्म को बड़े स्कैल पर बनाया गया है और यह बात पूरी फिल्म में नजर आती है। बहुत ही जबरदस्त तरीके से इसे शूट किया गया है। 
 
निर्देशक के रूप में सिद्धार्थ आनंद तकनीकी रूप से तो प्रभावित करते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट पर उन्हें ध्यान देना सीखना होगा। पहले हाफ में अपने निर्देशन के दम पर उन्होंने खामियों को थोड़ा छिपाए रखा है, लेकिन दूसरे हाफ में उनका नियंत्रण छूट गया है। 
 
रितिक रोशन बेहद हैंडसम दिखे हैं। उनका लुक, स्टाइल और एक्शन शानदार है। जिस अंदाज में रितिक को आप देखना चाहते हैं उसी अंदाज में वे वॉर में मौजूद हैं। एक्टिंग भी उनकी बढ़िया है। 
 
टाइगर श्रॉफ ने रितिक जैसे स्टार से जम कर टक्कर ली है। एक्शन सीन उन्होंने शानदार किए हैं और रितिक के साथ एक्शन दृश्यों में उनकी जुगलबंदी देखने लायक है। उनके रोल पर थोड़ी और मेहनत की जा सकती थी। 
 
वाणी कपूर छोटे-से रोल में अपना असर छोड़ती हैं। आशुतोष राणा का अभिनय औसत रहा है। फिल्म में गानों की सिचुएशन ठीक से नहीं बनाई गई है। 
 
वॉर का राइटिंग डिपार्टमेंट कमजोर है, लेकिन रितिक-टाइगर का स्टारडम और एक्शन इसकी थोड़ी भरपाई करते हैं। 
 
बैनर : यश राज फिल्म्स
निर्माता : आदित्य चोपड़ा
निर्देशक : सिद्धार्थ आनंद
संगीत : विशाल और शेखर
कलाकार : रितिक रोशन, टाइगर श्रॉफ, वाणी कपूर
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 36 मिनट 27 सेकंड 
रेटिंग : 2.5/5 

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