एक्चुअल क्लास को रिप्लेस नहीं कर सकती वर्चुअल क्लास, बता रहे हैं The Doon School के डायरेक्टर पब्लिक अफेयर्स

वृजेन्द्रसिंह झाला

मंगलवार, 12 मई 2020 (13:08 IST)
कोरोना संक्रमण (Corona) के काल में दुनिया के हर क्षेत्र में बदलाव दिखाई दे रहे हैं। शिक्षा का क्षेत्र भी इससे अछूता नहीं है। अभी तक जूम, स्काइप, गूगल क्लास रूम आदि के माध्यम से प्रोफेशनल कोर्सेस की पढ़ाई हुआ करती थी, लेकिन अब 12वीं क्लास तक के बच्चों का क्लास रूम भी स्कूल परिसर में न होकर 'गूगल क्लास रूम' में तब्दील हो गया है। इसका नफा-नुकसान दोनों हो सकता है, मगर सोशल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए यह कहने में कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि आने वाले समय शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।

देश के शीर्ष शिक्षा संस्थानों में शुमार देहरादून का 'The Doon School' यूं तो आवासीय विद्यालय है, लेकिन कोरोना काल में स्कूल के विद्यार्थियों के लिए गूगल मीट ही क्लास रूम बन गया है। वर्तमान समय में बच्चे ऑनलाइन शिक्षा ही ग्रहण कर रहे हैं। हालांकि द दून स्कूल के विद्यार्थियों के लिए गूगल क्लास का कनसेप्ट नया नहीं है, लेकिन फिलहाल करीब 550 विद्यार्थियों के साथ सभी 84 शिक्षक प्रतिदिन ऑनलाइन इंगेज होते हैं। हालांकि रोज 4 से ज्यादा क्लासेस नहीं होती हैं।

यदि कोई छात्र क्लास में उपस्थि‍त नहीं होता तो तत्काल उसके पास मेल पहुंच जाता है। उसे अपनी गैरहाजिरी के लिए स्पष्टीकरण भी देना होता है। गूगल मीट में सभी बच्चे नाम एंटर कर क्लास जॉइन करते हैं। वीडियो क्लिप, प्रजेंटेशन, वॉइस ओवर, असाइनमेंट के माध्यम से उन्हें ऑनलाइन शिक्षा प्रदान की जा रही है। इसका एक और सकारात्मक पक्ष है कि यह है कि एक्चुअल क्लास में कुछ शरारती बच्चे माहौल खराब कर देते हैं, मगर ऑनलाइन में पूरा अनुशासन होता है। यदि कोई बच्चा शरारत करता भी है तो उसे 'म्यूट' किया जा सकता है।

द दून स्कूल के डायरेक्टर पब्लिक अफेयर्स पीयूष मालवीय शिक्षा में आ रहे परिवर्तनों की बात को स्वीकारते हैं और यह भी मानते हैं कोरोना के चलते देश और दुनिया में फिलहाल जो माहौल है, उसको ध्यान में रखते हुए गूगल क्लास रूम उपयोगी साबित हो रहा है। लेकिन, वे यह भी मानते हैं कि वर्चुअल क्लासेस सपोर्ट तो कर सकती हैं, लेकिन एक्चुअल क्लास को पूरी तरह रिप्लेस नहीं कर सकती हैं।

मालवीय ने वेबदुनिया से खास बातचीत में कहा कि स्कूल परिसर में चलने वाली क्लास में शिक्षक की सभी बच्चों पर नजर रहती है, लेकिन ऑनलाइन क्लासेस में सीमित चेहरे ही दिखाई देते हैं। इतना ही नहीं आवासीय विद्यालयों में तो बच्चे स्कूल समय के बाद ही शिक्षकों से मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं।

वे कहते हैं कि शिक्षकों से विद्यार्थियों का आई कॉन्टेक्ट बहुत जरूरी है। कई बातें तो बच्चे आंखों के इशारों में ही समझ जाते हैं। बच्चों को पूरे समय इस बात का अहसास रहता है कि शिक्षक उन्हें देख रहे हैं। दूसरी ओर, यदि विद्यार्थी ऑनलाइन क्लास में शामिल नहीं होना चाहता है तो ऐसी स्थिति में वह नेट कनेक्टिविटी का बहाना भी बना सकता है।

उन्होंने कहा कि यह बात सही है कि ऑनलाइन क्लासेस में करिकुलम ट्रांजेक्शन बहुत अच्छे से हो रहा है। सब कुछ पहले से तैयार रहता है। बच्चों को भी सामग्री पहले से ही उपलब्ध करवा दी जाती है। लेकिन, इसके लिए हर बच्चे को पहले से तैयारी करके आना जरूरी है, तभी वह प्रासंगिक प्रश्न पूछ पाता है।

मालवीय कहते हैं कि बच्चा ऑनलाइन क्लास में अपनी सुविधा के हिसाब से पढ़ सकता है। उसके पास पूरा मटेरियल होता है। शिक्षक को भी क्लास में उपस्थित होने का तनाव नहीं होता। वह चाय की चुस्कियों के साथ बच्चों को पढ़ा सकता है। इसका एक और बड़ा फायदा यह है कि यदि बच्चा छुट्‍टी पर है या बीमार है तो शिक्षक को क्लास में पिछला दोहराने की जरूरत नहीं होती। उसे रिकॉर्डिंग उपलब्ध करवाई जा सकती है, जिसकी मदद से वह अपनी पिछली पढ़ाई पूरी कर सकता है।

हालांकि मालवीय कहते हैं कि क्लासेस तो ऑनलाइन की जा सकती हैं, लेकिन गेम्स और अन्य हॉबीज पर ऑनलाइन काम करना काफी मुश्किल है। उन्होंने अपनी बात के पक्ष में तर्क देते हुए कहा कि पूरी दुनिया में देखा जा रहा है कि न सिर्फ बच्चों बल्कि बड़ों का अटेंशन टाइम कम होता जा रहा है और ऑनलाइन शिक्षा में यह और कम ही होगा। दरअसल, बच्चों में जो बदलाव सामने रहकर लाया जा सकता है, वह नेट कदापि नहीं दे सकता है।
 

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