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क्यों डूब रहे हैं अमेरिकी बैंक, क्या भारत पर भी होगा असर?

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वृजेन्द्रसिंह झाला

Banking collapse in America: अमेरिका में पहले सिलिकॉन वैली बैंक (Silicon Valley Bank), फिर सिग्नेचर बैंक (Signature Bank), क्रेडिट सुईस बैंक (Credit Suisse Bank) और अब फर्स्ट रिपब्लिकन बैंक (First Republic Bank) भी डूब गया। फर्स्ट रिपब्लिक अमेरिका का दूसरा सबसे बड़ा बैंक है और हाल ही में अमेरिका में दिवालिया हुए बैंकों में फर्स्ट रिपब्लिक चौथा बैंक है। कोई आश्चर्य नहीं कि इस सूची में कोई और बैंक भी जुड़ जाए। हालांकि फर्स्ट रिपब्लिक बैंक को रेगुलेटर्स ने कुछ दिनों पहले ही अपने नियंत्रण में ले लिया था। इसके बाद इसे जेपी मॉर्गन ने खरीद लिया। आखिर क्या कारण हैं कि एक के बाद एक अमेरिकी बैंक डूब रहे हैं। सबसे अहम बात क्या भारत पर भी इसका कुछ असर होगा?
 
हालांकि यह पहला मौका नहीं है ‍जब फर्स्ट रिपब्लिक बैंक बिका है। इससे पहले भी यह तीन बार अलग-अलग हाथों में बिक चुका है। वर्ष 2007 में मेरिल लिंच एंड कंपनी ने इसे 1.8 अरब डॉलर में खरीदा था, जबकि 2009 में इसे बैंक ऑफ अमेरिका ने खरीदा। इसके बाद साल 2010 में इन्वेस्टमेंट फर्म जनरल अटलांटिक और कॉलोनी कैपिटल ने इसे 1.86 अरब डॉलर में खरीदा था। हालांकि इसके बाद इसे पब्लिक कर दिया गया।
 
आखिर क्यों डूबे बैंक : दरअसल, फेडरल रिजर्व ने बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए ब्याज दरों में तेजी से बढ़ोतरी की और इधर डिपॉजिटरों ने बैंकों से पैसा निकालना शुरू कर दिया। फर्स्ट बैंक की ही बात करें तो डिपॉजिटरों ने बैंक से कुल जमा राशि में से आधे पैसे निकाल लिए। करीब तीन माह में जमाकर्ताओं ने 102 बिलियन डॉलर निकाल लिए गए। यह खबर जैसे ही बाजार में फैली बैंक के शेयर नीचे आ गए। 2022 के अंत में बैंक का डिपॉजिट 176 बिलियन डॉलर के करीब था। 
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अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व ने एसवीबी के पतन के लिए खराब बैंक प्रबंधन, कमजोर नियमन और शिथिल सरकारी निगरानी के मिले-जुले असर को जिम्मेदार बताया था। फेडरल रिजर्व की रिपोर्ट के मुताबिक बैंक के नियमन एवं निगरानी से जुड़ी चूक के चलते यह बैंक डूब गया। इसका सबसे नकारात्मक पहलू यह रहा कि समूची अमेरिकी बैंकिंग प्रणाली के प्रति ग्राहकों में अविश्वास पैदा हो गया। कालांतर में इसका परिणाम यह हुआ कि सिग्नेचर और फर्स्ट बैंक के डूबने की खबरें सामने आईं।  
 
क्या कहते हैं विशेषज्ञ : संयुक्त राष्ट्र में पॉलिसी अधिकारी सिद्धार्थ राजहंस वेबदुनिया से बातचीत में कहते हैं कि अमेरिका में ताजा बैंकिंग फेल्योर की शुरुआत सिलिकॉन वैली बैंक से हुई थी। यह बैंक मेजर टेक कंपनियों को लंबे समय से फंड देते आ रही हैं। डॉटकॉम बबल के दौरान हर स्टार्ट अप के लिए फंडिंग बैंकों द्वारा की जाने लगी। ज्यादातर पैसा यहीं आकर फंस गया। इसी दौरान इकोनॉमिक स्लोडाउन का भी सामना करना पड़ा। इसके चलते टेक इंडस्ट्री में लेऑफ्स काफी हुए। ट्‍विटर, गूगल, मेटा, अमेजॉन भी इससे अछूते नहीं रहे। 
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बैंकों का संकट उस समय और बढ़ गया जब लोगों ने पैसा निकालना शुरू कर दिया। एसवीबी के जमाकर्ताओं ने एक दिन में ही 42 अरब डॉलर (भारतीय मुद्रा में करीब 3.48 करोड़) निकाल लिए। सिग्नेचर बैंक की हालत भी कुछ ऐसी ही रही। इस बैंक का डिपॉजिट भी एक साल में करीब 17 अरब डॉलर घट गया। फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज में बढ़ोतरी ने कोढ़ में खाज का किया।
 
राजहंस कहते हैं कि 2008 की आर्थिक मंदी के समय स्टार्ट अप लैंडिंग इंडस्ट्री इतनी बड़ी नहीं थी, लेकिन 2011 से 2020 के बीच जब लोगों के हाथ में स्मार्ट फोन आए। फिर ऐप्स आए। इस तरह के ऐप्स सिलिकॉन वैली के स्टार्टअप बनाते थे। इसके चलते स्टार्टअप में फंडिंग बढ़ गई। इसका एक और असर यह हुआ कि एसवीबी, सिग्नेचर बैंक, क्रेडिट सुईस बैंक आदि स्टार्टअप में इक्विटी लेकर लैंडिंग के बिजनेस में उतर गए। इस दौर में वही बैंक सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ जो स्टार्टअप्स का सबसे बड़ा लैंडिंग पार्टनर था। यही सबसे बड़ा कारण था जिसके चलते हम बैंकिंग सिस्टम का कोलेप्स देख रहे हैं। सिद्धार्थ कहते हैं कि फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर में बढ़ोतरी का भी बैंकों पर नकारात्मक असर पड़ा। इससे बैंकिंग सेक्टर पर पूरा लोड आ गया।  
 
राजहंस कहते हैं कि फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दर में बढ़ोतरी का भी बैंकों पर नकारात्मक असर पड़ा। ब्याज दर बढ़ने से बैंकिंग सेक्टर पर पूरा लोड आ गया। लेहमन ब्रदर्स के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा फाइनेंशियल कोलेप्स है। 1.8 बिलियन डॉलर का टैक्स लॉस एसवीबी ने रजिस्टर किया है। हालांकि सरकार चाहती तो इस स्थिति को संभाल सकती थी। अत: सरकार भी इसके लिए काफी हद तक जिम्मेदार है।  
 
क्या था लेहमन ब्रदर्स का मामला : 15 सितंबर 2008 की सुबह लेहमन ब्रदर्स (lehman brothers crisis) के दिवालिया होने की खबर से न सिर्फ अमेरिका बल्कि पूरी दुनिया में हड़कंप मच गया था। लेहमन ब्रदर्स के दिवालिया घोषित होने से पूरी दुनिया को वित्तीय बाजार हिल गए। दु‍निया भर के शेयर सूचकांक गोते लगा रहे थे। कई शेयर बाजारों में तो बतौर सावधानी कारोबार बंद कर दिया गया। भारत का सेंसेक्स भी उस समय 3.35 फीसदी गिरकर बंद हुआ था। सबसे ज्यादा असर बैंकिंग सेक्टर के शेयरों पर हुआ था। इसके बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका ज्यादा असर नहीं पड़ा था।  
 
भारत पर क्या होगा असर : फाइनेंशियल एक्सपर्ट और फिनेस्ट्रोसाइकल्स के फाउंडर नितिन भंडारी ने कहा कि दिवालिया होना किसी भी परिपेक्ष्य में अच्छा नहीं होगा। आम लोगों का इसमें पैसा लगा होता है। हालांकि बड़े परिपेक्ष्य में देखें तो जो बैंक डूबी उसका साइज ही तय करता है कि उस देश की इकोनॉमी पर इसका क्या असर होगा। जो बैंक डूबी 2022 में उसकी नेटवर्थ करीब 1 ट्रिलियन डॉलर जबकि अमेरिका की अर्थव्यवस्था 26.85 ट्रिलियन डॉलर है। अत: भारत तो दूर अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी इसका ज्यादा असर नहीं होगा।
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भंडारी ने कहा कि जब भी कोई बैंक डूबती है तो इसका असर उस सेक्टर की साख पर पड़ता है। बैंक के डूबने पर पूरा बैंकिंग सिस्टम शक के घेरे में आता है। ऐसे में यह आम निवेशकों के लिए यह वार्निंग सिग्नल का काम करता है। लोग इस बात की समीक्षा करते हैं कि उस सेक्टर में उनका कितना निवेश है। इस वजह से दुनिया में जब भी कोई बैंक डूबती है तो भारतीय शेयर बाजार पर इसका असर पड़ता है और बैंकिंग सेक्टर के शेयरों में गिरावट आती है।
 
भारत कभी नहीं करेगा इस तरह की गलतियां : अमेरिका में बैंकों के डूबने के बीच भारत के दिग्गज बैंकर एन. वाघुल ने हाल ही में कहा था कि बड़े कॉरपोरेट या उद्योग समूहों को भारत में कभी भी बैंक खोलने की अनुमति नहीं दी जाएगी। उन्होंने कहा कि वाघुल ने कहा कि भारत ने अपने बैंकों के राष्ट्रीयकरण के अनुभव से सीखा है और वह बड़ी कंपनियों को बैंकिंग में प्रवेश की इजाजत देकर वही गलतियां कभी नहीं दोहराएगा।
 
हालांकि रिजर्व बैंक ने दो साल पहले एक परिचर्चा पत्र में बड़ी कंपनियों को पूंजी हासिल करने की उनकी क्षमता के आधार पर अनुमति देने की बात आगे बढ़ाई थी। लेकिन, आरबीआई के पूर्व शीर्ष अधिकारियों सहित कई लोगों ने आलोचना की और बात आगे नहीं बढ़ पाई। वाघुल के मुताबिक आर्थिक वृद्धि के लिए जरूरी पूंजी जनता से आएगी, जो पेशेवर रूप से चलाए जाने वाले बैंक में निवेश करने की इच्छुक है। औद्योगिक घराने ‘बैंक नहीं हो सकते’ और बैंकों के राष्ट्रीयकरण को सबने पसंद किया था।
 
हालांकि बैंकों के डूबने के अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर ज्यादा असर नहीं हुआ, लेकिन बैंकिंग सेक्टर को जरूर नुकसान पहुंचा है। ग्राहकों का बैंकों के प्रति विश्वास डगमगाया है। फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता है कि बैंकों का यह संकट टल गया है। कोई और बैंक भी इस सूची में शामिल हो सकता है। 

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