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ध्यान की एकमात्र चमत्कारिक विधि, संन्यासी हैं तो सिद्ध और संसारी हैं तो सफल हो जाएंगे

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अनिरुद्ध जोशी

अष्टांग योग का 7वां अंग है ध्यान। दरअसल, ध्यान 7वीं सीढ़ी है। योग में ध्यान 7वीं स्टेप है। लेकिन वर्तमान में कुछ संस्थान ऐसे हैं, जो व्यक्ति को डायरेक्ट ध्यान लगाने या सिखाने का कार्य करते हैं। उन्होंने अपनी अलग ध्यान विधियां विकसित करके उसकी मार्केटिंग कर रखी है। खैर...

 
ज्ञान चक्षु खोलें-
दरअसल, योग और भारतीय दर्शन के अनुसार ध्यान के पूर्व यम, नियम, आसन, प्राणायाम का पालन किया जाना चाहिए तभी ध्यान लगने लगता है या कहें कि तभी ध्यान घटित होने लगता है। अब यदि किसी व्यक्ति ने पहली, दूसरी, तीसरी कक्षा का कोर्स पढ़ा ही  नहीं है और उसे डायरेक्ट 7वीं की कक्षा में बैठा दिया है तो निश्चित ही यदि वह जीनियस होगा तो परीक्षा पास कर लेगा। यहां पर उन्हीं जीनियसों के लिए प्रस्तुत है ध्यान की वह चमत्कारिक विधि जिसके लिए ही सभी तरह के उपक्रम, योग या ध्यान किए जाते हैं।
 
 
मतलब यह कि आप कैसा भी योग करें, ध्यान की कोई सी भी विधि अपना लें लेकिन आपको पहुंचना तो यहीं इसी विधि पर ही है जिसके बारे में नीचे लिखा जा रहा है। आपको यह जानकर आश्‍चर्य नहीं होना चाहिए कि योगा, प्राणायाम आदि सभी आपके शरीर, मन और बुद्धि की तंद्रा तोड़ने के लिए ही हैं। तंद्रा तो आप समझते ही होंगे। जागा हुआ आदमी भी नींद में ही रहता है। यह नींद आपके खयालों, विचारों, कल्पनाओं, भावनाओं, खुशियों और चिंताओं की होती है। जैसे रात में सपने चलते हैं, वैसे ही दिन में खयाल चलते हैं।
 
 
तैयारी कैसे करें?
1. पहले आपको यह जानना जरूरी है कि क्या आप ऐसा भोजन करते हैं, जो आपके शरीर में आलस्य भरता है, पेट खराब करता है, मस्तिष्क को भारी करता है या किसी भी प्रकार से अस्वस्थ करता है? यदि ऐसा है तो आपको अपनी डाइट बदलना होगी। नियम से ही भोजन करना होगा, क्योंकि इस ध्यान विधि में शरीर का भारीपन हटाना जरूरी है। भोजन में मात्रा जानना जरूरी है।
 
2. दूसरा आपको यह जानना चाहिए कि आप कितनी फालतू की बातें करते और कितनी फालतू की बातें सोचते रहते हैं। इस पर ध्यान देना ही इस ध्यान की शुरुआत है। आप यह तय करें कि क्या मैं जो सोच रहा हूं, उससे मेरा कितना नुकसान हो रहा है? और मैं क्यों लगातार एक ही तरह की बातें सोचता या बोलता रहता हूं? कहते हैं कि पागलपन मन में रहता है, तो मौन होने से ही मन की मौत हो जाती है।
 
 
मतलब यह कि तन और मन को साधने से ही इस विधि को आप अच्छे से सरलता से या कहें कि आसानी से कर सकते हैं। नहीं साधते हैं तो भी आप कर सकते हैं लेकिन फिर इसके लिए आपको बहुत ही सजग रहना होगा, जो कि किसी जीनियस के बस की ही बात है।
 
अब जानें ध्यान विधि:
दरअसल, यह विधि नहीं है। यह बस खुद और दुनिया को देखने की एक शुद्ध प्रक्रिया है जिसमें किसी भी प्रकार की मिलावट नहीं है, बीच में कोई दीवार नहीं है। जैसे यदि हम किसी व्यक्ति को देख रहे होते हैं, तो हम उस वक्त उसके बारे में सोच भी रहे होते हैं और उसी वक्त हम खयाल भी कर रहे होते हैं।
 
 
देखने की इस शुद्ध प्रक्रिया या विधि को कहते हैं साक्षी भाव या दृष्टा भाव में रहना अर्थात देखना ही सबकुछ हो। देखने के दौरान सोचना बिलकुल नहीं। यह ध्यान विधि आप कभी भी, कहीं भी कर सकते हैं। सड़क पर चलते हुए इसका प्रयोग अच्छे से किया जा सकता है।
 
आप इस विधि की शुरुआत में अपनी श्वास को देखना और उसके प्रति सजग रहना प्रारंभ करें। देखने का अर्थ उसके आवागमन को महसूस करना। अपनी आती-जाती श्वास के प्रति साक्षीभाव। उसके बाद आप धीरे-धीरे भीतर से मौन रहकर देखने और सुनने का अभ्यास करें।
 
 
देखें और महसूस करें कि आपके मस्तिष्क में 'विचार और भाव' किसी छत्ते पर भिनभिना रही मधुमक्खी की तरह हैं जिन्हें हटाकर 'मधु' का मजा लिया जा सकता है। प्रारंभ में विधि के लिए सुबह और शाम के सुहाने वातावरण का उपयोग करें।

जिस दिन आपका देखना और सुना ही रह जाएगा, उस दिन आपके भीतर से सपने भी मिट जाएंगे। सचमुच तब आप नींद को देखेंगे, जहां सभी तरह की सिद्धि और सफलता छिपी हुई है। इससे ही योगनिद्रा कहते हैं। बौद्ध धर्म में असुत्ता मुनि कहते हैं और गीता में स्थितप्रज्ञ।

 

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