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ओशो रजनीश क्यों चाहते हैं कि रावण को मिले उचित सम्मान?

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ओशो

सोमवार, 7 अक्टूबर 2019 (12:48 IST)
छठवां प्रश्न : ओशो, कहा जाता है कि रावण भी ब्रह्मज्ञानी था। क्या रावण भी रावण उसकी मर्जी से नहीं था? क्या रामलीला सच में ही राम की लीला थी?

 
ओशो- निश्चित ही, रावण ब्रह्मज्ञानी था और रावण के साथ बहुत अनाचार हुआ है और दक्षिण में जो आज रावण के प्रति फिर से समादर का भाव पैदा हो रहा है, वह अगर ठीक रास्ता ले ले तो अतीत में हमने जो भूल की है, उसका सुधार हो सकता है। लेकिन वह भी गलत रास्ता लेता मालूम पड़ रहा है दक्षिण का आंदोलन। वे रावण को तो आदर देना शुरू कर रहे हैं, राम को अनादर देना शुरू कर रहे हैं। आदमी की मूढ़ता का अंत नहीं है, वह अतियों पर डोलता है। वह कभी संतुलित तो हो ही नहीं सकता। यहां तुम रावण को जलाते रहे हो, वहां अब उन्होंने राम को जलाना शुरू किया है। तुमने एक भूल की थी, अब वे दूसरी भूल कर रहे हैं।
 
रावण ब्रह्मज्ञानी था। यह भी परमात्मा की मर्जी थी कि वह यह पार्ट अदा करे। उसने यह भली तरह अदा किया। और कहते हैं, जब राम के बाण से वह मरा तो उसने कहा कि मेरी जन्मों-जन्मों की आकांक्षा पूरी हुई कि राम के हाथों मारा जाऊं, इससे बड़ी और कोई आकांक्षा हो भी नहीं सकती, क्योंकि जो राम के हाथ मारा गया, वह सीधा मोक्ष चला जाता है।
 
गुरु के हाथ जो मारा गया, वह और कहां जाएगा? और जैसे पांडवों को कहा है कृष्ण ने कि मरते हुए भीष्म से जाकर धर्म की शिक्षा ले लो, वैसे ही राम ने लक्ष्मण को भेजा है रावण के पास कि वह मर न जाए, वह परम ज्ञानी है; उससे कुछ ज्ञान के सूत्र ले आ। उस बहती गंगा से थोड़ा तू भी पानी पी ले। लेकिन कठिनाई क्या है? कठिनाई हमारी यह है कि हमारी समझ चुनाव की है। अगर हम राम को चुनते हैं, तो रावण दुश्मन हो गया। अगर हम रावण को चुनते हैं, तो राम दुश्मन हो गए। और दोनों को तो हम चुन नहीं सकते, क्योंकि हमको लगता है, दोनों तो बड़े विरोधी हैं, इनको हम कैसे चुनें!
 
और जो दोनों को चुन ले, वही रामलीला का सार समझा, क्योंकि रामलीला अकेली राम की लीला नहीं है, रावण के बिना हो भी नहीं सकती। थोड़ा रावण को हटा लो रामलीला से, फिर रामलीला बिलकुल ठप हो जाएगी, वहीं गिर जाएगी। सब सहारे उखड़ जाएंगे। राम खड़े न हो सकेंगे बिना रावण के। राम को रावण का सहारा है। प्रकाश हो नहीं सकता बिना अंधेरे के। अंधेरा प्रकाश को बड़ा सहारा है। जीवन हो नहीं सकता बिना मृत्यु के। मृत्यु के हाथों पर ही जीवन टिका है। जीवन विपरीत में से चल रहा है।
 
राम और रावण, मृत्यु और जीवन, दोनों विरोध वस्तुत: विरोधी नहीं हैं, सहयोगी हैं। और जिसने ऐसा देखा, उसी ने समझा कि रामलीला का अर्थ क्या है। तब विरोध नाटक रह जाता है। तब भीतर कोई वैमनस्य नहीं है। न तो राम के मन में कोई वैमनस्य है, न रावण के मन में कोई वैमनस्य है। और इसीलिए तो हमने इस कथा को धार्मिक कहा है। अगर वैमनस्य हो तो कथा नहीं रही, इतिहास हो गया।
 
इस फर्क को भी ठीक से समझ लो। पुराण और इतिहास का यही फर्क है। इतिहास साधारण आदमियों की जीवन घटनाएं हैं। वहां संघर्ष है, विरोध है, वैमनस्य है, दुश्मनी है। पुराण! पुराण नाटक है, लीला है। वहां वास्तविक नहीं है वैमनस्य; दिखावा है, खेल है। जो मिला है अभिनय, उसे पूरा करना है।
 
कथा यह है कि वाल्मीकि ने राम के होने के पहले ही रामायण लिखी। अब जब लिख ही दी थी, तो फिर राम को पूरा करना पड़ा। कर भी क्या सकते थे। जब वाल्मीकि जैसा आदमी लिख दे, तो तुम करोगे क्या! फिर उसको पूरा करना ही पड़ा। यह बड़ी मीठी बात है। दृष्टा कह देते हैं, फिर उसे पूरा करना पड़ता है। इसका अर्थ कुल इतना ही है, जैसे कि नाटक की कथा तो पहले ही लिखी होती है, फिर कथा को पूरा करते हैं नाटक में। नाटक में कथा पैदा नहीं होती। कथा पहले पैदा होती है, फिर कथा के अनुसार नाटक चलता है। क्या किसको कहना है, सब तय होता है। जीवन का सारा खेल तय है। क्या होना है, तय है। तुम नाहक ही अपना बोझ उठाए चल रहे हो। अगर तुम समझ लो कि सिर्फ नाटक है जीवन, तो तुम्हारा जीवन रामलीला हो गया, तुम पुराण-पुरुष हो गए, फिर तुम्हारा इतिहास से कोई नाता न रहा। फिर तुम इस भ्रांति में नहीं हो कि तुम कर रहे हो। फिर तुम जानते हो कि जो उसने कहा है, हो रहा है। हम उसकी मर्जी पूरी कर रहे हैं। अगर वह रावण बनने को कहे, तो ठीक।
 
रावण को तुम मार तो नहीं डालते! जो आदमी रावण का पार्ट करता है रामलीला में, उसको तुम मार तो नहीं डालते कि इसने रावण का पार्ट किया है, इसको मार डालो। जैसे ही मंच के बाहर आया, बात खत्म हो गई। अगर उसने पार्ट अच्छा किया, तो उसे भी तगमे देते हो।
 
असली सवाल पार्ट अच्छा करने का है। राम का हो कि रावण का, यह बात अर्थपूर्ण नहीं है। ढंग से पूरा किया जाए, कुशलता से पूरा किया जाए। अभिनय पूरा-पूरा हो, तो तुम पुराण-पुरुष हो गए। लड़ो बिना वैमनस्य के, संघर्ष करो बिना किसी अपने मन के; जहां जीवन ले जाए बहो। तब तुम्हारे जीवन में लीला आ गई। लीला आते ही निर्भार हो जाता है मन। लीला आते ही चित्त की सब उलझनें कट जाती हैं। जब खेल ही है, तो चिंता क्या रही! फिर एक सपना हो जाता है।
 
इसी अर्थ में हमने संसार को माया कहा है। माया का अर्थ इतना ही है कि तुम माया की तरह इसे लेना। अगर तुम इसे माया की तरह ले सको, तो भीतर तुम ब्रह्म को खोज लोगे। अगर तुमने इसे सत्य की तरह लिया, तो तुम भीतर के ब्रह्म को गंवा दोगे।
 
-ओशो (गीता दर्शन : भाग-8, प्रवचन- 211/06)

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