America Israel Iran War: यह चुप्पी बहुत शोर मचा रही है। लेकिन, अब यह सवाल सिर्फ़ वॉशिंगटन या तेहरान तक सीमित नहीं है। यह सवाल नई दिल्ली से भी पूछा जा रहा है—कि जब वैश्विक व्यवस्था बार-बार सैन्य ताक़त के आगे झुकती दिख रही है, तब दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र किस ओर खड़ा है।
डोनाल्ड ट्रंप के दौर से शुरू हुई आक्रामक राष्ट्रवादी विदेश नीति ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नया पैटर्न स्थापित किया—पहले आर्थिक प्रतिबंध, फिर राजनीतिक दबाव, और अंततः सैन्य कार्रवाई। वेनेज़ुएला, ग़ाज़ा और अब ईरान—हर मोर्चे पर एक ही प्रश्न गूंजता है: क्या ताक़तवर देश अब अंतरराष्ट्रीय क़ानून और जवाबदेही से ऊपर हो चुके हैं?
यह सवाल केवल अमेरिका की भूमिका तक सीमित नहीं है। असल परीक्षा उन देशों की है, जो स्वयं को लोकतंत्र, नैतिकता और वैश्विक नेतृत्व का प्रतीक मानते हैं।
भारत : नैतिक परंपरा से रणनीतिक मौन तक
भारत की विदेश नीति की एक ऐतिहासिक पहचान रही है—संप्रभुता का सम्मान, युद्ध का विरोध और संवाद पर भरोसा। गुटनिरपेक्ष आंदोलन से लेकर संयुक्त राष्ट्र तक, भारत ने अक्सर सैन्य हस्तक्षेप के बजाय कूटनीति की वकालत की है। 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का यह कथन आज भी प्रासंगिक लगता है— “इराक पर हमला अमेरिका की सबसे बड़ी भूल थी।”
यह सिर्फ़ एक बयान नहीं था, बल्कि भारत की नैतिक स्थिति का स्पष्ट ऐलान था कि वैश्विक व्यवस्था ताक़त से नहीं, क़ानून और सहमति से चलनी चाहिए। लेकिन आज तस्वीर बदली हुई है। वेनेज़ुएला, ग़ाज़ा और ईरान जैसे मामलों पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की सार्वजनिक चुप्पी कई सवाल खड़े करती है।
क्या भारत मौन कूटनीति की राह पर है?
सरकार के समर्थक इस चुप्पी को रणनीतिक विवेक बताते हैं। उनका तर्क है कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देनी होती है—अमेरिका के साथ रिश्ते अहम हैं, पश्चिम एशिया में संतुलन ज़रूरी है और वैश्विक ध्रुवीकरण के दौर में हर मुद्दे पर खुलकर बोलना व्यावहारिक नहीं। लेकिन सवाल यह है कि क्या रणनीतिक साझेदारी नैतिक स्पष्टता का विकल्प हो सकती है?
जब किसी संप्रभु देश पर हमला होता है, जब राष्ट्राध्यक्षों को खुले तौर पर निशाना बनाया जाता है, तब चुप रहना सिर्फ़ कूटनीतिक निर्णय नहीं रह जाता—वह एक वैचारिक संकेत भी बन जाता है। इतिहास गवाह है कि चुप्पी कभी विवेक होती है और कभी सहमति का रूप ले लेती है।
ग्लोबल साउथ का नेता या सिर्फ़ दर्शक?
भारत आज स्वयं को ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में प्रस्तुत करता है। G20 की अध्यक्षता से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक, भारत नेतृत्व की भूमिका का दावा करता है। लेकिन नेतृत्व केवल मंच साझा करने से नहीं आता। नेतृत्व का अर्थ है—
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ग़लत को ग़लत कहना
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ताक़त के दुरुपयोग पर सवाल उठाना
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और कमज़ोर देशों के पक्ष में खड़ा होना।
अगर भारत ऐसे क्षणों में खामोश रहता है, तो कल जब किसी छोटे या मध्यम देश पर हमला होगा, तब भारत की नैतिक अपील कितनी विश्वसनीय रह जाएगी?
आज ईरान, कल भारत का पड़ोस?
यह सवाल असहज करने वाला है, लेकिन ज़रूरी भी है। अगर यह मान लिया जाए कि ताक़तवर देश किसी भी सरकार को गिरा सकते हैं, किसी भी नेता को “ख़तरा” घोषित कर मार सकते हैं, तो यह सिद्धांत भविष्य में कहीं भी लागू हो सकता है—यहाँ तक कि भारत के पड़ोस में भी।
प्रधानमंत्री मोदी का न बोलना संभव है कि टकराव से दूरी की रणनीति हो। लेकिन इतिहास बताता है कि जब वैश्विक व्यवस्था टूटती है, तो सबसे ज़्यादा नुकसान उन देशों को होता है जो सही समय पर अपनी आवाज़ नहीं उठाते।
यह बहस अब विदेश नीति की तकनीकी भाषा से बाहर आ चुकी है। यह नैतिक साहस की परीक्षा है। क्योंकि इतिहास सिर्फ़ हमलावरों को नहीं, चुप रहने वालों को भी याद रखता है। राष्ट्रकवि दिनकर की कालजयी रचना की यह पंक्तियां सटीक बैठती हैं-
समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ हैं, समय लिखेगा उनका भी अपराध
आज सवाल सिर्फ़ यह नहीं है कि अगला नंबर किसका होगा। सवाल यह भी है कि जब दुनिया जल रही थी, तब विश्वगुरु बनने की आकांक्षा रखने वाला भारत कहां खड़ा था?