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औरंगजेब - सपनों के लिए चुकाई अपनों की कीमत

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औरंगजेब
औरंगजेब ने साम्राज्य हासिल करने के लिए उनको भी रास्ते से हटा दिया जो उसके अपने थे। कुछ लोग सपनों की खातिर अपनों को मारने में भी नहीं हिचकते तो कुछ लोगों के लिए अपनों की कीमत सपनों से ज्यादा होती है। इसी के इर्दगिर्द घूमती है यशराज फिल्म्स की ताजा फिल्म ‘औरंगजेब’ की कहानी। 

ये कहानी गुड़गांव में सेट है। कुछ वर्ष पहले ये भारत की राजधानी के निकट स्थित यह एक गांव था, लेकिन आज इसकी तस्वीर में जमीन-आसमान का अंतर आ गया है। इस कायाकल्प में बिल्डर, किसान, पुलिस, नेताओं ने अपने-अपने हित साधे और अपराध करने में भी उन्होंने संकोच नहीं किया। इसी को आधार बनाकर इस वर्ष की शुरुआत में विशाल भारद्वाज की ‘मटरू की बिजली का मंडोला’ भी रिलीज हुई थी। औरंगजेब में गुड़गांव को केन्द्र बनाकर दो परिवारों की कहानियों को भी दिखाया गया है।

रियल एस्टेट का माफिया यशवर्धन सिंह (जैकी श्रॉफ) का साम्राज्य ढहाने के लिए डीसीपी रविकांत (ऋषि कपूर) पुलिस के भेष में अपराध करने से भी नहीं हिचकता। इस काम में वह विशाल (अर्जुन कपूर) की मदद लेता है, जो यशवर्धन का ही बेटा है, लेकिन यशवर्धन की निगाह में विशाल मर चुका है। विशाल की शक्ल अपने जुड़वां भाई अजय (अर्जुन कपूर) से मिलती है जो यशवर्धन के साथ रहता है। अजय की जगह विशाल को रविकांत फिट कर देता है ताकि यशवर्धन के काले कारनामे उस तक पहुंचे। विशाल का भी एक अतीत है जिसके तार रविकांत से जुड़े हैं। इस मूल कहानी में कई सब-प्लाट हैं, जो कही ना कही आपस में जुड़े हुए हैं।

औरंगजेब की कहानी अच्छी है, लेकिन स्क्रीनप्ले में सफाई नहीं है। इंटरवल तक फिल्म ठीक है, लेकिन इसके बाद कहानी को ठीक तरह से समेटा नहीं गया है। ढेर सारे किरदार और प्रसंगों के कारण ड्रामा बेहद कन्फ्यूजिंग हो गया है। किरदार क्या चाहते हैं, क्या उनके प्लान हैं, ये इतने जटिल हो गए हैं कि ड्रामे का मजा दर्शक नहीं ले पाते हैं।

 
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साथ ही स्क्रीनप्ले राइटर्स ने अपनी सहूलियत का बहुत ध्यान रखा है। विशाल का अचानक रंग बदल कर अपने पिता की तरफ हो जाना, विशाल का अजय की गर्लफ्रेंड के सामने ये भेद खोल देना ‍की वह अजय नहीं है या फिर अजय का आर्या की तरफ झुकाव होने के पीछे कोई ठोस कारण नहीं दिए गए हैं। इससे ड्रामा बेहद कमजोर हो जाता है।

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इस ड्रामे में जो त्रीवता और रोमांच चाहिए था, वो पूरी तरह उभर कर सामने नहीं आता, जबकि कलाकारों के शानदार अभिनय का पूरा साथ मिला है, इसका दोष कुछ हद तक निर्देशक अतुल सभरवाल को भी दिया जा सकता है, जिन्होंने ढेर सारी चीज दिखाने के मोह में फिल्म को बेवजह उलझा दिया। यही कारण है कि फिल्म ठहरी हुई और लंबी लगती है।

फिल्म के संवाद कुछ जगह अच्छे हैं। जहां तक संगीत का सवाल है तो संगीतकार अमर्त्य राहुत और विपिन मिश्रा बुरी तरह निराश करते हैं। फिल्म का संपादन भी ढीला है।

अर्जुन कपूर ने डबल रोल निभाए हैं, लेकिन वे दोनों में अंतर पैदा नहीं पर पाए हैं। अजय के रूप में अच्छे लगते हैं, लेकिन विशाल को भी उन्होंने ज्यादातर अजय जैसा ही निभाया है। साशा आगा दिखने में औसत हैं और एक्टिंग करना बिलकुल नहीं जानती। फिल्म में कई सीनियर कलाकारों की भीड़ है, जिसमें से ऋषि कपूर का अभिनय सबसे बेहतर है। एक भ्रष्ट पुलिस ऑफिसर, जो पॉवर और पैसा हासिल करने के लिए अपने दामाद को गोली मारने में भी नहीं हिचकिचाता, के रोल में ऋषि ने कमाल किया है।

दक्षिण भारतीय स्टार पृथ्वीराज ने अपना काम पूरी गंभीरता से किया है। जैकी श्रॉफ, अमृता सिंह, दीप्ति नवल, अनुपम खेर, तन्वी आजमी, स्वरा भास्कर, में से कुछ को ज्यादा स्कोप नहीं मिला है, इसके बावजूद वे अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

पैसा, पॉवर, लालच, अपराध, षड्यंत्र के इस ड्रामे में वो पकड़ नहीं है जो दर्शकों को बांध सके।

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बैनर : यशराज फिल्म्स
निर्माता : आदित्य चोपड़ा
निर्देशक : अतुल सभरवाल
संगीत : अमर्त्य राहुत, विपिन मिश्रा
कलाकार : अर्जुन कपूर, साशा आगा, पृथ्वीराज, ऋषि कपूर, जैकी श्रॉफ, अमृता सिंह, दीप्ति नवल, तन्वी आजमी, स्वरा भास्कर, अनुपम खेर
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 19 मिनट 52 सेकंड
रेटिंग : 2/5

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