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स्‍वच्‍छ इंदौर के सिस्‍टम ने ली 2 बेगुनाहों की बलि, क्‍या है सीवरेज सफाई पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन, मौत पर कितना मुआवजा?

पहले जहरीले पानी से 30 मौतें, अब चैंबर की गैस ने ली 2 लोगों की जान, ये कैसा सिस्‍टम बना दिया हमने

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इंदौर—वह शहर जिसने स्वच्छता को एक जुनून बनाया, जिसने देशभर में अपनी सफाई का डंका बजाया। लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि इस चमकती हुई 'नंबर 1' रैंकिंग की कीमत कौन चुका रहा है? हाल ही भागीरथपुरा में जहरीले पानी से 30 से ज्‍यादा मौतों के बाद अब सीवरेज चैंबर की जहरीली गैस से दो और जिंदगियों का दम घुट गया। यह दिल को झकझोर देने वाली घटना है। यह सिर्फ एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारी व्यवस्था की विफलता और सामूहिक संवेदनहीनता का परिणाम है।

चमक के पीछे दर्दनाक अंधेरा : हम सड़कों पर झाड़ू लगाने और कचरा अलग करने में तो अव्वल आ गए, लेकिन जब बात उन इंसानों की गरिमा की आई जो इस गंदगी को जड़ से साफ करते हैं, तो हम आज भी आदिम युग में खड़े नजर आते हैं। आधुनिक मशीनों और रोबोटिक सफाई के दावों के बीच, किसी इंसान का सीवरेज चैंबर में उतरना और वहां से वापस न लौट पाना, शहर की साख पर एक गहरा दाग है। सवाल यह है कि क्या उन दो परिवारों के लिए इस 'नंबर 1' खिताब के कोई मायने हैं, जिन्होंने अपना कमाने वाला सदस्य खो दिया?
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व्यवस्था की लापरवाही या 'सिस्टम' का जहर : पहले शहर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से लोगों की जान गई और अब गैस का चैंबर काल बन गया। यह दर्शाता है कि स्वच्छता केवल ऊपरी दिखावे तक सीमित रह गई है।

क्‍या प्रशिक्षण और निगरानी की कमी : क्या उन कर्मचारियों को सुरक्षा उपकरण दिए गए थे? बिना किसी विशेषज्ञ की मौजूदगी के चैंबर क्यों खोला गया? हर बार हादसे के बाद जांच बैठती है, लेकिन क्या कभी किसी बड़े अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? इंदौर अपनी 'इंदौरियत' के लिए जाना जाता है, जहां लोग एक-दूसरे की मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं। लेकिन जब बात इन 'सफाई योद्धाओं' की सुरक्षा की आती है, तो पूरी मशीनरी मौन क्यों हो जाती है? हम तकनीक के दौर में जी रहे हैं, जहां स्मार्ट सिटी की बातें होती हैं, फिर भी हम एक इंसान को सुरक्षित तरीके से गटर साफ करने की सुविधा नहीं दे पा रहे हैं। स्वच्छता का अर्थ केवल कचरा मुक्त सड़कों से नहीं है, बल्कि एक ऐसे सुरक्षित तंत्र से है, जहां किसी को अपना पेट पालने के लिए मौत के कुएं में न उतरना पड़े। अगर इंदौर को वास्तव में 'नंबर 1' बने रहना है, तो उसे अपनी सड़कों के साथ-साथ अपनी कार्यप्रणाली और संवेदनशीलता को भी साफ करना होगा। वरना, यह चमक फीकी है और इन मासूमों का खून हमारी उपलब्धियों पर भारी पड़ेगा।
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क्‍या है सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन : बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने मेट्रो शहरों में चेंबर में उतरकर सफाई करने वाले सफाईकर्मियों के काम के लिए गाइडलाइन तय कर रखी है। सीवरेज और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतों पर सुप्रीम कोर्ट ने हमेशा कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट का स्पष्ट मानना है कि इंसानों को मौत के चेंबरों में नहीं धकेला जा सकता। अक्टूबर 2023 में जस्टिस एस. रविंद्र भट और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने इस संबंध में बेहद महत्वपूर्ण और विस्तृत गाइडलाइंस जारी की थी। जानते हैं क्‍या है नियम।
  • कर्मचारी के पास गैस मास्क, ऑक्सीजन सिलेंडर, और सुरक्षात्मक सूट हो।
  • मौके पर एम्बुलेंस और पर्याप्त चिकित्सा व्यवस्था मौजूद हो।
  • प्रशिक्षित पर्यवेक्षक (Supervisor) की उपस्थिति अनिवार्य है।
केंद्र और राज्य की जवाबदेही : कोर्ट ने आदेश दिया है कि सरकारें यह सुनिश्चित करें कि हाथ से सफाई करने की प्रथा पूरी तरह खत्म हो। इसके लिए:
  • सीवर लाइनों का आधुनिकीकरण किया जाए।
  • सफाई कर्मचारियों का उचित सर्वेक्षण और पुनर्वास हो।
  • उनके बच्चों की शिक्षा और परिवार के लिए कौशल विकास योजनाएं चलाई जाएं।
मुआवजे में बढ़ोतरी
सुप्रीम कोर्ट ने सीवर सफाई के दौरान होने वाली मौतों के मुआवजे को संशोधित किया है:
मौत होने पर : अब पीड़ित परिवार को 30 लाख रुपए का मुआवजा देना अनिवार्य है (पहले यह 10 लाख था)।
स्थायी विकलांगता पर : यदि कर्मचारी पूरी तरह विकलांग हो जाता है, तो उसे न्यूनतम 20 लाख रुपए दिए जाएंगे।
गंभीर चोट या अन्य विकलांगता पर : न्यूनतम 10 लाख रुपए की सहायता राशि।

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