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जुझारू होलकर शासिका कृष्णाबाई

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अपना इंदौर

होलकर शासन में देवी अहिल्याबाई के प्रशासन के क्षेत्र में अद्वितीय योगदान से हम सभी परिचित हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि विपरीत परिस्थितियों में उन्हें अपने ससुर द्वारा बाकायदा प्रशिक्षित कर राजकाज सौंपा गया था। किंतु हम सब इस बात से शायद ही परिचित हों कि 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में विशेष रूप से मालवा का इतिहास अंग्रेज-मराठा संघर्ष, सैनिक प्रतिद्वंद्विता तथा अराजकतापूर्ण वातावरण से ओतप्रोत था, क्योंकि 18वीं शताब्दी के अंतिम समय में होलकर महाराजा यशवंतराव प्रथम ने अंग्रेजों से अपनी वीरता और साहस कालोहा मनवाकर उन्हें परेशान कर दिया था।
 
उनकी मृत्यु के बाद अंग्रेज तो जैसे बदला लेने की नीयत से होलकर राज्य को तहस-नहस करने के लिए जुट गए थे लेकिन इसी समय होलकर राज्य को बचाने तथा प्रशासन के सुचारु संचालन के लिए जहां मंत्री तात्या जोग आगे आए वहीं महिला प्रशासिका के रूप में अहिल्याबाई के बाद कृष्णाबाई अपना नाम इतिहास के पन्नों पर अमर करने में सफल रहीं। वैसे कृष्णाबाई से पूर्व थोड़े समय के लिए तुलसाबाई ने भी प्रशासन संभाला था किंतु उनका कार्यकाल अस्थिरता तथा षड्‌यंत्रों के लिए प्रसिद्ध रहा तथा बहुत ही वीभत्स तरीके से तुलसाबाई का अंत भी किया गया।
 
कृष्णाबाई 1817 में हुए अंग्रेज-मराठा युद्ध (जो महिदपुर युद्ध के नाम से जाना जाता है) के पश्चात सक्रिय रूप से प्रशासन में आईं। इस युद्ध में होलकर सेना जहां बुरी तरह पराजित हुई, वहीं अंग्रेजों को विजय के साथ-साथ मालवा क्षेत्र में अपनी स्थिति को मजबूत करने तथा होलकर को कमजोर कर समाप्त करने का एक अच्छा अवसर मिला था। इस समय वे किसी भी दशा में यह अवसर गंवाने को तैयार नहीं थे। ऐसे समय में कृष्णाबाई ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ का परिचय देते हुए सर्वप्रथम तात्या जोग जैसे कुशल व्यक्ति का चुनाव कर उन्हें मंत्री पद प्रदान किया तथा होलकर पक्ष की ओर से संधि वार्ता हेतु अपना प्रतिनिधि बनाया। दूसरी तरफ उपस्थित संकट को समझने का प्रयास कर उससे निपटने में जुट गईं।
 
इस समय होलकरों को अंग्रेजों के साथ बहुत ही अपमानजनक शर्तों के साथ मंदसौर की संधि स्वीकार करना पड़ी। दूसरी ओर होलकर शासक तथा यशवंतराव प्रथम का उत्तराधिकारी मल्हारराव अल्पवयस्क था। प्रशासन नाम की कोई व्यवस्था इस राज्य में नहीं थी। आर्थिक दशा अत्यंत दयनीय थी। साथ ही सैनिक अक्षम, सुस्त तथा निष्क्रिय हो चुके थे।
 
ऐसे में पठानों के विद्रोह होना प्रारंभ हो चुके थे। अंग्रेजों ने भी संधि के माध्यम से अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप प्रारंभ कर दिया था। ऐसी परिस्थितियों में जब कृष्णाबाई प्रशासन संभालकर उसे सुचारु करने का प्रयास कर ही रही थीं कि थोड़े ही समय पश्चात मल्हारराव होलकर (द्वितीय) का क्षय रोग से अल्पायु में ही निधन हो गया। अब पुन: उत्तराधिकारी की समस्या उपस्थित हो गई, क्योंकि मल्हारराव नि:संतान थे।
 
तब कृष्णाबाई ने तत्कालीन अंग्रेज रेजीडेंट सर रॉबर्ट हेमिल्टन को विश्वास में लेकर भाऊ होलकर के छोटे पुत्र मल्हारराव को उत्तराधिकारी बनाने के लिए तैयार किया। इस प्रकार होलकर उत्तराधिकारी का चयन सर्वसम्मति से कराने में कृष्णाबाई सफल रहीं। साथ ही मल्हारराव का चयन आगे भविष्य में कृष्णाबाई का एक सही निर्णय साबित हुआ।
 
यही बालक बाद में तुकोजीराव द्वितीय के नाम से मालवा का शासक बना तथा मालवा क्षेत्र को आधुनिक सुविधाओं एवं सोच के अनुसार लेने तथा प्रत्येक क्षेत्र में आशातीत उन्नति के प्रतिफल प्रदान करने में सफल रहा, किंतु जब तक महाराजा अल्प वयस्क थे तब तक उन्हें प्रशासन संबंधी महत्वपूर्ण शिक्षा कृष्णाबाई द्वारा ही प्रदान की गई। राज्य के महत्वपूर्ण फैसलों में कृष्णाबाई की भूमिका महत्वपूर्ण रही। उन्होंने प्रशासन के कार्यों में अपनी दक्षता को साबित करते हुए एक अच्छी प्रबंधक होने का भी परिचय दिया। उनके समय में खासगी की उत्तम व्यवस्था थी।
 
अहिल्याबाई के पश्चात कृष्णाबाई अपने खासगी से दान पुण्य, धार्मिक कार्यों एवं निर्माण कार्यों के लिए सदैव प्रसिद्ध रहेंगी। उनके द्वारा किए गए निर्माण कार्यों में- महेश्वर में सुदंर छत्री का निर्माण, अहिल्येश्वर नामक शिवलिंग की स्थापना, काशी विश्वेश्वर देवालय का निर्माण तथा अपने पति की मृत्यु के पश्चात उनकी स्मृति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भानपुरा में छत्री का निर्माण कार्य प्रारंभ करना था। साथ ही गरीब, असहाय एवं दीन-दुखियों की सेवा एवं सहायता के लिए भी वे हमेशा तत्पर रहती थीं। कृष्णाबाई के समय में अहिल्याबाई को पूर्ण सम्मान देते हुए खासगी सील पर कुछ इस तरह अंकन किया गया था- 'श्री म्हालसाकांत चरणी तत्पर अहिल्याबाई कारकीर्य कृष्णाबाई होलकर।'
 
इस प्रकार कृष्णाबाई होलकर अपनी व्यक्तिगत योग्यता, प्रशासनिक प्रतिभा तथा लोक कल्याणकारी कार्यों द्वारा एक सेविका के निम्न पद से उठकर राजमाता के उच्च पद को सुशोभित करने में सफल रही थीं। कहा जाता है कि कृष्णाबाई कभी राजप्रसाद में सेविका के रूप में कार्यरत थीं जो एक गरीब परिवार से संबंधित थीं। महाराजा यशवंतराव ने इनके सौंदर्य पर मुग्ध होकर ही इन्हें राजाश्रय प्रदान किया था। तत्पश्चात वे केसरीबाई, केसरबाई तथा कृष्णाबाई एवं मां साहिबा के नाम से संबोधित की जाती रहीं।
 
राज्य में वे सामान्य जनता से लेकर उच्च पदस्थ अधिकारियों, कर्मचारियों एवं मंत्रियों के लिए भी श्रद्धा का केंद्र रहीं। अंग्रेज भी उन्हें उचित सम्मान देते थे तथा उनकी योग्यता को स्वीकारते थे। इंदौर में स्थित गोपाल मंदिर, कृष्णपुरा मोहल्ला तथा केसरबाग रोड उन्हीं की स्मृति में है, जो उनके द्वारा 31 वर्षों तक प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से किए गए दक्षतापूर्ण शासन की याद को ताजा बनाए हुए हैं। इस प्रकार होलकरों के राज्य प्रशासन को संक्रमण काल से निकालकर अंग्रेजों के चंगुल से बचाकर एक अच्छा प्रशासन देने के साथ-साथ भविष्य के लिए एक अच्छा उत्तराधिकारी देकर होलकर राज्य को पुन: दृढ़ता प्रदान करने वाली मां साहिबा कृष्णाबाई होलकर के सितंबर 1849 को हुए स्वर्गवास के पश्चात ही होलकरकालीन एक सुनहरे ऐतिहासिक काल का पटाक्षेप हुआ।

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