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गुरु पूर्णिमा : पानी पियो छानकर, गुरु बनाओ जानकर

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अनिरुद्ध जोशी

हिन्दू पंचांग के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा को आषाढ़ी और गुरु पूर्णिमा कहा जाता है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान तथा दान-पुण्य करने का महत्व बताया गया है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार 23 जुलाई 2021 शुक्रवार को पूर्णिमा तिथि प्रारंभ होगी और 24 जुलाई शनिवार को गुरु पूर्णिमा मनाई जाएगी। गुरु पूर्णिाम महर्षि वेद व्यासजी की जयंती की रूप में भी मनाई जाती है। आओ जानते हैं गुरु और शिष्य क्या होते हैं।
 
 
1. यह कहावत प्रचलित है कि पानी पियो छान कर गुरु बनाओ जानकर। मतलब यह कि यदि पानी खराब पी लिया तो उल्टी दस्त लग जाएंगे और आप बीमार भी पड़ सकते हो। इसी तरह यदि गुरु बगैर जाने परखे बना लिया तो आपकी पूरी जिंदगी ही बीमार पड़ जाएगा और इसका आपको पता भी नहीं चलेगा।
 
2. 'गु' शब्द का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' शब्द का अर्थ है प्रकाश ज्ञान। अज्ञान को नष्ट करने वाला जो ब्रह्म रूप प्रकाश है, वह गुरु है। इसीलिए गुरु का ब्रह्मज्ञानी होना जरूरी है। ब्रह्मज्ञानी के मुख पर तेज होता है। 
 
3. गुरु क्या है, कैसा है और कौन है यह जानने के लिए उनके शिष्यों को जानना जरूरी होता है और यह भी कि गुरु को जानने से शिष्यों को जाना जा सकता है, लेकिन ऐसा सिर्फ वही जान सकता है जो कि खुद गुरु है या शिष्य। गुरु वह है ‍जो जान-परखकर शिष्य को दीक्षा देता है और शिष्‍य भी वह है जो जान-परखकर गुरु बनाता है।
 
4. यह जानना जरूरी है कि आखिर में हम जिसे गुरु बना रहे हैं तो क्या उसके विचारों से, चमत्कारों से या कि उसके आसपास भक्तों की भीड़ से प्रभावित होकर उसे गुरु बना रहे हैं और कहीं ऐसा तो नहीं कि आप अपना व्यापारिक स्वार्थ साधने के लिए उसे गुरु बना रहे हैं। यदि ऐसा है तो आप सही मार्ग पर नहीं हैं। 
 
5. बहुत साधारण से लोग हमें गुरु नहीं लगते, क्योंकि वे तामझाम के साथ हमारे सामने प्रस्तुत नहीं होते हैं। वे ग्लैमर की दुनिया में नहीं है और वे तुम्हारे जैसे तर्कशील भी नहीं है। वे बहस करना तो कतई नहीं जानते। तुम जब तक उसे तर्क या स्वार्थ की कसौटी पर कस नहीं लेते तब तक उसे गुरु बनाते भी नहीं। लेकिन अधिकांश ऐसे हैं जो अंधे भक्त हैं, तो स्वाभाविक ही है कि उनके गुरु भी अंधे ही होंगे। मान जा सकता है कि वर्तमान में तो अंधे गुरुओं की जमात है, जो ज्यादा से ज्यादा भक्त बटोरने में लगी है। भागवत कथा बांचने वाला या चार वेद या फिर चार किताब पढ़कर प्रवचन देने वाला गुरु नहीं होता। किताब, चूरण, ऑडियो-वीडियो कैसेट, माला या ध्यान बेचने की नौकरी देने वाला भी गुरु नहीं होता।
 
 
6. आजकल तो कोई भी व्यक्ति किसी को भी गुरु बनाकर उसकी घर में बड़ीसी फोटो लगाकर पूजा करने लगा है और ऐसा वह इसलिये करता है क्योंकि वह भी उसी गुरु की तरह गुरु घंटाल होता है। कथावाचक भी गुरु है और दुष्कर्मी भी गुरु हैं। आश्रम के नाम पर भूमि हथियाने वाले भी गुरु हैं और मीठे-मीठे प्रवचन देकर भी गुरु बन जाते हैं। इनके धनबल, प्रवचन और शिष्यों की संख्या देखकर हर कोई इनका शिष्य बनना चाहेगा क्योंकि सभी के आर्थिक लाभ जुड़े हुए हैं।
 
 
7. ओशो रजनीश कहते हैं गुरु की खोज बहुत मुश्किल होती है। गुरु भी शिष्य को खोजता रहता है। बहुत मौके ऐसे होते हैं कि गुरु हमारे आसपास ही होता है, लेकिन हम उसे ढूंढ़ते हैं किसी मठ में, आश्रम में, जंगल में या किसी भव्य प्रेस कांफ्रेंस में या प्रवचनों के तामझाम में।
 
8. कुछ लोग कहते हैं कि शास्त्रों अनुसार और गुरु-शिष्य की परंपरा अनुसार पता चलता है कि गुरु वह होता है जो आपकी नींद तोड़ दे और आपको मोक्ष के मार्ग पर किसी भी तरह धकेल दे। हालांकि कहा जा सकता है कि जो भी जिस भी प्रकार की शिक्षा दे वह सभी गुरु ही होते हैं। गुरु द्रोण ने धनुष विद्या की शिक्षा दी, तो क्या वे गुरु नहीं थे? क्या जो सिर्फ मोक्ष का मार्ग ही दिखाए वहीं गुरु होते हैं, जो डॉट नेट‍, डॉक्टरी या इंजीनियरिंग सिखाए वे गुरु नहीं होते?
 
 
9. वैसे तो हमारे जीवन में कई जाने-अनजाने गुरु होते हैं जिनमें हमारे माता-पिता का स्थान सर्वोपरि है फिर शिक्षक और अन्य। लेकिन असल में गुरु का संबंध शिष्य से होता है न कि विद्यार्थी से। आश्रमों में गुरु-शिष्य परम्परा का निर्वाह होता रहा है।
 
10. जैन धर्म में कहा गया है कि साधु होना सिद्धों या अरिहंतों की पहली सीढ़ी है। अभी आप साधु ही नहीं हैं और गुरु बनकर दीक्षा देने लगे तो फिर सोचो ये कैसे गुरु। कबीर के एक दोहे की पंक्ति है- 'गुरु बिन ज्ञान ना होए मोरे साधु बाबा।' उक्त पंक्ति से ज्ञात होता है कि कबीर साहब कह रहे हैं किसी साधु से कि गुरु बिन ज्ञान नहीं होता।

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