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क्या PK को DP से प्‍यार हो जाएगा...! क्या यही है कोरोनाकाल का ‘न्‍यू नॉर्मल’?

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नवीन रांगियाल

एक अज्ञात वायरस का खौफ, जिसे कोरोना कहा गया, लॉकडाउन जिसमें चारों तरफ सन्‍नाटा है और सबकुछ बंद है, प्रवासी मजदूरों का मीलों का सफर और उनका दर्द और एक राज्‍य से दूसरे राज्‍य के लिए पलायन करती भीड़ जिसका कोई नाम नहीं था, कोई धर्म नहीं था।

इन सबके बीच दो जिंदगि‍यां हैं, जिनके नाम हैं... पीके और डीपी।

पीके अपनी जिंदगी की विडंबनाओं से परेशान है, वो अपने सपनों का पीछा कर रहा है, एक अनजान रेलवे स्‍टेशन पर उसे डीपी नाम की एक लड़की मिलती है। वो बहुत बुरे हालातों में फंस चुकी है, इसलिए वो उम्‍मीद करती है कि पीके उसकी मदद करेगा। लेकिन पीके उसे स्‍टेशन पर अकेला छोड़कर चला जाता है।

अब तक सबकुछ नॉर्मल था, जिंदगी अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी, लेकिन एक दिन सरकार की तरफ से एक घोषणा की जाती है कि ‘लॉकडाउन’ लगाया जा रहा है, जो जहां है वहीं रहे। इसके बाद अचानक सबकुछ बदल जाता है। पीके और डीपी की जिंदगी भी।

वरिष्‍ठ पत्रकार और फि‍ल्‍म समीक्षक समय ताम्रकर ने एक किताब लिखी है। नाम है ‘लॉकडाउन’। संभवत: लॉकडाउन पीरियड को पृष्‍ठभमि में रखकर लिखी गई यह पहली किताब है।

80 पृष्‍ठों की यह छोटी सी किताब बहुत खूबसूरत नजर आती है। कवर पेज और इसके ग्राफि‍क्‍स को देखकर लगता है कि शायद यह कोई कॉमिक्‍स या बच्‍चों के लिए लिखी कहानियों की कोई किताब होगी, लेकिन पढ़कर ही पता चलता है कि इसके भीतर पोस्‍ट कोरोना पीरियड के बहुत सारी उहापोह और दंश छि‍पे हुए हैं।

लॉकडाउन में डीपी किसी दूसरे अनजान शहर में फंस गई है और पीके नाम का लड़का उसकी मदद करता है। उसे 400 किमी दूर अपने घर पहुंचाने की जोखि‍म लेता है।

कार की सवारी से शुरू हुआ यह सफर किस तरह से ट्रैक्‍टर, बस से होता हुआ पैरों पर आ जाता है, यह पढ़ना दिलचस्‍प है।

सफर में पीके और डीपी की बातचीत और नौंकझोंक से बार-बार लगता है कि अब दोनों को प्‍यार हो जाएगा। लेकिन यह जरूरी नहीं कि साथ में सफर करने वाले हर लड़के-लड़की को एक दूसरे से प्‍यार हो ही जाए। तमाम तकलीफों और उनके बीच की गई मदद एक दोस्‍ती या किसी अनजान रिश्‍ते को भी जन्‍म दे सकती है। शायद लॉकडाउन के बाद की जिंदगी का यही न्‍यू नॉर्मल है।

बहुत सरल भाषा, एक लय और बैठक में पढ़ी जाने वाली इस किताब में कोई साहित्‍यि‍क बोझ नहीं है। बड़ों से लेकर बच्‍चों के लिए भी इसकी कहानी दिलचस्‍प हो सकती है।

लॉकडाउन में घर जाने के मिशन के बीच आए कई पड़ावों में प्‍यार में पड़ने की उम्‍मीद भी है, आशंका है, लालच है और कई जगहों पर परोपकार भी है। यानि‍ एक ही समय में कोई किसी की मदद कर रहा है तो कहीं बि‍ना मांगे ही परोपकार किया जा रहा है।
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किताब में एक ही वक्‍त में जिंदगी के कई एंगल्‍स नजर आते हैं।

सबसे ज्‍यादा मार्मि‍क लॉकडाउन में फंसे गरीब मजदूरों का पलायन है। जिसके दृश्‍य एक छोटी सी बच्‍ची की चलते रहने की वजह से हुई मौत के दृश्‍य में उभरकर आता है।

किताब की सबसे खास बात है कि वो लॉकडाउन के समय में से तो गुजरती है, लेकिन वो कहां से गुजर रही है इसका कोई पता नहीं है। इसमें किसी शहर का नाम नहीं है, किसी राज्‍य का नाम नहीं है। यह धर्म और जाति‍ से परे जाकर अपनी कहानी बयां करती है। इसमें टाइम तो है लेकिन स्‍पेस नहीं है।

हालांकि एक दृश्‍य में अहसास होता है कि मजदूरों की भीड़ मप्र के इंदौर से गुजर रही है, जहां लोग उनकी मदद कर रहे हैं।

किताब खरीदकर पढ़ी जा सकती है, अगर इसे किसी बस या ट्रेन में सफर करते हुए पढ़ी जाए तो शायद और अच्‍छा रहेगा, सफर में नहीं पढ़ेंगे तो भी लगेगा कि आप लॉकडाउन की यात्रा में हैं।

पोस्‍ट कोरोना में लगातार गि‍रती जीडीपी में सबसे अच्‍छी बात है किताब की कीमत। किसी रेस्‍त्रां में 39 रुपए में कॉफी भी नहीं मिलती, लेकिन यह किताब 39 रुपए की है, चालीस रुपए भी पूरे नहीं है। उसमें भी एक रुपया कम है।

किताब: लॉकडाउन
लेखक: समय ताम्रकर 
प्रकाशन: परंपरा प्रकाशन 
कवर: सारंग क्षीरसागर 
कीमत: 39 रुपए

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