उस काली रात में हवा में उड़ता जहर अंधाधुंध भागते पैर कटे वृक्ष की तरह गिरते लोग भीषण ठंड में सांसों में अंदर घुलता जहर। हर कोई नीलकंठ तो नहीं हो सकता जो निगल ले उस हलाहल को रोते-बिलखते बच्चे श्मशान बनती भोपाल की सड़कें बिखरे शव। और...