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ग़ज़ल : सब्र आ जाए इस उम्मीद में ठहर गया कोई

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- डॉ. रूपेश जैन 'राहत'
 
सब्र आ जाए इस उम्मीद में ठहर गया कोई
पास होकर भी कैसे बेख़बर गुजर गया कोई
 
नज़र कहां वो मुझको जो तलाश करती रही
सख्त राहों पे शायद ख्वाब बिखेर गया कोई
 
तिलिस्मी हो गए इशारे उनकी नज़र के अब
देखिए आके तमन्नाएं बर्बाद कर गया कोई
 
क्या क्या निकला कड़वाहट से भरी बातों में
आज सुनके इल्ज़ाम दिल से उतर गया कोई
 
शौक से बिठाई महफिल अन-मनी सी रही
मिरा ज़िक्र 'राहत' खैर चैन से घर गया कोई

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