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नवगीत: कांच हुए सब रिश्ते-नाते

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मानवीय रिश्तों पर कविता
कांच हुए सब रिश्ते-नाते,
मन भी टूट भरे।
 
भीतर-भीतर सन्नाटे अब,
मन में खटक रहे।
शहरों की इस भीड़ में रिश्ते,
खूंटी लटक रहे।
पास बैठ कर भी कोसों की,
दूरी पाल रहे।
आंखों की भाषा को पढ़ना,
हम सब टाल रहे।
संवेदन की सूखी क्यारी,
कोमल भाव मरे।
 
हाथों में मोबाइल थामे,
दुनिया साथ लिए।
पर घर के ही कमरे में हम,
खुद को बंद किए।
मुखड़ों पर झूठी मुस्कानें,
अश्रु भटक रहे।
रिश्ते अब तो आभासी हैं,
भ्रम में अटक रहे।
शब्द अर्थ सब बेगाने हैं
केवल तर्क धरे।
 
स्वारथ की आपाधापी में,
अपनापन खोया।
अहंकार का मरुथल फैला,
सरल हृदय रोया।
देख किसी की पीड़ा पर अब,
पत्थर हैं आंखें।
स्वप्न नहीं दिखते हैं इनमें,
मुरझाईं पांखें।
सजी हुई महफ़िल में भी हम,
बेबस सिसक भरे।
 
बाजारों का शोर-शराबा,
संवेदन बौने।
रिश्तों की इस टूट-फूट में,
वीराने कौने।
दिल मशीन से चलते हैं अब,
श्रम का अंत हुआ।
करे दिखावा जग में जो भी,
उतना संत हुआ।
बर्फ सरीखे ठंडे मन हैं,
भीतर धधक भरे।
 
सुशील शर्मा
 
(वेबदुनिया पर दिए किसी भी कंटेट के प्रकाशन के लिए लेखक/वेबदुनिया की अनुमति/स्वीकृति आवश्यक है, इसके बिना रचनाओं/लेखों का उपयोग वर्जित है...)
 

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