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राकेश धर द्विवेदी की हिंदी कविता ‘तुझसे बिछड़कर....’

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Poem
तुझसे बिछड़कर यूं ही
जीवन बिता रहे हैं
ये आइने कहीं पर
मुझको चिढ़ा रहे है

अपनी बरबादी की कहानी
मैं खुद को सुना रहा हूं
किसको सुनाऊं किस्से
लोग किस्से बना रहे हैं

तन्‍हाइयों में मेरे आंसू
जो कपोलों पर बह कर आए
लिख रहे हैं वो कहानी
और पढ़कर सुना रहे हैं

मझधार में मेरी किश्ती है
दूर है किनारा
हम आंधियों से लड़ते
दीपक बचा रहे हैं।

कवि : राकेश धर द्विवेदी
पता : 5/58, विनीत खण्ड,
गोमतीनगर, लखनऊ, यूपी।

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