Publish Date: Mon, 20 Apr 2026 (15:20 IST)
Updated Date: Mon, 20 Apr 2026 (15:24 IST)
तुझसे बिछड़कर यूं ही
जीवन बिता रहे हैं
ये आइने कहीं पर
मुझको चिढ़ा रहे है
अपनी बरबादी की कहानी
मैं खुद को सुना रहा हूं
किसको सुनाऊं किस्से
लोग किस्से बना रहे हैं
तन्हाइयों में मेरे आंसू
जो कपोलों पर बह कर आए
लिख रहे हैं वो कहानी
और पढ़कर सुना रहे हैं
मझधार में मेरी किश्ती है
दूर है किनारा
हम आंधियों से लड़ते
दीपक बचा रहे हैं।
कवि : राकेश धर द्विवेदी
पता : 5/58, विनीत खण्ड,
गोमतीनगर, लखनऊ, यूपी।
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