सुलग रहा है मन के भीतर घाव पुराना किसे दिखाएं। होंठों पर आकर बैठी है गुमसुम तन्हाई। विस्मित सा मन रिश्ते सूखे । लुक्का छिप्पी खेल रही है ग़म की परछाई कौन सम्हाले सब हैं भूखे। बिखरा जीवन टूटा सा मन हाल ठिकाना कहां बनाएं। बीत गए ...