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मार्मिक कहानी : निर्णय

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डॉ. दीपा मनीष व्यास

सुनो, सुनो क्या कह रहा है, ये तुम्हारा सुपुत्र
सुनो जरा, मती मारी गई है इसकी अरे
दिमाग खराब हो गया है साहब जादे का..........।
रमेश बाबू जोर से चिल्लाए जा रहे थे।
उनकी धर्मपत्नी दौड़कर आकर खड़ी हो गई.
क्या हुआ जी....... वाक्य पूरा भी न हो पाया कि-
रमेश बाबू फिर दहाड़े-
क्या हुआ जी, है....क्या हुआ ? जैसे तुम तो कुछ जानती ही नहीं हो। और नहीं जानती हो तो पूछो इन साहबजादे से कि ये क्या करने जा रहे हैं ? पूछो ऽऽऽऽ.............।
सुमित्रा ने अपने बेटे अमर की ओर प्रश्न वाचक निगाहों से देखा। पर अमर अपने चार महीने के बच्चे को लेकर वहां से चला गया, और कमरे में जाकर कमरे का दरवाजा जोर से लगा लिया।
 
सुमित्रा कुछ पूछ नहीं पाई पर इतना जान गई कि बाप-बेटे के मध्य कुछ किसी बातों को लेकर कुछ ज्यादा ही तनातनी हो गई है।
 
परिस्थिति कुछ ऐसी थी कि न पति से पूछ सकती थी न बेटे से। अब तो मन में भी कयास नहीं लगा पा रही थी कि माजरा क्या है।
चुपचाप कमरे से बाहर निकल गई। 
 
भगवान के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ी हो कातर स्वर में बोली-हे भगवान ये क्या बखेड़ा, सुख शांति बनाए रखो भगवान। चार महीने हो गए बहु को शांत हुए। छोटा दूधमुंहा छोड़कर गई वो। छोटा सा तो परिवार था अब वो भी आधा हो गया। जैसे-तैसे दुख को स्वीकार किया अब सुख शांति बनाए रख ईश्वर।
 
तभी अमर के कमरे से बच्चे के रोने की आवाज सुनकर सुमित्रा उस ओर गई। अमर दरवाजा खोल चुका था। कमरे में बच्चे को थपथपाकर सुलाने का प्रयास कर रहा था। सुमित्रा ने कटोरी में दूध डाला और चम्मच से बच्चे के मुंह में धीरे-धीरे डालने लगी।
 
पर ध्यान तो अमर के बुझे चेहरे, और सूजी हुई आंखों पर टिका था। लग रहा था जैसे खूब रोया हो। बेटे को हर बात हक से बोलने वाली सुमित्रा आज स्वयं को लाचार महसूस कर रही थी, अपने ही बेटे से कुछ पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, शब्द मुंह तक आने वाले रूक रहे थे।
 
हिम्मत कर के बोली-बेटा कब तक यूं खुद को अंदर ही अंदर खत्म करता रहेगा। बहू के जाने का दुख हमको भी है पर वो इस छोटे बच्चे के रूप में बहुत बड़ी जिम्मेदारी हम सब पर छोड़ गई है अब इससे मुंह तो नहीं मोडा जा सकता ना। ऐसे बिना ढंग से खाए-पीए तू कैसे इस बच्चे का, हम सबका ध्यान रखेगा।
अमर एकटक बच्चे को देखे जा रहा था। लग रहा था कि किसी शून्य में भटक रहा है, कुछ खोज रहा है।
 
सुमित्रा के स्पर्श से एकाएक विचारों की दुनिया से बाहर आया। मां का रुंआसा चेहरा देख बोला-
 मां तुम जानती हो ना कि मैं अंजू से कितना प्यार करता हूं। वो मेरी जिंदगी ही नहीं पूरी जिंदगी की खुशी थी। उसकी यादें, बातें कैसे भूला दूं। कैसे उसको दूर कर दूं।
 
सुमित्रा ने प्यार से अमर को सहलाकर कहा- बेटा कभी-कभी जिम्मेदारियां, दुःख से बड़ी होती है। हमे अपने दुख को भूलना होता है उस जिम्मेदारी के लिए जिससे बहुत से सुख जुड़े होते है। तू समझ रहा है ना ? बेटा देख, अंजू की जगह कोई नहीं ले सकता पर इस बच्चे की देखभाल के लिए कोई तो चाहिए ना? तेरे बाबूजी और मैं कितने दिन जीएंगे कब तक इस दुनिया में है नहीं कह सकते बेटा। हम भी उम्र के इस पड़ाव पर थक गए है। तू इस बच्चे के लिए ही दूसरी शादी के लिए मान जा। तू अकेले इस नन्ही जान को नही संभाल पाएगा। मां,मां  ही होती है। सुमित्रा एक लय में बोले जा रही थी,
 
 तभी अमर ने कहा- मैं सब समझता हूँ मां तभी तो मैंने भी एक फैसला लिया है, इस छोटे से चिराग को संभालने के लिए में मधुर को घर लाना चाहता हूं।
 
क्या ऽऽऽऽ........ मधुर ? मधुर को ? सुमित्रा के हाथ से कटोरी चम्मच छूट गया और वह धम्म से बिस्तर पर गिर गई।
 
भौंचक होकर अमर को देखते हुए बोली तु ये क्या कह रहा है बेटा ? मधुर को लाएगा घर में उस मधुर को जिसे अब उसके घर वाले भी घर के बाहर बने छोटे से दड़वे नुमा कमरे में रखते हैं, उस मधुर को तू अपने घर .............................।
 
तो क्या हुआ मां, मधुर मेरा बचपन का दोस्त है, हम साथ खेले, पढ़े, बहुत अच्छा है वो क्या खराबी है उसमें ? अमर ने अपनी बात रखी।
 
सुमित्रा अमर का हाथ पकड़कर बोली तुझे नहीं पता क्या, कि क्या खराबी है उसमें। तु नहीं जानता क्या कि वो एक हिज़डा है, किन्नर है, किन्नर। और उसे लोग मधुर नहीं मधुरा बोलते है। मधुरा। तू क्या जानता है उसके बारे मैं? तू 10 सालों से विदेश में रह रहा है। क्या जानता है बोल, चुप क्यों है अब?
 
अमर बड़े ही शांत स्वर में बोला - सब जानता हूं मां, सब कुछ जानता हूं। बचपन उसी के साथ बिताया है मैंने। और मैं विदेश में था तो क्या ? हम कभी अलग थोड़े ही हुए साथ ही थे। अंजू भी उसके बारे में सब जानती थी।
 
सुमित्रा पर तो जैसे पहाड़ ही टूट गया था- आश्चर्य चकित हो बोली-तुम दोनों अलग नहीं हुए मतलब? मतलब तुमने विदेश से भी उससे संपर्क रखा था। कैसे? कब ? कहां? सुमित्रा का स्वर काँपने लगा था, पर अमर बिल्कुल शांत खड़ा था, तकिए का सहारा देकर मां को पलंग पर आराम से बैठाया।
 
माँ की आं खों में देखकर कहा- मां  तुझे याद है जब मैं और मधुर छोटे थे तब तुम कैसे उसे गोद में उठा लेती थी। उसकी पसंद की चीज़ें उसे देती थी।
पर बेटा उस वक्त मुझे नहीं पता था कि वो........सुमित्रा बोलने की कोशिश कर रही थी कि अमर ने बीच में रोकते हुए कहा -''मां आज मुझे बोलने दे तू। बस तू सुन मां, आज तुझसे सब बात कहना चाहता हूं। आज मुझे बोलने दे।
 
मां  मधुर मेरा सबसे अच्छा दोस्त था बचपन में और आज भी है। साथ में खेलना, स्कूल जाना, साथ में पढ़ना और एक दूसरे से अपने मन की बात कहना हमारा रोज का काम था। बचपन तक का सफर हं सते-खेलते बिता पर कुछ समय बाद मधुर उदास रहने लगा। मेरे लाख पूछने पर भी कुछ नहीं बताया बस मजाक में बात टाल देता। ऐसे ही हमने दसवीं कक्षा भी उत्तीर्ण कर ली। फिर एक दिन अचानक उसने कहा कि अब वो आगे की पढ़ाई नहीं कर पाएगा। पूछने पर बताया कि घरवाले नहीं नहीं चाहते कि अब वो बाहर जाए किसी से मिले-जुले, क्योंकि वो सामान्य बच्चों की तरह नहीं है। क्योंकि वो सबसे अलग है, क्योंकि वो ये नहीं जानता कि वो लड़का या .......... उसकी कोई पहचान नहीं।
 
घर में भी सबका व्यवहार धीरे-धीरे उसके लिए बदल रहा था। मेहमानों के आने पर उसे एक छोटे कमरे में बंद कर दिया जाता था, दिन के उजाले में उसे बाहर आना मना था, रात को ही बाहर आता था। मां उसका जीवन धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा था और मैं अपनी पढ़ाई और बाद में नौकरी के कारण उससे दूर और लाचार होता जा रहा था। पर जब मैं दो वर्ष पहले यहां आया और उससे मिला तो खुद से ग्लानि हुई, नफरत हुई अपने आपसे, जिसे मैं भूल चुका था वो आज भी मेरी यादों को, फोटो को सीने से लगाए बैठा था। वो मुझे एक-एक फोटो बता रहा था और मैं.....मैं उस जर्जर मकान की तरह खुद को महसूस कर रहा था, जिसकी हर दीवार से सुखी परत, यादों के झोकों से गिरती जा रही है।
 
बस तभी निश्चय किया कि अब मैं मेरे दोस्त को इस तरह समाप्त होते नहीं देखूंगा, उससे पत्र के जरिए संपर्क बनाए रखा। कभी-कभी फोन पर भी बात होती रही। जानती हो मां अंजू को जिस दिन अस्पताल ले जा रहे थे वो खिड़की में खड़ा हाथ हिला रहा था, हिम्मत दे रहा था। चिराग के जन्म के दिन जब मैं अस्पताल में था तब वो चोरी-चुपके मिलने भी आया। मां  क्या जरूरी है कि एक औरत ही बच्चे की सही परवरिश कर सकती है ? क्या मधुर नहीं कर सकता ?
 
मां  दैहिक सुख ही सब कुछ नहीं होता दुनिया में, आत्मा की तृप्तता होना जरूरी है, अंजू ने मुझे वह संतुष्टि प्रदान की है जो जीवन पर्यन्त मुझे सुख देगी। अब मेरे जीवन का सार आधार यह छोटा सा चिराग है मां। मां मधुर ऐसा है उसमें उसका क्या दोष, ईश्वर ने उसे पूर्ण शारीरिक पूर्णता नहीं दी तो क्या हुआ उसे एक अच्छा प्यार भरा दिल तो दिया है ना मां। ईश्वर ने हमें भी बनाया और ऐसे लोग को भी तो हम कौन होते हैं जो उसकी इस रचना को हीन समझे।
 
''पर बेटा वो एक किन्नर.......................।'' सुमित्रा टूटे हुए स्वर में बोली।
 
मां सोचो अगर हमारा ये चिराग किन्नर के रूप में जन्म लेता तो ? अपूर्णता के साथ इस दुनिया में आता तो ? तो क्या तुम इसे उठाकर बाहर.............. ?
अमर चुपकर बेटा, चुपकर मत बोल ऐसा। सुमित्रा की आंखों से आं सू बहते जा रहे थे। उसकी स्थिति पेड़ से टूटे सूखे पत्ते की भांति हो गई जो बस हवा में लहरा रहा था जैसे कोई छोर नहीं मिल रहा था उसे।
बातों-बातों में कब सुबह हो गई पता नहीं चला।
 
रमेश बाबू की आवाज आई........अरे सुनती हो जल्दी नीचे आओ, आज फैसला होकर रहेगा। और साहबजादे को भी लाओ।
सुमित्रा भय से कांप रही थी, अमर हाथ थामकर सुमित्रा को लाया।
बैठक में कुछ रिश्तेदार बैठे थे।
अमर स्तब्ध था, रमेश बाबू कुर्सी पर झूल रहे थे, सुमित्रा जड़वत खडी थी।
तभी भुआजी बोली - सुमित्रा ये क्या सुन रहे हैं हम ? अब ये होगा हमारे खानदान में ?
सुमित्रा कुछ बोलती तभी रमेश बाबू बोले तो क्या हुआ ? खानदान को क्या हुआ ? अगर अमर ने कुछ फैसला लिया है, तो क्या गलत किया ?
अमर और सुमित्रा दोनो के मुंह से एक साथ स्वर निकला - क्या ऽ ऽ ऽ ऽ ?
तुम दोनों मेरी ओरे ऐसे क्या देख रहे हो ? सब जानता हूं मैं। कल रात तुम दोनों माँ-बेटे की सारी बात सुनी मैंने, तब यह निर्णय लिया। बहू के जाने के बाद न जाने कितने रिश्तेदार आए, पर चिराग को पूर्णरूप से संभाल सके ऐसी कोई लड़की नजर नहीं आई। किसी को पैसा, किसी को नाम तो किसी को आजादी से मतलब रहा.........रात में बहुत सोचा तो लगा कि क्या एक असमान्य या विशेष बच्चे को जीने का हक नहीं हैं  जितनी ममता मधुर में है क्या वो चिराग के लिए काफी नहीं है? रात को जब भी चिराग रोता है मधुर घर के सामने वाली पुलिया पर घंटों बैठा रहता है। 
 
हां मैंने माना कि कल मुझे बहुत क्रोध आया, इंसान हूं मैं भी, संयम न रहा था कल। मधुर बाहर आओ बेटा।
बाबुजी ! अमर विस्मित होकर बोला - बाबुजी ! मधुर यहां ? कैसे ? आपने बुलाया.....
 
हां  मैं लेकर आया इसे, इसके अपने परिवार में। बेटा मुझे कोई आपत्ति नहीं। मधुर अपूर्ण नहीं पूर्ण है दया, ममता, प्यार, संवेदना से पूर्ण। ये तो हम ही हैं जो अपनी घटिया सोच, अपने मस्तिष्क की अपूर्णता को अपनी पूर्णता मानते हैं। समाज में रहते हुए समाज के एक हिस्से को धड़ से काटकर अलग कर देते हैं। समान समरसता की बात करने वाले हम सामाजिक विसंगतियों को जन्म देते हैं। दोष मधुर में नहीं, दोष हमारी सोच में है जो हम एक बच्चे को शारीरिक विसंगति को हास्यास्पद बना किन्नर नाम दे देते हैं। ये भूल जाते हैं कि उनमें भी मासुम दिल धड़कता है, उन्हें भी परिवार की चाह अपनों के प्रेम की आस होती है।
 
आज मधुर को अपना 'मधुर' नाम कटु नहीं मीठा लग रहा था, आज कोई उस पर हंस नहीं रहा था पर वो खुशी से हंसना चाहता था, नाचना चाहता था। अनमने से अहसासों से बहुत कुछ कही रही थी उसकी आंसू भरी आंखें। समाज में परिवार में उसका भी स्थान जो बनने जा रहा था।
 
रमेश बाबू बोल ही रहे थे और उधर मधुर, चिराग को अपनी बाहों में झूला रहा था।
उसकी आंखों से निरंतर अश्रुधारा बह रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे मधुर, चिराग की रोशनी से अमर हो गया था। सभी ने एक दूसरे को आलिंगन में ले लिया और अपूर्ण परिवार अब पूर्ण हो गया था। 
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- डॉ. दीपा मनीष व्यास
2043-डी, सुदामा नगर,
इन्दौर (म.प्र.)
 

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