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रुक्मिणी अष्टमी पर जानिए श्रीकृष्‍ण की पहली पत्नी के संबंध में दिलचस्प जानकारी

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माता रुक्मिणी
Rukmini ashtami 2025: रुक्मिणी अष्टमी का व्रत हिंदू धर्म में विशेष महत्व रखता है। यह पावन पर्व भगवान श्रीकृष्ण की पत्नी और शक्ति स्वरूपा देवी रुक्मिणी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। यह व्रत पौष मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। श्रीराधा को भगवान श्रीकृष्‍ण की प्रेमिका कहा जाता और श्रीरुक्मिणी जी उनकी पत्नी थीं।
 
अष्टमी आरम्भ: 11 दिसंबर को दोपहर 01:56 से प्रारंभ।
अष्टमी समापन: 12 दिसंबर को दोपहर 02:56 तक।
 
  • रुक्मणी शहरी स्त्री है और वह एक राजकुमारी थीं। 
  • उन्हें माता लक्ष्मी स्वरूपा कहा गया है इसलिए रुक्मिणीजी को माता कहते हैं। 
  • रुक्मिणी प्रभु की पत्नि व सेविका है। 
  • माता रुक्मिणी ने पत्नी धर्म निभाया। रुक्मिणी श्री कृष्ण में समाई हुई है।
  • रुक्मिणी जी का प्रभु ने हरण करने के बाद विवाह किया था।
  • माता रुक्मिणीजी प्रभु के बचपन को छोड़कर संपूर्ण जीवन की साक्षी है।
  • रुक्मिणी ने प्रभु श्री कृष्‍ण के जाने के बाद देह त्यागी थी। 
  • माता श्री रुक्मिणीजी सहज और अत्यंत ही सरल थीं।
  • रुक्मिणीजी विदर्भ नरेश भीष्मक की पुत्री थीं। 
  • रुक्मिणी दिखने में अतिसुंदर एवं सर्वगुणों से संपन्न थीं। 
 
रुक्मिणी कथा: रुक्मिणी के भाई उनका विवाह शिशुपाल से करना चाहते थे, लेकिन देवी रुक्मिणी श्री कृष्ण की भक्त थीं और उन्हें ही अपना पति मानती थीं। जिस दिन शिशुपाल से उनका विवाह होने वाला था, उस दिन देवी रुक्मिणी अपनी सखियों के साथ मंदिर गई और पूजा करके जब मंदिर से बाहर आई, तो मंदिर के बाहर रथ पर सवार श्री कृष्ण ने उनको अपने रथ में बिठा लिया और द्वारिका की ओर प्रस्थान कर गए और उनके साथ विवाह किया। 
 
अत: आज के दिन भगवान श्री कृष्ण और मां रुक्मिणी पूजन, उनके मंत्रों का उच्चारण तथा तुलसी मिश्रित खीर का भोग लगाने और रात्रि जागरण करके पारण करने का विशेष महत्व है। इस तरह पूजन-अर्चन करने से समस्त मनोकामना पूर्ण होकर घर सुख-समृद्धि तथा धन-संपत्ति से भरा रहता है तथा वैवाहिक जीवन में सर्वसुखों की प्राप्ति होती है।

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