Webdunia - Bharat's app for daily news and videos

Install App

Select Your Language

Notifications

webdunia
webdunia
webdunia
webdunia
Advertiesment

1860 में स्थापित हुआ था 'इंदौर शिक्षा मंडल'

हमें फॉलो करें webdunia
webdunia

अपना इंदौर

इंदौर नगर में शैक्षणिक गतिविधियों का सूत्रपात संपूर्ण मध्यभारत में सबसे पहले प्रभावशाली ढंग से हुआ था। यदयपि नगर में 1841 में ही 'इंदौर मदरसा' स्थापित हो गया था तथापि 1860 तक इस मदरसे और नगर की अन्य शैक्षणिक संस्थाओं के निरीक्षण की कोई व्यवस्‍था नहीं हो पाई थी। विद्यार्थियों को कैसे पढ़ाया जा रहा है? उनके अध्ययन का स्तर क्या है? विद्यालयों की स्थिति क्या है? आदि विषयों की जांच-पड़ताल करने वाली कोई एजेंसी न थी।
 
इन कमियों की ओर जब महाराजा तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) का ध्यान आकर्षित किया गया तो उन्होंने 1860 में ही शैक्षणिक संस्थाओं के निरीक्षण हेतु 'इंदौर शिक्षा मंडल' के निर्माण की घोषणा करते हुए बक्षी खुमानसिंहजी को इस मंडल का अध्यक्ष बनाया। मौलवी मोहम्मद हुसैन तथा गणेश सीताराम शास्त्री इस मंडल के सदस्य मनोनीत किए गए थे। कुछ समय पश्चात ही श्री शास्त्री को बीजागढ़ सरकार का सूबा बनाकर भेज दिया गया। उनके स्थान पर श्री रामजी को शिक्षा मंडल का सदस्य मनोनीत किया गया।
 
राज्य द्वारा जारी होने वाले सभी शैक्षणिक आदेश शिक्षा मंडल को भेजे जाते थे और सभी शैक्षणिक मामले इस मंडल के माध्यम से दरबार को प्रेषित किए जाते थे।
 
इस संस्था का जीवन अल्पकालीन ही रहा। इस मंडल के अध्यक्ष बक्षी खुमानसिंह ने होलकर दरबार से प्रार्थना की कि इस प्रकार के शिक्षा मंडल की शैक्षणिक गतिविधियों को विशेष लाभ नहीं हो पा रहा है, अत: इसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए। उनकी रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया गया और शिक्षा मंडल को समाप्त करते हुए इंदौर मदरसे की व्यवस्था व उस पर नियंत्रण श्री कीर्तने को सौंप दिया गया।
 
1878 के प्रारंभ में ही राज्य के शिक्षा विभाग के सामान्य निर्देशन का कार्य रेसीडेंसी विद्यालय के प्राचार्य मिस्टर मेकॉय को सौंपा गया। उस समय तक प्रत्येक विद्यालय अपने स्तर पर विद्यार्थियों की परीक्षा आयोजित करते थे जिसके कारण विद्यालयों के शैक्षणिक स्तर भिन्न होते थे। मिस्टर मेकॉय ने अपने द्वारा नियुक्त शिक्षकों के माध्यम से सेंट्रल इंडिया के समस्त विद्यार्थियों की एक प्रतिस्पर्धी परीक्षा 1878 में आयोजित की।

संपूर्ण मध्यभारत में संयुक्त रूप से आयोजित होने वाली यह पहली प्रतिस्पर्धी परीक्षा थी। इस परीक्षा में 'इंदौर मदरसे' ने द्वितीय स्थान पाया और उसके दो छात्रों को प्रथम श्रेणी की छात्रवृत्तियां भी प्रदान की गईं। ये छात्रवृत्तियां उन्हें संस्कृत व इतिहास में विशेष योग्यता पाने पर दी गई थीं। इसकी अवधि एक वर्ष थी और दोनों छात्रों को क्रमश: 7 व 5 रु. प्रतिमाह स्वीकृत किए गए थे।
 
मालवा विद्यापीठ गुरुकुल की स्थापना
रोजगारोन्मुखी शिक्षा देने का विचार आज से लगभग 70 वर्ष पूर्व हमारे प्रबुद्धगणों के दिमाग में था, क्योंकि उस समय से ही बेरोजगारी (शिक्षितों में) होनी प्रारंभ हो गई थी। नौकरी न पाकर आए दिन शिक्षित नौजवानों द्वारा निराशा में आत्महत्या करने के समाचार मिला करते थे। इन घटनाओं को रोकने के लिए और युवा विद्यार्थियों में आत्मविश्वास जागृत करने के लिए एक ऐसे शिक्षा संस्‍थान की स्थापना का संकल्प किया गया जिसमें बालकों को रोजगारोन्मुखी शिक्षा दी जा सके।
 
देवास (सीनियर) के दीवान सरदार पंडित नारायणप्रसादजी ने इंदौर के प्रबुद्धगणों के समक्ष अपनी यह योजना रखी। इस संस्थान की स्‍थापना को उत्साहजनक समर्थन मिला और 1927 में राऊ के मुक्त प्राकृतिक वातावरण में 'मालवा-विद्यापीठ गुरुकुल' के नाम से यह संस्था कायम हो गई। इसके प्रथम प्राचार्य के रूप में श्री एम.आर. जुल्का को नियुक्त किया गया। संस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए एक स्टेंडिंग गवर्निंग कमेटी बनाई गई जिसके सदस्य थे- रायसाहब एस.एम. बाफना, प्रायमिनिस्टर, इंदौर राज्य एत्मात्उद्दौला सरदार एम.वी. किबे।
 
राव राजा सर सेठ हुकुमचंदजी, राज्यभूषण सेठ हीरालालजी, मुसाहिबे खास बहादुर सरजूप्रसादजी, राज्यभूषण रायसाहब कन्हैयालालजी भंडारी, राय रतन सेठ जगन्नाथजी, मेजर सरदार शिवप्रसादजी तथा सरदार एस.वी. चांगण बार एट लॉ संचालक।
 
यह संस्था एक आवासीय गुरुकुल थी जिसमें 7 से 10 वर्ष की आयु के बालकों को नाममात्र के शुल्क पर भर्ती किया जाता था। संस्‍था के व्यय की व्यवस्था मुख्य रूप से धनी-मानी व्यक्तियों से प्राप्त आर्थिक दान से चलती थी। भर्ती किए गए बालकों को गुरुकुल परंपरानुसार ब्रह्मचारी संबोधित किया जाता था। यहां बालकों की शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक उन्नति पर विशेष बल दिया जाता था। बालकों को हिन्दी माध्यम से शिक्षा दी जाती थी। संस्कृत तथा मराठी का अध्यापन भी मैट्रिक तक कराया जाता था।
 
इस स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त बालकों को दरी, कालीन, नेवार बुनना, सुतारी, प्रेस का काम, ड्राइंग आदि का प्रशिक्षण भी दिया जाता था। साबुन बनाना, परफ्यूम बनाना, बास्केट मेकिंग, क्ले मॉडलिंग व टेलरिंग आदि रोजगारों की शिक्षा भी प्रारंभ की गई थी, किंतु इनमें अधिक व्यय होने के कारण बाद में इन्हें बंद करना पड़ा।
 
10-12 वर्षों तक तो यह संस्था काफी अच्छी तरह चलती रही, किंतु पश्चिमी शिक्षा की चकाचौंध, अंगरेजी अधिकारियों के असहयोग और दान के अभाव में यह गुरुकुल अंधेरे की गुमनामियों में खो गया।

Share this Story:

Follow Webdunia Hindi

अगला लेख

उच्च शिक्षा के लिए छात्रवृत्तियां