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इंदौर के समस्त महलों का सिरमौर लालबाग पैलेस

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अपना इंदौर

इंदौर के समस्त महलों का सिरमौर है- लालबाग पैलेस। इस महल के साथ बाग का नाम इसलिए जुड़ा कि महल व बाग एक-दूसरे के सौंदर्य में चार चांद लगाने वाले हैं। लालबाग पैलेस के वर्तमान स्वरूप का निर्माण कार्य 1886 से प्रारंभ हुआ। 6 वर्ष के अंतराल में ही कुल 36 लाख रु. महल के निर्माण पर राज्य ने खर्च किए थे।
1903 से 1911 ई. तक महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) अल्प वयस्क थे। अत: होलकर प्रशासन कौंसिल ऑफ रीजेंसी द्वारा संचालित किया जा रहा था। इस अवधि में ही इस महल को पाश्चात्य शैली में कीमती संगमरमर से सुसज्जित किया गया।
 
यह कार्य लंदन की प्रसिद्ध फर्म मेसर्स वारिंग एंड गिलोज ने 36,337 पौंड की लागत से संपन्न किया था। इस सुंदर महल की देखभाल के लिए मुंतजिम हुजूर फर्राशखाना नामक पद कायम कर 300 रु. प्रतिमाह के वेतन पर एक योग्य अधिकारी की नियुक्ति की गई।
 
1912 में इस महल के भीतर यशवंतराव होलकर (द्वितीय) के आवास कक्ष को भी व्यवस्थित किया गया तथा लालबाग से गौतमबाग के मध्य एक पुल का निर्माण करवाया गया। 1914 में पुन: कुछ नए काम हाथ में लिए गए जिनमें महल का विस्तार, गैरेज एवं अस्तबल तथा अस्थायी किचन मुख्य थे। उसके बाद 1921 ई. तक महल के विस्तार का अंतिम चरण पूरा किया गया और नए सिरे से साज-सज्जा का कार्य मेसर्स मार्टिन एंड कं., केल्टनहेम को सौंपा गया। सज्जा का यह कार्य मिस्टर बेरहार्ड ट्रिग्स ने पूरा करवाया था। 1928 में भवन-विस्तार व कुछ सुधार कार्य किए गए थे।
 
1935-36 में इसी महल में ब्रिटिश सम्राट का सिल्वर जुबली समारोह आयोजित होना था। अत: 26,132 रु. व्यय करके महल के एक भाग में संगमरमर लगवाया गया। 1938 में लालबाग लोक निर्माण विभाग से हाउस होल्ड विभाग को दे दिया गया। 1941-42 में हाउस होल्ड ऑफिसर श्री एन.एम. वाघ के प्रयासों से इस महल के रखरखाव के बजट में वृद्धि की गई।
 
यह सुंदर एवं भव्य राजप्रासाद 4 एकड़ के क्षेत्र में निर्मित है। इसके कुछ कक्ष विशुद्ध रोमन शैली के स्थापत्य पर आधारित हैं और कुछ कक्ष जिनमें भोजन कक्ष प्रमुख है, शुद्ध भारतीय स्थापत्य के अनुरूप हैं। इसमें लगे कसारा संगमरमर के स्तंभ अत्यंत आकर्षक हैं। छतों को अनेक प्रकार के अलंकरणों, चित्रों, प्लास्टर ऑफ पेरिस की डिजाइनों व रेखांकनों से अलंकृत किया गया है।
 
भवन में स्तंभों का आभास देने के लिए आश्चर्यजनक तरीके से लकड़ी का उपयोग हुआ है, जो सीमेंट के जान पड़ते हैं। लकड़ी की सजावट विशेषकर भारतीय पद्धति के रसोईघरों में चंदन की लकड़ी से की गई सजावट देखते ही बनती है। बैंक्वेट हॉल व डांसिंग हॉल की फ्लोर लकड़ी से बनाई गई है। डांसिंग हॉल की पूरी फ्लोर बड़े-बड़े मजबूत स्प्रिंग्स पर रखी गई है, जो वजन के साथ ऊपर-नीचे होती है। अनेक लोगों के एकसाथ एक रिद्म पर डांस करने पर यह फ्लोर अपने आप ऊपर-नीचे होती रहती है, जो एक अजीब अनुभूति प्रदान करती है।
 
विभिन्न स्थानों पर आवश्यकतानुसार बेल्जियम ग्लास लगाए गए हैं। बेशकीमती गलीचे और झाड़फानूस बेहद आकर्षक हैं। मोमबत्तियों का आभास देते हुए बिजली के विचित्र बल्ब बड़े सुंदर प्रतीत होते हैं। महल का तमाम फर्नीचर बर्मा टीक-वुड का बना हुआ है, जो आज भी सनमाइका की तरह चमकता है। महाराजा के शयन कक्ष में बने आलों में बहुत ही उच्च कोटि के इत्र रखे जाते थे। इन आलों से आज भी उन इत्रों की खुशबू आती है।
 
पैलेस के पूर्वी भाग में नदी प्रवाहित होती है। इस नदी के नीचे एक सुरंग बनाकर नदी के उस पार बने रसोईघर को एक आंतरिक मार्ग से जोड़ा गया है। भोजन बनकर इसी तहखाने के मार्ग से मुख्य महल के तलघर में आता था जिसे एक लिफ्ट के माध्यम से ऊपर पहुंचाया जाता था।
 
इस महल में 5 बाघ और एक तेंदुआ स्टफ करके रखे हुए हैं। इनमें से एक बाघ की लंबाई 11 फुट से भी अधिक है, जो गिनीज बुक में दूसरे क्रम पर अंकित है। उल्लेखनीय है कि इस बाघ का शिकार राजकुमार यशवंतराव होलकर ने 1923 ई. में खातेगांव-कन्नौद के जंगलों में किया था।
 
फ्रांस की राजधानी पेरिस के समीप वहां के बूर्बो राजवंश का विश्वप्रसिद्ध राजप्रासाद वर्साय स्थित है जिसमें अद्‌भुत कलाकृतियां निर्मित हैं। संगमरमर से बने वर्साय के शीशमहल का स्वरूप लालबाग पैलेस को देने का भरसक प्रयास किया गया है। दर्शक लालबाग पैलेस में घुसने के बाद अपने आपको कल्पना लोक में पाता है। उसे महल की हर वस्तु अपनी उपयोगिता की दास्तान स्वयं सुनाती-सी प्रतीत होती है। महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) की कुर्सी जिस क्राउन हॉल में रखी है, उसमें प्रवेश करने पर ऐसा लगता है कि सामने महाराजा स्वयं उपस्थित हैं।
 
महल की आंतरिक सज्जा में प्रतिमाओं और चित्रकला का अपना महत्व है। इनमें ग्रीक एवं रोमन मिथकों, साहित्य एवं संगीत का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। बैंक्वेट हॉल में चित्रित एक दृश्य में ग्रीक समुद्र देवता पोसीडोन को जल-तरंगों पर आरोहित अंकित किया गया है। यहां अश्वों के आलेखन में भी संभवत: पोसीडोन को ही दर्शाया गया है। ग्रीक कथाओं के अनुसार पोसीडोन ने यह रूप डीमेटर को पकड़ने के लिए धारण किया है। एक अन्य दृश्य में गरूड़ व उलूक को दर्शाया गया है, जो हाथ में विश्व व कंपास लिए हैं। पास में ही एक देवदूत पक्षी के पंख की कलम से कुछ लिखते हुए प्रदर्शित है और न्याय संसार को एक प्याली में उठा रखा है। छत पर चित्रित एक दृश्य में ग्रीक देवता हेलीओंस या सूर्य को 4 घोड़ों के रथ पर सवार बताया है।
 
इसी के साथ लौहशाला के देवता हेफाईसटोस भी बैठे हैं। एक अन्य दृश्य में स्त्रियों को वाद्य यंत्र लिए बताया गया है जिनमें मध्य की स्त्री ज्ञान-दीप लिए है। कक्ष की दीवार एवं उनमें लगे हुए कांच एवं भित्तिचित्र विभिन्न अलंकरणों से अलंकृत हैं। इनमें फूलों के वर्तुलाकार गुच्छ, लता वल्लरियां, अंगूर, अन्नानास आदि फल, गेहूं की बालियां, विभिन्न पक्षी यथा- मोर आदि के साथ सर्पों का आलेखन किया गया है। दरवाजों के ऊपर पेडिमेंटस में ग्रीक शैली के वस्त्र, सेंडिल व अलंकार धारण किए महिलाओं का अंकन है।
 
लालबाग में शेष बचे पेड़-पौधे आज होलकर नरेशों के प्रकृति प्रेम की मूक गाथा कहते से प्रतीत होते हैं। होलकरों ने इस सुंदर उद्यान के मध्य केवल 4 एकड़ क्षेत्र में ही महल का निर्माण करवाया था जबकि इस मनोहर बाग का विस्तार इससे 17 गुना अधिक क्षेत्र अर्थात 68 एकड़ में करवाया गया था। यही कारण है कि बाग के नाम पर ही यहां बने राजमहल का नाम 'लालबाग पैलेस' रखा गया।
 
इस बाग का निर्माण कब प्रारंभ हुआ? इसकी तो कोई सुनिश्चित दिनांक उपलब्ध नहीं है किंतु उन दिनों इंदौर से प्रकाशित 'मालवा अखबार' के 27 मार्च 1849 के अंक में लालबाग का प्रथम संदर्भ मिलता है। लालबाग अंगरेज अतिथियों के स्वागत व राजकीय उत्सवों के आयोजनों का प्रमुख स्थल बन चुका था।
 
इस बाग के सुनियोजित व व्यवस्थित विकास के लिए 1853 में महाराजा तुकोजीराव (द्वितीय) ने श्री हार्वे नामक उद्यान शास्त्री को विशेष रूप से नियुक्त किया था। हार्वे ने मालवा क्षेत्र में संभवत: पहला सफल प्रयोग करते हुए बड़े-बड़े वृक्षों का पुनर्रोपण करवाया। उसने ही एक आकर्षक गुलाब चक्कर बनवाया और बाग में कई किस्म के सुंदर पौधे लगवाए। लालबाग उसके प्रयासों से बहुत आकर्षक बन गया। अगले ही वर्ष महाराजा ने श्री हार्वे के कार्यों से प्रसन्न होकर उसे पदोन्नत कर दिया।
 
1857 की जुलाई में इंदौर रेसीडेंसी पर क्रांतिकारियों के हमले के पूर्व अंगरेज अधिकारियों व महाराजा के मध्य इसी बाग में गोपनीय चर्चाएं हुई थीं।
 
महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) ने अपने पुरखों की धरोहर के रूप में इसे बड़े जतन से सहेजा। बाग के पौधों और यहां के सुंदर वातावरण से उन्हें इतना अधिक लगाव था कि 1926 में अपने पुत्र यशवंतराव के पक्ष में गद्दी त्यागने के बाद भी आजीवन (देहांत 20 मई 1978) वे लालबाग पैलेस में ही निवास करते रहे।
 
यह 1932 की बात है कि जब इस बाग के विकास के लिए गवर्नमेंट लॉरेंस गार्डन, लाहौर से एक विशेषज्ञ बुलाकर नियुक्त किया गया। 1934 तक लालबाग का बहुत ही आकर्षक विकास हो चुका था। महाराजा यशवंतराव को गुलाबों व गुलदावदी से बड़ा लगाव था। महाराजा लंदन की रोज सोसायटी के सदस्य थे। यही कारण है कि वहां विकसित की जाने वाली नई प्रजातियों के गुलाब के पौधे महाराजा को भी भेंट किए जाते थे। इस प्रकार की 68 नई प्रजातियों के गुलाब लंदन से प्राप्त हुए थे। 474 किस्मों के गुलाब विदेशों से बुलवाकर यहां लगाए गए थे। पैलेस का दक्षिणी भाग रंग-बिरंगे गुलाबों से भरा रहता था जिनकी खुशबू महल तक पहुंचती थी। गुलाबों का संकलन चलता रहा और 1936-37 तक लालबाग में 1,600 किस्म के गुलाबों के पौधे हो गए। विभिन्न प्रकार की गुलदावदी के भी 6,000 से अधिक किस्मों के पौधे यहां महकते थे।
 
लालबाग से मुखातिब हुईं कुछ हस्तियां
 
लालबाग प्रारंभ से ही होलकर राजपरिवार के लिए मनोरंजन का स्थल रहा। इसके सुंदर स्वरूप व मनोहारी उद्यान के कारण अतिमहत्वपूर्ण अतिथियों को लालबाग का अवलोकन अवश्य करवाया जाता था। सर्वप्रथम 1857 में इंदौर स्थित रेसीडेंसी का अंगरेज रेजीडेंट एच.एम. ड्‌युरेंड, महाराजा तुकोजीराव द्वितीय से चर्चा करने लालबाग आया था। उसने अंगरेजों की रक्षा करने की याचना यहीं की थी।
 
महाराजा तुकोजीराव के मित्र, हैदराबाद के नवाब खुर्शीद अली शाह जब 1884 में इंदौर पधारे तो बड़ी गर्मजोशी के साथ उनका स्वागत किया गया। लालबाग में रहकर उन्होंने होलकर नरेश का आतिथ्य स्वीकारा था। संभवत: उनकी बिदाई के समय उन्हें महाराजा तुकोजीराव का एक दुर्लभ चित्र भेंट किया गया होगा, जो आज भी हैदराबाद के सालारजंग म्यूजियम में संरक्षित है। वर्ष 1896-97 में भारत के वायसराय लॉर्ड एलगिन जब इंदौर आए तो उनके सम्मान में लालबाग में एक भव्य शाही दावत का आयोजन किया गया। 15 अप्रैल 1912 ई. को तत्कालीन रेजीडेंट मिस्टर जे.डब्ल्यू. वुड अपने कुछ सहयोगियों के साथ लालबाग आए।
 
24 जनवरी 1912 को खासगी गद्दीनशीनी का भव्य समारोह भी लालबाग में आयोजित कर सारे बाग को सुंदर रोशनी से सजाया गया था। 9 नवंबर 1912 को भारत के वायसराय लॉर्ड हार्डिंग अपनी पत्नी सहित इंदौर आए थे। तब लालबाग में उनके सम्मान में शानदार शाही दावत का आयोजन किया गया। अगस्त 1928 ई. में तत्कालीन वायसराय भी सेंट्रल इंडिया एजेंसी का निरीक्षण करने इंदौर आए थे।
 
8 दिसंबर 1932 ई. को अर्ल ऑफ वेलिंगटन अपनी काउंटेस के साथ इंदौर आए। इन शाही मेहमानों की शानदार मेहमाननवाजी लालबाग में की गई। इसी वर्ष इंडियन स्टेट्‌स इन्क्वायरी की उपसमिति की बैठक भी लालबाग के अतिथि कक्ष में रखी गई। इस अवसर पर सेंट्रल इंडिया के राज्याधिकारियों और अतिथियों के सम्मान में 10 मार्च से 13 मार्च तक इस राजप्रासाद में अनेक आयोजन किए गए।
 
26 जुलाई 1934 को तत्कालीन वायसराय सर जॉर्ज फ्रेडरिक स्टेन्ले एवं लेडी फ्रेडरिक स्टेन्ले इंदौर आए। उनका आतिथ्य परंपरागत रूप से लालबाग में ही किया गया। 1935-36 में इसी महल में ब्रिटिश सम्राट का सिल्वर जुबली महोत्सव मनाया गया था।
 
महाराजा की शान, जनता का गौरव
 
लालबाग पैलेस के नाम से जानी जाने वाली सुंदर व कलात्मक इमारत का लोकार्पण 14 नवंबर 1988 अर्थात विक्रम संवत्‌ 2045 की ज्ञान पंचमी को मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री अर्जुनसिंह द्वारा किया गया था। महाराजा तुकोजीराव (तृतीय) के लंबे समय तक आवास-स्थल रहे लालबाग पैलेस को दरअसल नेहरू केंद्र के रूप में जनता को सौंपा गया। नेहरू केंद्र का लक्ष्य रखा गया था वैचारिक, कलात्मक और मनोरंजन की गतिविधियों का केंद्र। इस संदर्भ में यहां कुछ वर्षों से बड़े पैमाने पर मालवा-उत्सव का आयोजन हो रहा है। हस्तशिल्प कला की प्रदर्शनी भी आयोजित होती रही है।
 
लोकार्पण समारोह का आयोजन लालबाग परिसर में ही किया गया था, जहां एक भव्य मंच बनाया गया था। इस पर श्री अर्जुनसिंह के अतिरिक्त 4 गणमान्य वैज्ञानिक व अन्य कई विशिष्ट व्यक्ति विराजमान थे। लालबाग पैलेस की दक्षिण दिशा के प्रवेश द्वार पर लगे शिलालेख का अनावरण तथा पं. नेहरू की प्रतिमा को माल्यार्पण कर नेहरू केंद्र का उद्‌घाटन किया गया।
 
लालबाग का शाही दरबार हॉल इटली की करेरा खदानों से लाए गए आकर्षक संगमरमर से सज्जित है। यहां वाचनालय भी है। पूरा भवन स्थापत्य कला का अद्वितीय नमूना है। लोकार्पण के समय म.प्र. राज्य शासन के अनेक मंत्री तथा विधायक मौजूद थे। महाराजा तुकोजीराव की पत्नी शर्मिष्ठादेवी भी समारोह में उपस्थित थीं। बाद में उन्होंने मुख्यमंत्री श्री सिंह से भी परिसर में भेंट की थी। भव्य राजमहल को जनता को सौंपे जाने तथा उसे कलात्मक गतिविधियों का केंद्र बनाए जाने पर इंदौर की जनता में अपार हर्ष था।
 
राजबाड़ा की भव्य इमारत का लोकार्पण
 
6 अक्टूबर 1976 को राजबाड़ा की भव्य इमारत का लोकार्पण मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री श्यामाचरण शुक्ल द्वारा किया गया। यह इंदौर के लिए एक अभूतपूर्व व ऐतिहासिक अवसर था, क्योंकि इसके पूर्व इस भवन के निजी हाथों में चले जाने का खतरा पैदा हो गया था। इस स्थिति से निकालकर जब इसे जनता को अर्पित किया गया तो नागरिकों की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
 
श्री शुक्ल ने इस अवसर पर राजबाड़े पर तिरंगा फहराया था और रंग-बिरंगे गुब्बारे तथा शांति के प्रतीक कपोत आकाश में उड़ाए थे। उस दिन राजबाड़े को खूब सजाया गया था। रात को वह रोशनी से जगमगा रहा था। इस आकर्षक रोशनी को 3 दिनों तक जारी रखा गया था। लोकार्पण समारोह को देखने के लिए इंदौर की जनता उमड़ पड़ी थी। उसमें अपूर्व उत्साह व हर्ष था।
 
मुख्यमंत्री श्री शुक्ल ने तब कहा था कि सदियों पुराना यह भवन मात्र चूने-गारे की इमारत नहीं है। इसका अपना पुरातत्वीय महत्व है जिसे सुरक्षित रखा जाना चाहिए। इसमें 250 वर्ष का इतिहास छिपा है। हालांकि लोकार्पण का यह कार्य 29 वर्ष पूर्व ही हो जाना चाहिए था, लेकिन विलंब से ही सही, एक शुभ कार्य संपन्न हुआ। श्री शुक्ल ने इसके रखरखाव के लिए 1 लाख रुपए प्रतिवर्ष खर्च करने की घोषणा भी उस समय की थी। कार्यक्रम की अध्यक्षता तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री श्री गुलाबचंद तामोट ने की थी।
 
वैभवशाली अतीत का प्रतीक : लालबाग
 
-रामसेवक गर्ग
 
आधुनिक इंदौर नगर के निर्माता तुकोजीराव द्वितीय (1844-1886 ई.) के वैभवशाली साकार स्वप्न को यदि लालबाग कहा जाए तो कोई अतिश्योक्ति न होगी। लालबाग के प्राथमिक इतिहास के संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं है। इंदौर से प्रकाशित होने वाले 'मालव अखबार '(जिल्द-1, अंक 4, मार्च 27 सन 1849 ई. के पृष्ठ 26) में इसका प्रथम उल्लेख मिलता है। बाद में उसी अखबार ने अपने 22 अक्टूबर 1850 वाले अंक के पृष्ठ 338 पर भी लालबाग का उल्लेख किया है। लेकिन इन उल्लेखों में महाराजा होलकर और अंग्रेज अधिकारियों की भेंट एवं त्योहारों के जुलूस व अन्य आयोजनों का ही वर्णन है। महल की स्थिति का पता नहीं चलता है। संभवत: यह स्थान उन दिनों राजपरिवार का प्रमोद उद्यान था, जहां समर हाउस आदि के निर्माण कार्य किए हुए थे। बख्शी खुमानसिंह के रोजनामचे से तो ज्ञात होता है कि 12 अप्रैल 1877 के दिन शिवाजीराव होलकर के निवास हेतु भवन निर्माण के लिए वे और श्री केरी साथ-साथ लालबाग में स्थल देखने गए थे, किंतु पानी की कमी के कारण स्थल का चुनाव उपयुक्त नहीं माना गया।
 
तुकोजीराव द्वितीय ने राज्यारोहण के पश्चात उत्तर भारत की यात्रा की थी और जब वे वापस आए तब उन्होंने उद्यान शास्त्री श्री हार्वे को लालबाग के उद्यान को और अधिक विकसित कर सुंदर व आकर्षक बनाने हेतु नियुक्त किया। श्री हार्वे ने बड़े-बड़े वृक्षों को पुनर्रोपण द्वारा तथा सजावटी वृक्षों को लगवाकर अल्पकाल में यहां विकसित कर दिया। उसी ने वहां एक सुंदर 'गुलाब चक्कर' भी बनवाया। महाराजा ने प्रसन्न होकर हार्वे को 1854 में राजकीय भवनों के अधीक्षक के पद पर पदोन्नत कर दिया।
 
वर्ष 1857 में स्वाधीनता संग्राम के समय घटी घटनाओं के वर्णन में भी इस स्थान का उल्लेख मिलता है, जहां बैठकर महाराजा ने तत्कालीन अंगरेज अधिकारियों से चर्चाएं की थी। वर्ष 1873 में श्री केरी को होलकर राज्य के इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया गया। उसने लालबाग के पुराने भवन में अन्य कुछ आवश्यक व आकर्षक निर्माण कार्य संपन्न कराए किंतु 1877 तक पानी की कमी के कारण बड़े महल निर्माण कार्य को हाथ में नहीं लिया गया। वर्ष 1884 में हैदराबाद के नवाब खुशीदशाह महाराजा के अतिथि के रूप में इंदौर आए थे। उन्होंने लालबाग में रहकर होलकर नरेश का आतिथ्य स्वीकार किया। बाद में जब 1896-97 में वायसराय इंदौर आए तब भी लालबाग में एक भव्य शाही दावत का आयोजन किया गया। इन अवसरों ने लालबाग की साज-सज्जा को अभिवृद्धि प्रदान की।
 
महाराजा शिवाजीराव होलकर के समय वर्ष 1886 से 1902 के मध्य होलकर राज्य द्वारा महलों के निर्माण आदि में कुल 36 लाख रुपयों का व्यय किया गया। इस समय लालबाग में भी कुछ निर्माण कार्य करवाए गए। वस्तुत: यही समय था जब लालबाग का प्राथमिक निर्माण पूर्ण हुआ। किंतु इसकी रमणीक और आकर्षक साज-सज्जा महाराजा तुकोजीराव तृतीय के समय पूर्ण की गई। इस प्रकार लालबाग 3 महाराजाओं की एक सम्मिलित देन है।
 
महाराजा तुकोजीराव तृतीय के समय 1903 से 1911 के मध्य इस महल को पाश्चात्य शैली मे कीमती संगमरमर से सुसज्जित किया गया। यह कार्य लंदन की सुप्रसिद्ध फर्म मेसर्स वारिंग एंड गिलोज ने 36,337 पाउंड की लागत में संपन्न किया। कुछ काम माणिकबाग में भी कराए गए थे। सुसज्जित महल के रखरखाव की व्यवस्था के लिए रुपए 300 प्रतिमाह पर मुन्तजिम हुजूर फर्राशखाना नामक पद पर एक सुयोग्य अधिकारी की नियुक्ति की गई।
15 अप्रैल 1912 ई. के दिन तत्कालीन रेजीडेंट जे.डब्ल्यू वुड अपने कुछ अन्य सहयोगियों के साथ लालबाग आए और महाराजा से महत्वपूर्ण चर्चाएं कीं। 24 जनवरी 1912 को खासगी गद्दी नशीनी का उत्सव भी यहीं मनाया गया और लालबाग में भव्य रोशनी का आयोजन संपन्न हुआ। 9 नवंबर 1912 को वायसराय लार्ड हार्डिंग लेडी हार्डिंग सहित इंदौर आए और लालबाग भी गए, जहां शाही दावत का आयोजन किया गया था। यह दूसरा बड़ा उत्सव था। इसके पूर्व 6 नवंबर 1911 के दिन जब महाराजा तुकोजीराव को वयस्क होने पर राज्याधिकार प्रदान किए गए थे तब भी महल को सजाया गया था इन घटनाओं ने भी इस राजप्रासाद के इतिहास को आगे बढ़ाया। इसी वर्ष लालबाग में आउट हाउसेस भी बनाए गए।
 
1912 में इस महल के भीतर बाला साहब (यशवंतराव होलकर द्वितीय) के आवास कक्ष को भी सुव्यवस्थित किया गया तथा लालबाग से गौतमबाग के मध्य एक पुल का निर्माण किया गया। 1914 में पुन: कुछ नए निर्माण कार्य हाथ में लिए गए जिनमें महल का विस्तार गैरेज एवं अस्तबल तथा टेम्परेरी किचेन मुख्य थे। इसके बाद 1921 तक महल के विस्तार का अंतिम चरण पूर्ण किया गया और नए सिरे से साज-सज्जा का कार्य मेसर्स मार्टिंग एंड कंपनी केल्टनेहेत्र को सौंपा गया।
 
26 फरवरी 1926 को महाराजा तुकोजीराव तृतीय ने अपने पुत्र यशवंतराव होलकर (द्वितीय) के हित में गद्दी त्याग दी। उनका राज्याभिषेक 11 मार्च को धूमधाम से मनाया गया। चंद्रावती मां साहेब ने भी उसी समय खासगी गद्दी संयोगिताबाई को सौंप दी। महाराज ने माणिकबाग पैलेस को अपना निवास बनाया। इस प्रकार लालबाग को प्राप्त मुख्य शाही निवास का दर्जा समाप्त हो गया। तुकोजीराव तृतीय आजीवन (20 मई 1978 निर्वाण तक) इसी महल में रहे। उनकी सुरुचि ने महल के वैभव को एकाएक नष्ट होने से बचाए रखा। इसी वर्ष (1926) पानी की कमी के कारण लालबाग नर्सरी को काफी कठिनाइयां हुई। अनेक उपाय करके यहांपानी की व्यवस्था की गई।
1928 के अगस्त में जब सेंट्रल इंडिया एजेंसी के निरीक्षण हेतु तत्कालीन वायसराय इंदौर आए तब राज्य की ओर से प्रधानमंत्री द्वारा लालबाग में उनके लिए एटहोम का आयोजन किया गया। यह आयोजन उतना शानदार नहीं रहा। कुछ आवश्यक सुधार कार्य और भवन के विस्तार कार्य जो अधूरे थे उन्हें अवश्य ही पूर्ण किया गया।
 
1930 में लेफ्टि. कर्नल प्रिकार्ड का विदाई समारोह शानदार ढंग से लालबाग में मनाया गया। गुरुवार 8 दिसंबर 1932 को अर्ल ऑफ वेलिंगटन अपनी काउंटेस के साथ इंदौर आए। इन शाही मेहमानों की शानदार मेहमान नवाजी भी लालबाग में आयोजित की। इसी वर्ष इंडियन स्टेट्‌स इन्क्वायरी कमेटी की उपसमिति की बैठक भी लालबाग के अतिथि कक्ष में रखी गई। इस अवसर पर सेंट्रल इंडिया के अन्य राज्य अधिकारियों एवं अतिथियों के सम्मान में 10 से 13 मार्च तक इस राजप्रासाद में अनेक आयोजन किए गए।
 
इसी वर्ष गवर्नमेंट लारेंस गार्डन लाहौर से ट्रेनिंग प्राप्त एक उद्यान शास्त्री को लालबाग नर्सरी एवं उद्यान के विकास हेतु नियुक्त किया गया। 26 जुलाई 1934 में तत्कालीन वायसराय सर जार्ज फ्रेडरिक स्टेनले एवं लेडी बेट्रिक स्टेनले इंदौर आए। उनके सम्मान में इसी लालबाग पैलेस में पुन: एक शाही दावत का आयोजन हुआ और राज्य की अनेक समस्याओं पर महत्वपूर्ण चर्चाएं हुई। इस वर्ष पैलेस के उद्यान का उल्लेखनीय ढंग से विकास किया गया।
 
1935-36 में इसी भवन में ब्रिटिश राजा का सिल्वर जुबली महोत्सव मनाया गया और रुपए 26,132 के व्यय से महल के एक भाग में संगमरमर का फर्श लगवाया गया। 1936-37 में लालबाग में 1600 से अधिक प्रकार के आकर्षक गुलाब लगाए गए एवं अनेक प्रकार से उद्यान का विकास किया गया। नेशनल रोज सोसायटी लंदन द्वारा गुलाब की जो 68 नई प्रजातियां तैयार की गई थीं उन्हें भी लाकर लालबाग में लगाया गया। अन्य 474 नए प्रकार के गुलाब विदेशों से बुलाए गए। होनोलुलु से पपीते के नए बीज बुलवाकर भी यहां उगाए गए। इसी वर्ष लगभग 6000 गुलदाउदी के पौधे जो अनेक प्रकार के थे यहां उगाए गए।
 
जो लालबाग अपनी प्रारंभिक अवस्था में अपने गुलाबों के लिए प्रसिद्ध था अपनी शाही आवास की गरिमा को खोकर भी महकता रहा। 1938 में इसका गुलाब चक्कर पुन: व्यवस्थित किया गया। भवन के दक्षिणी भाग में गुलाब की हजारों नई प्रजातियां लगाई गई। थूजा ओरिएंटेलिया भी उगाया गया। टेरेस गार्डन भी सुव्यवस्थित कियागया। इसी वर्ष लालबाग जो राज्य के लोक निर्माण विभाग की सूची में था हाउस होल्ड को स्थानांतरित कर दिया गया। 1941-42 में हाउस होल्ड आफिसर श्री एन.एम. वाघ के प्रयासों से इस महल के रख-रखाव बजट में वृद्धि की गई। 1944-45 में यहां का उद्यान और विकसित किया गया तथा टेनिस कोर्ट को आधुनिक बनाया गया।
 
प्रथम बार यूपोटोरम- आयोरेटम आदि प्रजातियों के पौधे लगाए गए। जीतसिंह, असिस्टेंट हाउस होल्ड ऑफिसर के प्रयासों से लालबाग का बाह्य वैभव पुन: एक बार पराकाष्ठा पर पहुंच गया। बाद में होलकर राज्य की समाप्ति के साथ इस महल का महत्व भी घटता गया और आज वहां का सारा उद्यान ही उजड़ चुका है।
 
यह है लालबाग के इतिहास की एक मोटी रूपरेखा जिसके मध्य वैभव की पराकाष्ठा सिमट कर रह गई है। यह एक गुलाबी स्वप्न है। मराठों के व्यक्तित्व का प्रतीक है और होलकर महाराजाओं की कलाप्रियता का स्मारक है। इसे बाहर से नहीं भीतर से देखने पर ही समझा जा सकता है।
 
उद्यान सहित लालबाग लगभग 72 एकड़ क्षेत्रफल के मध्य लगभग 4 एकड़ के बिल्डअप एरिया में फैला हुआ है। इसके कुछ कक्ष विशुद्ध रोमन शैली के स्थापत्य पर आधारित है और कुछ कक्ष जिनमें भोजन कक्ष मुख्य है, शुद्ध भारतीय स्थापत्य के मापदंडों के अनुरूप है। कसारा संगमरमर के स्तंभ अत्यंत आकर्षक हैं। छतों को अनेक प्रकार के अलंकरणों-चित्रों, प्लास्टर ऑफ पेरिस की डिजाइंस व रेखांकनों से अलंकृत किया गया है। लकड़ी का काम भी आकर्षक है। भोजन कक्ष की सीलिंग व पैनरिंग चंदन की है। आवश्यकतानुरूप उच्चस्तरीय बैल्जियम ग्लासेस भी लगाए गए हैं।
 
आकर्षक फर्नीचर, झाड़फानूस, बेशकीमती गलीचे व स्टफ किए गए शेर तथा तेंदुए इस करीने से सजाकर रखे गए हैं कि कल्पना-लोक की अनुभूतियां साकार हो उठती हैं। 1921 में इस महल की साज-सज्जा का भार मिस्टर बर्नार्ड ट्रिंग को सौंपा गया था। उसने इसे पेरिस के बर्सायी राजप्रासाद की शैली में सजाया है। यह वस्तुत: कई दृष्टियों से एक अद्वितीय राजप्रासाद है। बाह्य रूप से जहां एक इटालियन विला का आभास देता है वहीं अंदर से बर्सायी का भ्रम उत्पन्न करता है। दर्शक जब महल के भीतर जाता है तो अपने को स्वप्न लोक में पाता है। यह लालबाग की अपनी विशेषता है, जो अन्यत्र नहीं मिलती।

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