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Ramanuja Jayanti: रामानुज जयंती कब और क्यों मनाई जाती है, जानें 5 रोचक तथ्य

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स्वामी रामानुजाचार्य
Ramanuja Jayanti 2026: रामानुज जयंती दक्षिण भारतीय भक्ति आंदोलन के स्तंभ और विशिष्टाद्वैत वेदांत के प्रवर्तक स्वामी रामानुजाचार्य की याद में मनाई जाती है। वर्ष 2026 में उनकी 1009वीं जन्म जयंती 22 अप्रैल, बुधवार को मनाई जाएगी।ALSO READ: भविष्यवक्ता संत देवायत आयत की भविष्यवाणियां
 

कब मनाई जाती है?

रामानुज जयंती हर साल वैशाख माह में मनाई जाती है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार, उनका जन्म 'आर्द्रा नक्षत्र' में हुआ था, इसलिए दक्षिण भारत में इस दिन को बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है। तिथिनुसार रामानुज जयंती 22 अप्रैल 2026, बुधवार को मनाई जाएगी।
 

क्यों मनाई जाती है?

स्वामी रामानुजाचार्य ने हिंदू धर्म में व्याप्त कुरीतियों, जातिवाद और भेदभाव को मिटाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया था। उन्होंने 'भक्ति' को मोक्ष का सबसे सरल मार्ग बताया और समाज के हर वर्ग (विशेषकर पिछड़ों) को मंदिर और आध्यात्म से जोड़ा। उनकी महानता और उनके दार्शनिक योगदान को सम्मान देने के लिए यह जयंती मनाई जाती है।
 

स्वामी रामानुजाचार्य के बारे में 5 रोचक तथ्य

समानता के अग्रदूत: रामानुजाचार्य ने आज से 1000 साल पहले सामाजिक समानता का संदेश दिया था। उनकी इसी विचारधारा को सम्मान देने के लिए हैदराबाद में उनकी 216 फीट ऊंची प्रतिमा बनाई गई है, जिसे 'स्टैच्यू ऑफ इक्वैलिटी' कहा जाता है।
 
गोपनीय मंत्र को किया सार्वजनिक: उनके गुरु ने उन्हें एक गुप्त मंत्र दिया था और कहा था कि इसे किसी को मत बताना, वरना तुम्हें नर्क मिलेगा। लेकिन रामानुज ने मंदिर के शिखर पर चढ़कर वह मंत्र सबको सुना दिया। उनका मानना था कि 'यदि मेरे अकेले के नर्क जाने से हजारों लोगों का कल्याण होता है, तो मुझे यह स्वीकार है।'
 
विशिष्टाद्वैत दर्शन: उन्होंने 'विशिष्टाद्वैत' मत की स्थापना की, जो कहता है कि जगत और जीव दोनों ही सत्य हैं और ईश्वर (श्रीहरि) का ही अंश हैं। उन्होंने बताया कि ज्ञान से अधिक 'भक्ति' महत्वपूर्ण है।
 
मंदिर प्रबंधन का आधुनिकीकरण: भगवान रंगनाथ (श्रीरंगम मंदिर) और तिरुपति बालाजी मंदिर की पूजा पद्धति और प्रबंधन की व्यवस्था आज भी उसी नियमों पर आधारित है, जो रामानुजाचार्य ने सदियों पहले बनाई थी।
 
120 वर्ष का लंबा जीवन: ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, स्वामी रामानुजाचार्य का जीवनकाल बहुत लंबा था। वे 1017 ईस्वी से 1137 ईस्वी तक जीवित रहे और 120 वर्षों तक उन्होंने समाज को नई दिशा दी।
 
जयंती विशेष: इस दिन श्री वैष्णव संप्रदाय के अनुयायी मंदिरों में विशेष पूजा करते हैं और उनके द्वारा रचित 'श्री भाष्य' और 'वेदार्थ संग्रह' जैसे ग्रंथों का पाठ करते हैं।

अस्वीकरण (Disclaimer) : चिकित्सा, स्वास्थ्य संबंधी नुस्खे, योग, धर्म, ज्योतिष, इतिहास, पुराण आदि विषयों पर वेबदुनिया में प्रकाशित/प्रसारित वीडियो, आलेख एवं समाचार सिर्फ आपकी जानकारी के लिए हैं, जो विभिन्न सोर्स से लिए जाते हैं। इनसे संबंधित सत्यता की पुष्टि वेबदुनिया नहीं करता है। सेहत या ज्योतिष संबंधी किसी भी प्रयोग से पहले विशेषज्ञ की सलाह जरूर लें। इस कंटेंट को जनरुचि को ध्यान में रखकर यहां प्रस्तुत किया गया है जिसका कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।ALSO READ: कब से कब तक रहेगा खप्पर योग, क्या सावधानी रखें इस दौरान?

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