Publish Date: Sat, 24 Jan 2026 (11:18 IST)
Updated Date: Sat, 24 Jan 2026 (11:33 IST)
राजस्थान की वीर धरा पर जब-जब अन्याय बढ़ा, तब-तब महापुरुषों ने जन्म लिया। उन्हीं में से एक हैं भगवान देवनारायण। गुर्जर समाज के गौरव और अन्याय के काल, देवनारायण जी केवल एक लोक देवता नहीं, बल्कि आस्था के अटूट प्रतीक हैं। 24 जनवरी 2026 (माघ शुक्ल षष्ठी) को उनकी जयंती के अवसर पर, आइए जानते हैं इस महायोद्धा के जीवन के 5 सबसे दिलचस्प पहलू।
1. राजसी जन्म और बगडावत वंश का गौरव
2. देवास में बचपन और शिप्रा तट पर सिद्धि
3. चमत्कार जिनसे दुनिया नतमस्तक हुई
4. 'देवनारायण की फड़': राजस्थान का सबसे विशाल महाकाव्य
5. आस्था के केंद्र: जहाँ आज भी गूंजती है जय-जयकार
1. राजसी जन्म और बगडावत वंश का गौरव
देवनारायण जी का जन्म राजस्थान के मालासेरी में बगडावत वंश के राजा सवाई भोज और माता साढू खटानी के घर हुआ। वे चौहान राजाओं द्वारा दिए गए 'गोठा' क्षेत्र के वैभवशाली वंश से ताल्लुक रखते थे। उनके पूर्वजों की वीरता के चर्चे मेवाड़ से लेकर अजमेर तक गूंजते थे। उन्हें भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है, जिन्होंने धर्म की स्थापना के लिए अवतार लिया।
2. देवास में बचपन और शिप्रा तट पर सिद्धि
दुश्मनों के षड्यंत्रों से बचाने के लिए माता साढू उन्हें लेकर अपने मायके देवास (मध्य प्रदेश) चली गईं। यहीं उनका बचपन बीता। उन्होंने न केवल घुड़सवारी और शस्त्र विद्या में महारत हासिल की, बल्कि उज्जैन की पावन शिप्रा नदी के तट पर स्थित 'सिद्धवट' पर कठोर तपस्या भी की। इसी आध्यात्मिक शक्ति ने उन्हें साधारण राजकुमार से 'लोक देवता' बना दिया।
3. चमत्कार जिनसे दुनिया नतमस्तक हुई
लोक कथाओं के अनुसार, देवनारायण जी के पास असाधारण सिद्धियां थीं:
उन्होंने राजा जयसिंह की बीमार पुत्री पीपलदे को जीवनदान दिया (जो बाद में उनकी पत्नी बनीं)।
सूखी नदियों में जलधारा प्रवाहित कर दी।
सारंग सेठ और छोंछु भाट जैसे मृत व्यक्तियों को पुनर्जीवित कर अपनी दैवीय शक्ति का परिचय दिया।
4. 'देवनारायण की फड़': राजस्थान का सबसे विशाल महाकाव्य
उनकी वीरता केवल कहानियों में नहीं, बल्कि 'बगडावत महाभारत' में दर्ज है। उनकी गाथा को 'फड़' (कपड़े पर बनी पेंटिंग) के माध्यम से गाया जाता है। यह लोक गायन इतना विशाल है कि अगर इसे रोज तीन पहर गाया जाए, तो भी इसे पूरा होने में 6 महीने का समय लग जाता है! यह राजस्थानी संस्कृति की सबसे लंबी और समृद्ध गाथा है।
5. आस्था के केंद्र: जहाँ आज भी गूंजती है जय-जयकार
आसींद (भीलवाड़ा): उनका सबसे प्रमुख सिद्ध स्थल, जहाँ खीर-चूरमे का भोग लगाकर भक्त निहाल हो जाते हैं।
जोधपुरिया (टोंक): इसे 'देवधाम' कहा जाता है, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मन्नतें लेकर आते हैं।
एक रोचक तथ्य: मात्र 31 वर्ष की अल्पायु में भगवान देवनारायण बैकुंठ धाम सिधार गए, लेकिन उनकी शिक्षाएं और उनके चमत्कार आज भी लाखों लोगों के जीवन को प्रकाशित कर रहे हैं।
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