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स्वीडन में ईस्टर बन गया आगज़नी और पथराव का त्योहार

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राम यादव

अप्रैल का मध्य यूरोप सहित दुनिया के सभी ईसाइयों के लिए उनके सबसे पावन पर्व ईस्टर का समय था। गुड फ्राइडे ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाए जाने का शोक-दिवस होता है और उसके बाद का तीसरा दिन उनके पुनर्जीवित हो जाने की खुशी का दिन। लेकिन, स्वीडन में इस बार का ईस्टर हिंसा, आगज़नी और पथराव का पर्व बन गया। 
 
स्वीडन के कई शहरों में वहां रहने वाले मुस्लिम आप्रवासियों और शरणार्थियों ने ईस्टर की छुट्टियों वाले दिनों में ऐसे दंगे-फ़साद किए, जैसे स्वीडन के लोगों ने पहले कभी नहीं देखे थे। अपूर्व हिंसा, आगज़नी, तोड-फोड़ और पथराव का बहाना एक ऐसा व्यक्ति बना, जो पेशे से एक वकील है और स्वीडन के साथ-साथ डेनमार्क का भी नागरिक है। ये दोनों देश यूरोपीय संघ के सदस्य और साझी सीमा वाले पड़ोसी देश हैं।
 
रास्मुस पालुदान नाम वाला यह व्यक्ति एक घोर-दक्षिणपंथी है। वह डेनमार्क की 'स्ट्राम कुर्स' (हार्ड कोर्स/ कठोर नीति) नाम की पार्टी का अध्यक्ष है। स्वीडन का भी नागरिक होने के कारण इस साल पतझड़ के समय स्वीडन में होने वाले संसदीय चुनावों में भाग लेने की तैयारी कर रहा है। अपने भड़काऊ भाषणों के लिए वह स्वीडन और डेनमार्क में बदनाम है। उसे शिकायत है कि विशेषकर स्वीडन ने, विदेशी शरणार्थियों और आप्रवासियों के लिए अपने दरवाज़े इतना अधिक खोल रखे हैं कि न केवल उसकी अपनी पहचान खोती जा रही है, हर तरह के अपराधों की भी बाढ़ आ गई है। 
 
9 फीसदी हुए मुस्लिम : इन विदेशी शरणार्थियों और आप्रवासियों में सबसे अधिक संख्या पश्चिमी एशिया और अफ्रीका से आए मुसलमानों की है। स्वीडन के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस समय केवल 1,02,05,525  की जनसंख्या वाला स्वीडन, पिछले पांच वर्षों से हर साल लगभग ढाई लाख लोगों को शरण दे रहा है। देश की कुल जनसंख्या में विदेशियों का अनुपात लगभग 20 प्रतिशत और मुसलमानों का लगभग 9 प्रतिशत हो गया है। पालुदान ने घोषणा की कि वह स्वीडन के अलग-अलग शहरों में जाकर लोगों को यह बताने के लिए रैलियां करेगा कि शरणार्थियों को स्वीडिश समाज के साथ जोड़ने में सरकार विफल रही है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अपने अधिकार पर बल देने के लिए वह कुरान की प्रतियां जलाएगा। पालुदान का मानना है कि कुरान की शिक्षाएं उसके भक्तों को किसी दूसरे समाज में घुलने-मिलने से रोकती हैं।
 
रास्मुस पालुदान ने अपने प्रचार अभियान के लिए स्वीडन के ऐसे छोटे-बड़े शहरों को चुना, जहां मुस्लिम शरणार्थियों और आप्रवासियों की संख्या अधिक है। पुलिस ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की स्वीडन में सर्वोपरिता के चलते उसे अपने प्रचार की अनुमति दे दी। सबसे पहले  वह गुरुवार, 14 अप्रैल को लिंक्यौपिन नाम के शहर में पहुंचा। वहां उसके विरोधियों की भीड़ पहले ही जमा हो गई थी। भीड़ ने पुलिस से मांग की कि पालुदान को रोका और वहां से भगाया जाए। पुलिस के यह कहने पर, कि उसे बोलने का अधिकार है, भीड़ ने पुलिस और उसके वाहनों पर पथराव करना और आग लगाना शुरू कर दिया। उसी दिन औएरेब्रो नाम के एक दूसर शहर में हिंसक भीड़ नें 12 पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया और उनकी चार कारें जला डालीं।
 
200 लोगों की भीड़ ने बरसाए पत्थर : 16 अपैल को माल्मौए शहर में उग्र भीड़ के पथराव से पालुदान खुद भी घायल हो गया, हालांकि गंभीर रूप से नहीं। दंगाइयों ने वहां नगर परिवहन की एक बस को भी आग लगा कर पूरी तरह जला दिया। अगले दिन, 17 अप्रैल को पालुदान नोरक्यौएपिंग शहर में अपने भाषण के बाद कुरान जलाना चाहता था। लेकिन क़रीब 200 लोगों की उन्मत्त भीड़ ने वहां इतने पत्थर बरसाए और आगज़नी की कि उसे उल्टे पैर लौट जाना पड़ा। भीड ने उसके जाने के बाद भी पत्थर बरसाना और आग लगाना जारी रखा। एक समय पुलिस को गोली भी चलानी पड़ी, जिससे तीन दंगाई घायल हो गए। इस घटना में निजी और सार्वजनिक संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा है। एक स्कूल को भी जला दिया गया है। कम से कम 26 पुलिसकर्मी और 14 दूसरे लोग घायल हो गए। 20 से अधिक वाहन आग और पथराव की भेंट चढ़ गए।  
 
स्वीडन की पुलिस के महानिदेशक अन्देर्स तोर्नबेर्ग ने कहा, ''वे कोई सामान्य प्रदर्शनकारी नहीं थे। हमें प्रबल संदेह है कि दंगाई अपराधी गिरोहों के लोग हैं।... जैसी अंधाधुंध हिंसा हमने इन दिनों देखी है, वह एक ऐसी कहीं बड़ी समस्या का लक्षण है, जो हमारे स्वीडन में पहले से है। ये गिरोह हमेशा ऐसी उमर के बच्चों को भर्ती करते हैं, जिन पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। यहां पूरे समाज को अपना दृढ़निश्चय दिखाना होगा।'' तोर्नबेर्ग का मानना है कि अपराधी गिरोह मौके का फ़ायदा उठाकर पुलिस और एम्बुलेंस सेवा को निकम्मा बना देना चाहते थे, जो कि स्वीडन की राज्यसत्ता और लोकतंत्र पर हमले के समान होता।
 
आक्रामकता कल्पना से बाहर : दंगों के समय ड्यूटी बजा चुके एक पुलिसकर्मी, अलेक्सांदर येरेमीक ने स्वीडिश टेलीविज़न के एक कार्यक्रम में कहा, ''उनकी आक्रामकता मेरी कल्पना से बाहर थी। मैं नहीं मानता कि वे कोई विरोध व्यक्त करने वाले प्रदर्शनकारी थे। प्रदर्शनकारी के पास कोई संदेश होता है। वह कुछ कहना चाहता है। इन लोगों के पास कोई संदेश नहीं था। वे हम पुलिसकर्मियों को बस घायल होता देखना चाहते थे।''
 
पुलिस महानिदेशक अन्देर्स तोर्नबेर्ग का भी कहना था कि, ''यदि हमारे या किसी दूसरे के ऊपर जानलेवा हिंसा के साथ हमला होगा, तो हम भी जवाब दे सकते हैं, और देंगे। तब हमें अपनी और दूसरों की सुरक्षा के लिए हथियार भी उठाना पड़ेगा।'' पुलिस महानिदेशक ने ऐसे संकेत मिले होने का ज़िक्र किया कि ईस्टर के दौरान इस हिंसा को भड़काने में ''विदेशी हाथ है।'' उन्होंने किसी देश का नाम नहीं लिया। इसी प्रकार, पुलिसकर्मियों को जिस तरह निशना बनाया गया, उसे कुछेक मामलों में बाक़ायदा ''हत्या का प्रयास'' कहा जा सकता है।
 
विदेशी हाथ होने की बात एक दूसरे उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारी योनास ह्यीज़िंग ने भी कही। उनका कहना था विदेशी हस्तक्षेप सोशल मीडिया के माध्यम से हुआ है। हिंसा का लक्ष्य रास्मुस पालुदान नहीं, स्वीडन की पुलिस थी।
 
स्वीडन की प्रधानमंत्री मग्दालेना अन्देरसन ने एक वक्तव्य जारी कर कथित प्रदर्शनकारियों की चार दिनों तक चली हिंसा की कड़ी निंदा की। उन्होंने लिखा, ''किसी को कुछ भी लगे, हिंसा कतई नहीं होनी चाहिए।'' उनका यह भी कहना था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार स्वीडन में सर्वोपरि है, और रहेगा। इसे बदला नहीं जाएगा। इसी को रेखांकित करते हुए स्वीडन के न्यायमंत्री मोर्गन योहान्ससोन ने पत्रकारों से कहा कि जो कोई अभिव्यक्ति की हमारी स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं कर सकता, उसे पुलिस के बलप्रयोग का सामना करना पड़ेगा। ऐसी स्थितियों में ''राजकीय अंग कठोरता से काम लेंगे।''  पुलिस की इस बात के लिए वे आलोचना नहीं कर सकते कि ''उसने पालुदान को रैलियां करने की अनुमति दी। यह तो लोकतंत्र का हिस्सा है। अपने रुख के बारे में वे लोग सोचें, जो लोकतंत्र के साथ पटरी नहीं बैठा पा रहे हैं।''
 
1975 का वह निर्णय : स्वीडन ने अपना यह सिरदर्द वास्तव में आप ही पाला है। लंबे समय तक संसार का सबसे समाज-कल्याणकारी राज्य (वेलफ़ेयर स्टेट) कहलाने वाले स्वीडन की संसद ने, 1975 में, शेखी बघारते हुए एकमत से यह अनोखा निर्णय लिया कि स्वीडन को ऐसे 'बहुसांस्कृतिक' यानी एक ऐसे बहुजातीय मिश्रित समाज में बदल देना चाहिए, जिसमें अन्य देशों, धर्मों, संस्कृतियों से आए लोगों के लिए भी बराबरी का स्थान हो। उस समय जनसंख्या मात्र 82 लाख थी। आदर्शवादिता से भरपूर यह प्रशंसनीय निर्णय जितना मानवतावादी था, समय के साथ उसके सामाजिक प्रभाव उतने ही अमानवीय होते गए हैं।
 
इस निर्णय के बाद के 40 वर्षों में, यानी 2014 तक स्वीडन में जनसंख्या 19 प्रतिशत, हिंसात्मक अपराध 300 प्रतिशत और महिलाओं-बच्चों के साथ बलात्कार 1472 प्रतिशत बढ़ गए! प्रति एक लाख जनसंख्या पर बलात्कारों के अनुपात वाले पैमाने के अनुसार दक्षिणवर्ती अफ्रीका में स्थित लेसोथो के बाद, स्वीडन ही लंबे समय तक बलात्कारों की सूची में संसार में दूसरे नंबर रहता था। अब यह स्थान शायद ब्रिटेन को मिल गया है। हुआ यह कि विदेशियों के प्रति उदारतापूर्ण स्वीडन के नए नियमों-क़ानूनों का लाभ उठाते हुए मुख्यतः तुर्की, सीरिया, इराक़, सोमालिया, अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान जैसे अभावग्रस्त या संकटग्रस्त इस्लामी देशों के आप्रवासी और शरणार्थी भारी संख्या में वहां आ कर बसने लगे। स्वीडन के नियम-क़ानून किसी के उद्भव या धर्म को दर्ज करने की अनुमति नहीं देते, इसलिए कोई नहीं जानता कि कहां से किस धर्म या किस राष्ट्रीयता के कितने लोग वहां आ कर बस गये हैं।
 
तेजी से बढ़े अपराध : प्रवासियों की पहली पीढ़ी की स्वीडन में जन्मी संतानों और बाद की पीढ़ियों को पूरी तरह स्वीडिश नागरिक माना जाता है, हालांकि इससे उनकी संस्कारगत सोच-समझ स्वीडिश नहीं बन जाती। विदेशियों के रहने-बसने के लिए दरवाज़े खोल देने के बाद स्वीडन में छोटे-मोटे अपराधों के साथ-साथ हत्या, अपहरण, गैंगवॉर, यौनदुराचार और बलात्कार जैसे गंभीर अपराध भी तेज़ी से बढ़ने लगे। सरकार इसे दोटूक स्वीकार नहीं करती, पर जानती वह भी है। पर्दे की आड़ में इसे मानते सभी हैं।
 
अब गृहयुद्ध का डर : राष्ट्रीय पुलिस का हाल यह है कि स्वघोषित ‘शरिया पुलिस’ वालों के डर से देश के दर्जनों स्थान उसके लिए ‘नो गो एरिया’ (वर्जित क्षेत्र) बन गए हैं। 2017 में स्वीडन के तत्कानीन पुलिस महानिदेशक, दान एलियाससोन ने राष्ट्रीय टेलीविज़न पर यह कह कर खलबली मचा दी कि पुलिस कानून का पालन करवाने में असमर्थ है; उसे देश की शुभचिंतक शक्तियों की ओर से सहायता चाहिए। स्वीडन के जानेमाने अराजकता विशेषज्ञ, पत्रीक एन्गेलाउ ने, उन दिनों चेतावनी दी, ''मुझे डर है कि वह सुव्यवस्थित समतावादी स्वीडन, जिसे हम अब तक जानते थे, अब अपने अंतकाल में पहुंच गया है। निजी तौर पर मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि किसी प्रकार का गृहयुद्ध छिड़ जाता है। कुछ जगहों पर गृहयुद्ध संभतः छिड़ भी चुका है।'' कौन जाने, पिछले ईस्टर त्योहार के दिनों में इसी गृहयुद्ध का पूर्वाभ्यास हुआ है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और करीब 1 दशक तक डॉयचे वेले हिन्दी सेवा के प्रमुख रह चुके हैं) 

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